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निजी डेटा संरक्षण विधेयक की उलझी गांठ

सुदीप्त दे /  December 15, 2019

संसद की संयुक्त प्रवर समिति जब निजी डेटा संरक्षण विधेयक 2019 के प्रारूप पर गौर करना शुरू करेगी तो उसके पास काफी काम होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि अपने मौजूदा स्वरूप में यह मसौदा विधेयक एक व्यक्ति की निजता को संरक्षित करने की अपनी क्षमता में कई कानूनी चुनौतियों का सामना कर सकते हैं।

 

सबसे बड़ी कानूनी चुनौती मसौदा विधेयक के उपबंध 35 के तहत प्रावधानों के बचाव की होगी। यह उपबंध सरकार को डेटा संरक्षण कानून के आंशिक या पूर्ण क्रियान्वयन से किसी भी एजेंसी या विभाग को बाहर रखने की व्यापक शक्तियां प्रदान करता है। यह छूट महज एक आदेश के जरिये दी जा सकती है और इसके लिए किसी कानून की जरूरत नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रावधान को मनमानेपन और अत्यधिक प्रत्यायोजन के आधार पर चुनौती दिए जाने की संभावना है। भारत में मोजिला के नीतिगत सलाहकार उद्भव तिवारी कहते हैं, 'यह सरकार को निगरानी समेत अन्य कार्यों में डेटा के इस्तेमाल से जो बड़ी छूट देता है वह निजता को मूलभूत अधिकार बताने वाले पुत्तस्वामी फैसले में निर्धारित जरूरी एवं आनुपातिक मानकों के प्रतिकूल है।'


निरीक्षण के लिए ऐसी छूट देने एवं कदम उठाने के लिए दिशानिर्देश एवं प्रक्रिया और सुरक्षात्मक उपायों को प्रत्यायोजित विधान पर छोड़ दिया गया है। विशेषज्ञ इस तरफ इशारा करते हैं कि स्पष्ट वैधानिक परामर्श के अभाव में यह प्रावधान सरकार को डेटा संरक्षण के दायरे से किसी निगरानी या निजता पर चोट पहुंचाने वाली गतिविधि को बाहर रखने के बारे में बेहद अहम शक्तियां देता है। विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी की वरिष्ठ फेलो आकृति गौड़ कहती हैं कि अपनी मौजूदा स्थिति में यह प्रावधान पुत्तस्वामी केस में उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित आवश्यकता एवं अनुरूपता के सिद्धांतों पर खरा नहीं उतर रहा है। वहीं नीतिगत थिंकटैंक 'द डायलॉग' के संस्थापक निदेशक काजिम रिजवी का मानना है कि समुचित नियंत्रण एवं संतुलन, न्यायिक सुरक्षा-उपाय और संसदीय निरीक्षण के अभाव में यह प्रावधान संविधान में निजता के अधिकार को लेकर दी गई गारंटी के खुले उल्लंघन जैसा है। इस विधेयक को एक और अहम चुनौती सोशल मीडिया मध्यवर्तियों पर प्रावधान के मामले में आ सकती है। 

विधेयक के उपबंध 26 के मुताबिक, उपयोगकर्ताओं के बीच ऑनलाइन संपर्क को मुख्यत: या बुनियादी तौर पर सक्षम बनाने वाली किसी मध्यवर्ती को 'सोशल मीडिया मध्यवर्ती' माना जाएगा। इसमें ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन विश्वकोश, सर्च इंजन, ई-मेल सेवाओं और इंटरनेट संपर्क प्रदाताओं जैसे डेटा न्यासियों को बाहर रखता है। विशेषज्ञों को सबसे ज्यादा परेशान यह कर रहा है कि ताकतवर बनने के लिए सरकार ऐसे मध्यवर्तियों को 'अहम डेटा न्यासी' अधिसूचित करने का अधिकार खुद को दे रही है जिसका आधार उपभोक्ताओं की कुल संख्या और चुनाव प्रक्रिया, लोक व्यवस्था एवं राज्य की सुरक्षा में संभावित नुकसान होगा।

विशेषज्ञ सोशल मीडिया मध्यवर्ती की परिभाषा को अस्पष्ट बताते हुए कहते हैं कि उपयोगकर्ता और ऑनलाइन गतिविधि जैसी शब्दावलियां पूरी तरह साफ ढंग से परिभाषित नहीं हैं। आकृति कहती हैं, 'जहां बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस परिभाषा के दायरे में आ सकते हैं वहीं बाकी प्लेटफॉर्मों की स्थिति अस्पष्ट होगी।' सोशल मीडिया मध्यवर्तियों के लिए अपने उपयोगकर्ताओं का स्वैच्छिक आधार पर सत्यापन करने की जरूरत वाला प्रावधान स्थिति को और भी अधिक जटिल बना देता है।

विशेषज्ञ ऐसे प्रावधान को डेटा संरक्षण विधेयक में रखे जाने का मकसद नहीं समझ पा रहे हैं। आकृति कहती हैं कि इस प्रावधान से सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 की धारा 79 के तहत हासिल मध्यवर्तियों के नियमन की शक्तियों और सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश) नियम, 2011 से टकराव होने की आशंका है। जहां डेटा संरक्षण के सशक्त उपाय कारोबार के लिए सामान्य कदम साबित हो रहे हैं वहीं धोखाधड़ी एवं फॉरेंसिक जांच करने वालों का काम अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है। 

डेलॉयट इंडिया के पार्टनर जयंत सरन के मुताबिक प्रस्तावित विधेयक में जांच के दौरान व्यक्ति की सहमति के बगैर उसके निजी आंकड़ों की पड़ताल करने की इजाजत देने की बात कही गई है। हालांकि विधेयक में ऐसी धाराएं भी हैं जो जांच से असंतुष्ट व्यक्ति को प्रस्तावित डेटा संरक्षण अधिकरण (डीपीए) के समक्ष शिकायत करने की इजाजत देता है। जयंत कहते हैं, 'इस मसौदा विधेयक के कानून बनने के बाद हमें अपने संपर्क अनुबंधों की शब्दावलियों, शर्तों एवं प्रावधानों में बदलाव होते हुए दिख रहे हैं।'

निजी डेटा के संरक्षण को सुनिश्चित करने के घोषित उद्देश्य से पेश किए जाने वाले इस विधेयक के कई प्रावधानों को लेकर आपत्तियां उठ रही हैं। निजता संरक्षण कार्यकर्ताओं और उद्योग जगत के दबाव समूहों को उम्मीद है कि संसदीय समिति इन बिंदुओं पर विधिवत ध्यान देगी।
Keyword: Data protection, Data collection, Data Company, IT Company, e-commerce, FDI, Select Committee, Parliament,
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