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येदियुरप्पा और उनके पुत्र की मेहनत से कर्नाटक में जीत

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  December 13, 2019

आलोचना करने वाले फिलहाल खामोश हैं।  चुनौती देने वालों ने भी अपनी तलवारें कम से कम अभी तो अपनी म्यान में रख ली हैं। बीएस येदियुरप्पा ने अपने मित्रों और खासतौर पर अपने परिवार की बदौलत ऐसी वापसी की है जो खुद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर कई के लिए ईष्र्या की वजह बन गई होगी। ऐसे लोगों में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी शामिल हैं। फडणवीस महाराष्ट्र में मिली हार से उबरने का प्रयास कर रहे हैं। उन्हें यह देखना चुभा होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा संसदीय दल की बैठक में सांसदों से येदियुरप्पा का खड़े होकर स्वागत करने को कहा। ऐसा इसलिए क्योंकि कर्नाटक उपचुनाव में जीत के बाद राज्य की भाजपा सरकार पूरी तरह स्थिर हो गई है। 

 
यह सच है कि येदियुरप्पा ने उपचुनाव जीतने में अपनी सारी ताकत झोंक दी। भाजपा को 2018 के विधानसभा चुनाव में 224 में से 105 सीटों पर जीत मिली थी। कांग्रेस को 78 और जनता दल सेक्युलर को 37 सीटें मिली थीं। येदियुरप्पा ने सरकार बनाने का प्रयास किया लेकिन वह नाकाम रहे और आखिरकार उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर ने मिलकर गठबंधन सरकार बनाई और भाजपा को भारी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा। परंतु येदियुरप्पा के लिए यह व्यक्तिगत झटका था। जब उन्हें 2016 में पार्टी अध्यक्ष बनाया गया था तो उन्हें काफी गुटबाजी संभालनी पड़ी। कुरुबा (गड़रिया) समुदाय के के एस ईश्वरप्पा ने अपनी जाति के लोगों को एकजुट किया और लिंगायत (येदियुरप्पा) और वोक्कालिंगा (एचडी देवेगौड़ा) दोनों समुदायों से मुकाबला किया जा सके। वोक्कालिंगा सदानंद गौड़ा और लिंगायत जगदीश शेट्टार को कई शिकायतें थीं। उन्हें बीएल संतोष के रूप में एक सुनने वाला मिला जो आरएसएस और भाजपा के बीच समन्वयक थे। इन बातों से निजात पाना आसान नहीं था। लेकिन उसके बाद विधानसभा चुनावों में येदियुरप्पा को सांत्वना से संतुष्ट होना पड़ा, हालांकि उन्हें लगा था कि वह प्रथम आए हैं। 
 
अब हालात बदल चुके हैं। कुछ सप्ताह पहले तक कर्नाटक और महाराष्ट्र में खास अंतर नहीं था। दोनों राज्यों में किसी तरह सत्ता चल रही थी। लेकिन फडणवीस फिसल गए जबकि येदियुरप्पा कर्नाटक के मतदाताओं को समझाने में कामयाब रहे कि यह मतदान विधायक (ये कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर से भाजपा में आए विधायक थे) के लिए नहीं बल्कि पार्टी के लिए हो रहा है। कर्नाटक में जीत के पीछे क्या वजह रही? यकीनन येदियुरप्पा की मेहनत। मुख्यमंत्री कम ही इतनी मेहनत करते नजर आते हैं। वह हर विधानसभा क्षेत्र में दो से तीन बार गए। उन्होंने कुल 50 यात्राएं कीं। भाजपा पुराने मैसूर में जीती जो वोक्कालिंगा समुदाय और जनता दल सेक्युलर तथा कांग्रेस का गढ़ है। मांड्या जिले की कृष्ण राजा पेट सीट जहां भाजपा को इससे पहले के चुनावों में 10,000 वोट से ज्यादा नहीं मिले वहां जनता दल सेक्युलर के पूर्व विधायक नारायण गौड़ा इस बार 9,000 से अधिक मतों से जीते। वह उन 17 विधायकों में शािमल थे जिन्होंने इस्तीफा देकर भाजपा की सरकार बनने की राह आसान की थी। यह जीत दोहरे महत्त्व की है। एक तो यहां चुनाव प्रबंध की कमान येदियुरप्पा के छोटे बेटे विजयेंद्र के हाथ में थी। निवर्तमान कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्घरमैया 2018 के विधानसभा चुनाव में इसी क्षेत्र की वरुणा सीट से चुनाव लड़े थे। विजयेंद्र उनके खिलाफ चुनाव लडऩा चाहते थे लेकिन अंतिम समय में पार्टी ने यह सीट बीएल संतोष समर्थित प्रत्याशी को दे दी। कांग्रेस ने सिद्घरमैया के बेटे यतींद्र को उतारा जो यहां से जीत गए। परंतु आखिरकार केआर पेट सीट छीनकर विजयेंद्र ने अपनी हैसियत दर्ज कराई। 
 
येदियुरप्पा का कार्य क्षेत्र और प्रभाव क्षेत्र शिमोगा है। परंतु वह केआर पेट में पैदा हुए थे। विजयेंद्र ने अपनी नीति में इस बात को शामिल किया। 2 लाख मतदाताओं वाले इस क्षेत्र में करीब 93,000 वोक्कालिंगा मतदाता हैं। तार्किक रूप से देखें तो लिंगायतों की पार्टी कही जाने वाली भाजपा के लिए यहां जाति का कार्ड खेलना असंभव था। इसके बजाय विजयेंद्र ने अपने प्रचार में यह छवि पेश की कि वह अपने पिता की जमीन पर वापस आए हैं। लोगों ने कहा कि भाजपा पुराने मैसूर में कभी नहीं जीत सकती। जवाब में विजयेंद्र कहते कि अगर अमित शाह भाजपा को बंगाल में जिता सकते हैं तो भाजपा यहां भी जीत सकती है। 
 
एक बात को बिल्कुल ठीक-ठीक समझने की आवश्यकता है कि कर्नाटक उपचुनावों में भाजपा को जीत मिली, उम्मीदवारों को नहीं। येदियुरप्पा के आलोचक अब अपना ध्यान शासन-प्रशासन की कमियों पर केंद्रित करेंगे लेकिन विजयेंद्र ने भाजपा के लिए एक ऐसी राजनीतिक राह खोली है जो अब तक बंद चली आ रही थी। कर्नाटक के राजनीतिक भविष्य को समझने के लिए विजयेंद्र तथा पार्टी के अन्य युवा नेताओं पर आने वाले दिनों में नजर रखनी होगी। 
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