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पाकिस्तान की पुनर्खोज और भारत का भविष्य

शेखर गुप्ता /  December 15, 2019

हम एक 'राष्ट्रीय सुरक्षा राज्य' को कैसे परिभाषित करेंगे? इसके लिए हमें अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान का उदाहरण लेना होगा। पाकिस्तान के इर्दगिर्द हर चीज राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर बुनी गई है या कहें असुरक्षा के नाम पर। यही कारण है कि उसकी सेना को सत्ता के ढांचे में स्थायी रूप से वरीयता मिली हुई है। उसकी खुफिया एजेंसी इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसएआई) के पास किसी भी अन्य परमाणु क्षमता संपन्न देश से अधिक संस्थागत स्वायत्तता है।

आप अपने देश की 21 करोड़ या इससे अधिक की आबादी को ऐसे कैसे बहकाये रख सकते हैं कि वह इस बेवकूफी पर धन का अपव्यय करे? जाहिर है एक ऐसा शैतान तलाशना होगा जो ज्यादा कुरूप और खतरनाक हो तथा उन्हें भयभीत कर सके। राष्ट्रीय सुरक्षा वाले राज्य को उचित ठहराने के लिए सबसे पहले आपको भय का माहौल बनाना होता है। पाकिस्तानी प्रतिष्ठान भारत की ऐसी छवि बनाने में सफल रहा है।

यही कारण है कि वह सेना पर इतना पैसा खर्च करता है। यही कारण है कि वाघा सीमा पर आपके पासपोर्ट पर मुहर लगा रहे आव्रजन अधिकारी के सर के ऊपर एक नोटिस हमेशा लटका रहता है। उसमें लिखा है, 'हम सबका सम्मान करते हैं, हम सब पर संदेह करते हैं।' राष्ट्रीय सुरक्षा वाला राज्य शंकालु भी होता है। यही कारण है कि वहां इतनी गड़बडिय़ां होती हैं। एक दिवालिया, उधार पर चल रही अर्थव्यवस्था, बिखरा हुआ समाज, गिरते सामाजिक संकेतक, राष्ट्रीय परिसंपत्तियों की बिकवाली और पड़ोस के बड़े मुल्क को संरक्षण शुल्क के बदले अपना बड़ा इलाका सौंपना तथा दुनिया भर में 'जिहाद के विश्वविद्यालय' और 'वैश्विक सरदर्द' की छवि। पाकिस्तान की ओर से दुनिया और खासकर पड़ोसी देशों के लिए सबसे अहम सबक है: मेरे जैसे मत बनो।

स्पष्ट है कि भारत ने इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लेने का निर्णय लिया है। दूसरी ओर हम 2015 के बाद पाकिस्तान को लेकर एक नये तरह की सनक के शिकार हैं। सन 2014 तक पाकिस्तान सार्वजनिक बहस से लगभग गायब हो चुका था। भारत उससे कई गुना आगे निकल चुका था। लेकिन पिछले पांच साल में हालात बदल गए हैं।

देश की संसद में नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) पर बहस के दौरान पाकिस्तान का नाम बार-बार आया। झारखंड के चुनाव प्रचार में भी उसका उल्लेख हुआ। अमित शाह ने पूछा कि चाहे सर्जिकल स्ट्राइक हो, बालाकोट एयर स्ट्राइक हो या सीएबी हो, कांग्रेस का नजरिया पाकिस्तान को लेकर एक जैसा क्यों रहता है? नरेंद्र मोदी ने भी प्रचार के दौरान भाषणों में ऐसा ही रुख दिखाया। भारत की घरेलू राजनीति में उसे जानबूझकर पाकिस्तान से जोड़ दिया गया है। 


लवामा के बाद 2019 का चुनाव इस थीम पर आधारित था कि आप पाकिस्तान के साथ हैं या हमारे साथ। इंडिया टुडे की डेटा टीम ने उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार और महाराष्ट्र मे मोदी के दिए भाषणों का विश्लेषण किया और पाया कि इनमें पाकिस्तान का जिक्र 90 बार आया। हरियाणा और महाराष्ट्र में यह सिलसिला जारी रहा। अब पाकिस्तान हमारे जीवन और हमारी बहस में 18 वर्ष पहले हुए ऑपरेशन पराक्रम की तुलना में ज्यादा गहराई से मौजूद है।

सीएबी को लेकर पूरी बहस पाकिस्तान और विभाजन के अलावा वहां अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे दुव्र्यवहार पर केंद्रित रही। कहा गया कि यह भारत का दायित्व है कि वह पाकिस्तान के गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों की देखभाल करे क्योंकि एक इस्लामिक मुल्क होने के नाते वह स्वाभाविक रूप से मुस्लिमों का देश है। इसका स्पष्ट मतलब था कि भारत ने खुद को हिंदुओं, सिखों और भारतीय उपमहाद्वीप के गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों  के देश के रूप में देखना शुरू कर दिया। ठीक वैसे ही जैसे पाकिस्तान खुद को मुस्लिमों के देश के रूप में देखता है। यह बात अलग है कि पाकिस्तान तथाकथित बिहारियों और तत्कालीन पश्चिमी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में रह गए उर्दूभाषियों से नफरत करता रहा।

कुछ हालिया बहसों को सुनकर पाकिस्तान की बहसें याद आती हैं। जिसमें भारत के प्रति असुरक्षा, शत्रुता और नफरत भरी रहती है। राजनीति को दोबारा बंटवारे के दौर में ले जाने और उस दौर की गलतियां सुधारने के नाम पर पाकिस्तान को नये सिरे से तवज्जो दी जा रही है जब तक हम उसे बहुत पीछे छोड़ चुके हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच का अंतर अब इतना ज्यादा है कि अब कोई मुल्क यहां तक कि चीन भी, दोनों देशों का एक साथ नाम नहीं लेता। लेकिन हम दोबारा उसकी वापसी करा रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि बिना असुरक्षा की खोज किए राष्ट्रीय सुरक्षा राज्य कैसे बनेगा? 

