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हालात से और मजबूत होंगे सैम्यूल जिरवा

ऋत्विक शर्मा /  December 13, 2019

संसद के दोनों सदनों ने विवादास्पद नागरिकता (संशोधन) विधेयक को पारित कर दिया जिसके बाद पूर्वोत्तर के राज्यों में व्यापक पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। आबादी के एक हिस्से में रोष बढ़ गया है और खासतौर पर उस क्षेत्र में छात्रों का विरोध प्रदर्शन ज्यादा देखा जा रहा है जहां सत्तासीन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के सांसदों की तादाद (25 में से 18) अच्छी खासी है। इस विरोध प्रदर्शन की वजह यह भी है कि विपक्ष में कोई ऐसा प्रभावशाली नेता नहीं है जो उनकी चिंताओं को आवाज दे सके। ज्यादातर विरोध प्रदर्शन बिखरे हुए हैं और इन प्रदर्शनों का नेतृत्व कोई भी नहीं कर रहा है। यहां की मूल आबादी की यह चिंता बढऩे लगी है कि आप्रवासी कहीं उनकी जमीन पर कब्जा न कर लें। और इसी डर की वजह से वे बड़ी तादाद में सड़कों पर उतर रहे हैं। इन समूहों में से नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (एनईएसओ) विरोध प्रदर्शन की एक प्रमुख कड़ी के तौर पर उभरा है जिसकी शुरुआत तब हुई जब इस विधेयक को जुलाई 2016 में लोकसभा में पेश किया गया था।

 
एनईएसओ की कमान सैम्यूल जिरवा के हाथों में है। मेघालय के शिलॉन्ग में सेंट एंटनी कॉलेज से अर्थशास्त्र विषय से स्नातक करने वाले 45 साल के जिरवा करीब तीन दशकों से छात्र राजनीति से जुड़े रहे हैं। वह साल 2002 से 2012 के दौरान खासी स्टूडेंट्स यूनियन (केएसयू) के अध्यक्ष भी रहे। इस अवधि के दौरान वह एनईएसओ के प्रचार सचिव भी रहे हैं। वर्ष 2012 में उन्हें एनईएसओ का अध्यक्ष चुना गया। जिरवा एक निजी कंस्ट्रक्शन कंपनी के ठेकेदार थे। केएसयू से अलग होने के बाद उन्होंने शादी की और उनकी एक तीन साल की बेटी है। केएसयू का गठन 1978 में हुआ था और वह खासी समुदाय के लिए छात्र राजनीति के प्रभाव का गवाह रहे हैं। उनकी परवरिश एक ऐसे परिवार में जिसमें सरकारी नौकरी करने वाले लोग थे। उनके पिता अकाउंटेंट जनरल ऑफिस में थे जबकि उनकी मां स्वास्थ्य विभाग में थीं। वह कहते हैं, 'हम अपने बचपन से देखते आ रहे हैं कि कैसे केएसयू ने हमारे लोगों की सुरक्षा के लिए कोशिश की।'
 
इस छात्र संगठन की एक सबसे बड़ी चिंता यह रही है कि यहां बांग्लादेश के लोगों की तादाद बढ़ रही है। इसके अलावा इस संगठन का जोर छात्रों के कल्याण, शैक्षणिक बुनियादी ढांचे और सामुदायिक स्वास्थ्य पर रहा है। 1980 के दशक से ही केएसयू खासी पहाडिय़ों में यूरेनियम के खनन के प्रस्ताव का पूरी सक्रियता से विरोध करती रही है। नार्थ ईस्ट स्टूडेंट्स समन्वय समिति का गठन 1990 के दशक की शुरुआत में हुआ था जिसका नाम 1993 में एनईएसओ हो गया। यह सिक्किम को छोड़कर पूर्वोत्तर के सभी राज्यों के शीर्ष छात्र संगठन का समन्वय करने वाली एक संस्था है। इसके आठ सदस्यों में से दो मेघालय से हैं जिनमें गारो छात्र संगठन भी शामिल है। बाकी में नगा स्टूडेंट्स फेडरेशन, ऑल अरुणाचल प्रदेश स्टूडेंट्स यूनियन, ऑल मणिपुर स्टूडेंट्स यूनियन, त्विप्रा स्टूडेंट्स फेडरेशन और मिजो जिरलाई पॉल शामिल हैं। इनमें से हरेक छात्र संगठन अपने एक सदस्य का मनोनयन एनईएसओ में प्रतिनिधित्व करने के करता है। जिरवा कहते हैं, 'एनईएसओ जमीनी स्तर पर एक प्रमुख संगठन के तौर पर काम करता है। हम नागरिकता (संशोधन) विधेयक के खिलाफ एक ठोस आवाज के तौर पर उभरने में सफल रहे हैं भले ही भारत सरकार ने पूर्वोत्तर के लोगों को अनुसूची छह वाले क्षेत्रों को छूट देने और इनर लाइन परमिट वाले राज्यों के आधार पर बांटने की कोशिश की है और मणिपुर में आईएलपी लागू कर दिया है।' अनुसूची छह के तहत पूर्वोत्तर के चार राज्यों असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के आदिवासी क्षेत्रों का स्वायत्त प्रशासन आता है। वहीं इनर लाइन परमिट एक यात्रा दस्तावेज है जिसे भारत सरकार अपने नागरिकों के लिए जारी करती है ताकि वे किसी संरक्षित क्षेत्र में किसी खास अवधि के लिए यात्रा कर सकें।
 