इसके लिए पहले एक भयंकर शत्रु की आवश्यकता होती है। वह शत्रु है पाकिस्तान। यह अपने आप में अगर बड़ा शत्रु नहीं है तो भी व्यापक इस्लामिक खतरे के साथ यह बड़ा शत्रु बन जाता है। इससे देश के 20 करोड़ मुस्लिमों का संदेह के घेरे में आना एक मामूली नुकसान माना जाता है। आइए सन 1947 में नये इतिहास की शुरुआत वाले दोनों देशों पर एक दृष्टि डालते हैं। उन्होंने अलग-अलग रास्ते चुने। एक उदार, संवैधानिक गणराज्य बन गया तो दूसरा बहुसंख्यकवादी, वैचारिक, सैन्य राज्य बना। एक निर्गुट रहा तो दूसरा अपने दौर के अहम सैन्य गठजोड़ों का हिस्सा बना। 25 वर्ष से भी कम अवधि में उस वैचारिक राष्ट्र का विभाजन हो गया और तीसरा राष्ट्र अस्तित्व में आ गया। जल्दी ही यह नया देश भी उसी देश की राह पर चल निकला जिससे वह अलग हुआ था। उसने भी इस्लामिक और सैन्य शासन अपना लिया। दो दशक तक वह बीमारियों, अत्यधिक आबादी से लेकर गरीबी तक से जूझता रहा। 

अमेरिकी लेखक पी जे रूर्क ने अपने संग्रह 'ऑल द ट्रबल इन द वल्र्ड' में एक ऐसी पंक्ति  लिखी है जो अपमानित करती हुई लेकिन तथ्यात्मक है। उन्होंने लिखा: 'एक ऐसा देश जिसके पास पर्याप्त भोजन तक नहीं है वहां मल की इतनी बदबू जाने कहां से आती है?' जल्दी ही यह नया देश अपने संस्थापक के धर्मनिरपेक्ष और आधुनिक विचारों की ओर लौट गया जो काफी हद तक भारत से मेल खाते थे। अगले दो दशक में वह हर सामाजिक-आर्थिक संकेतक पर पाकिस्तान से ऊपर निकल गया। कई मानकों पर तो वह भारत से भी आगे निकल गया है। 48 वर्ष पूर्व भारत ने ही उसकी आजादी में मदद की थी। रूर्क ने जिस देश को भुखमरी और खुले में शौच का उदाहरण बताया था वह अब इन दोनों से मुक्त है।

उसकी आबादी की बढ़ोतरी नाटकीय रूप से कम हुई और एक फीसदी वार्षिक के भारत के स्तर पर आ गई। यह उस विचारधारा से निजात पाने की वजह से हुआ जिसका संक्रमण उसे पाकिस्तान से लगा था। इस बीच जब सोवियत संघ अफगानिस्तान में दाखिल हुआ तो पाकिस्तान को अहसास हुआ कि उसकी भौगोलिक स्थिति उसके लिए फायदे का सौदा है। इस शीतयुद्ध में उसे सैन्य मदद भी मिली और आर्थिक सहायता भी। सन 1981 के आसपास उसने भारत के खिलाफ भी वही अफगान तौर तरीका अपनाना चाहा। नतीजा? सन 1985 में अपनी पहली पाकिस्तान यात्रा के दौरान मैं यह देखकर चकित रह गया कि पाकिस्तान कितना बेहतर दिखता था। उसकी प्रति व्यक्ति आय भारत से 65 फीसदी ज्यादा थी। सन 2019 में भारत की प्रतिव्यक्ति आय पाकिस्तान से 60 फीसदी अधिक है। यह कैसे हुआ? तमाम सामाजिक-आर्थिक संकेतकों पर पाकिस्तान औंधे मुंह है। 

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की 13वीं सहायता वह हजम कर चुका है। उसकी आबादी की वृद्धि दर भारत और बांग्लादेश से दोगुनी है। फिर भी वह सैन्य वर्चस्व वाला देश है जिसका प्रधानमंत्री सेना प्रमुख को सलाम करता है। वह एक क्षेत्र में भारत से आगे है और वह हैं परमाणु हथियार। परंतु जैसा कि सामरिक अध्ययन के जानकार स्वर्गीय के सुब्रमण्यम कहते थे: जब कम पर्याप्त हों तो ज्यादा की क्या जरूरत? 

भारत ने जिस तरह पाकिस्तान को अपनी घरेलू राजनीति में शामिल किया है वह उसके लिए ठीक नहीं है। पाकिस्तान के साथ तुलना के लिए भारत को बहुत नीचे गिरना पड़ेगा। भगवान न करे लेकिन दूसरा तरीका यह है कि हम वैचारिक, राष्ट्रीय सुरक्षा राज्य बनने के उसके प्रयोगों से प्रेरित होकर भारत के लिए वैसा ही भविष्य बनाएं। लेकिन इस त्रासदी से बचा जाना चाहिए।
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