2016 में संशोधन विधेयक का मसौदा तैयार किए जाने के बाद जब इसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया तब ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन और एनईएसओ के नेताओं ने इस बाबत मुलाकात की। समिति ने इस साल जनवरी में संसद में एक रिपोर्ट जमा की। इसके बाद ही पूर्वोत्तर में इसको लेकर विरोध प्रदर्शन होने लगे, हालांकि उस वक्त प्रदर्शन बहुत उग्र नहीं था। राज्यसभा में पारित न होने की वजह से यह विधेयक रद्द हो गया। धार्मिक प्रताडऩा के कारण 31 दिसंबर 2014 तक अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से भारत आए गैर मुस्लिम शरणार्थी हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के लोगों को भारतीय नागरिकता प्रदान करने का विधेयक में प्रावधान किया गया है। जिरवा कहते हैं, 'कल को दूसरे देशों के लोग भी आ सकते हैं और वे आसानी से कह सकते हैं कि वे 10 साल पहले आए। जिसके पास कोई दस्तावेज नहीं है उनके बारे में आप यह कैसे कह सकते हैं कि वे आज बाहर से आए हैं या 20 साल पहले आए हैं?'
 
प्रदर्शनों के दौरान हिंसा होने पर अफसोस जताते हुए वह कहते हैं कि विधेयक पर विरोध जताने के लिए संसद में इस क्षेत्र के प्रतिनिधियों का पूरा समर्थन नहीं मिला। वह कहते हैं, 'यह दुख की बात है कि हमारे राजनीतिक प्रतिनिधि भी अपने गठबंधन की तर्ज पर ही चलते हैं। जो लोग भाजपा के सहयोगी हैं उन्होंने इस विधेयक पर सरकार का समर्थन कर दिया, बिना यह सोचे कि इससे उनके लोगों की जिंदगी और उनके भविष्य पर असर पड़ेगा या नहीं। इसी वजह से लोग भड़के हुए हैं और सड़कों पर उतर आए हैं। उन्होंने अपना मन बना लिया है। वे संघ के एजेंडा को बढ़ाना चाहते हैं।' उनका कहना है कि एनईएसओ उच्चतम न्यायालय में भी जाएगा क्योंकि वहीं से न्याय मिलने की थोड़ी उम्मीद बची है।
 
1991 में छात्र राजनीति से जुड़े जिरवा क्या मुख्यधारा की राजनीति से जुड़ेंगे? वह कहते हैं, 'पूर्वोत्तर के छात्र संगठन सीधे तौर पर किसी राजनीतिक दल से नहीं जुड़े हैं जैसा कि भारत के अन्य हिस्से में होता है। लेकिन यहां छात्र संगठन नस्लीय आधार पर आधारित है।' उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ छात्र नेता सक्रिय राजनीति से जुड़ सकते हैं। लेकिन वह अपने बारे में इस तरह की कयासों से इनकार करते हैं। हालांकि वह यह भी कहते हैं, 'अगर हालात की ऐसी मांग होगी तब हम भी राजनीति से जुड़ सकते हैं। हम आगे देखेंगे कि क्या करना है।'
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