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अलग-अलग रुख

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  December 13, 2019

अर्थव्यवस्था को लेकर अलग-अलग रुख अपनाया जा रहा है और सत्ताधारी दल की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं इतनी ज्यादा हैं कि उनकी अनदेखी करनी संभव नहीं है। नरेंद्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के आरंभ से ही यह स्पष्ट रहा है कि सरकार के लिए राजनीति अर्थव्यवस्था से ऊपर है। ऐसा 2014 में मोदी के लंबे चौड़े भाषण के बावजूद था। आज यह कहीं अधिक स्पष्ट है: अर्थव्यवस्था की महत्ता आज राजनीतिक संबद्धता के बुनियादी नियमों से भी कमतर रह गई है जहां संघ परिवार के लंबे समय से चले आ रहे नारों को अमली जामा पहनाया जा रहा है। आप दलील दे सकते हैं कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने चुनावी जनादेश हासिल किया है। जब इंदिरा गांधी राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई लड़ रही थीं। तब जनादेश और बड़ा था। इसके चलते ही उन्होंने वाम रुझान वाली आर्थिक नीति अपनाते हुए बड़े पैमाने पर राष्ट्रीयकरण किया, प्रतिबंधात्मक श्रम कानून बनाए और तथा ऐसे ही अन्य कानून पारित किए। उन्होंने भू-कानूनों को भी कड़ा किया। अर्थव्यवस्था आज तक राजनीति को दी गई उस वरीयता की कीमत चुका रही है। क्या इतिहास अपने आपको दोहराएगा?

 
बड़े बदलाव टुकड़ों में नहीं आते हैं और फिलहाल काफी कुछ छिटपुट तरीके से हो रहा है। यह सब उस नई बहस का हिस्सा हो सकता है जिसमें राष्ट्रीय नागरिक पंजी द्वारा संभावित अशांति भी शामिल है। भाजपा चाहे जितनी दबदबे वाली पार्टी बन गई हो, घरेलू राजनीतिक हालात दर्शाते हैं कि केंद्र और राज्य के स्तर पर तस्वीर एकदम विरोधाभासी है। भाजपा के लिए चुनौतियां लगातार बरकरार हैं। हिंदुत्व के एजेंडे के साथ हिंदी प्रदेश में जीत सुनिश्चित करने के उसके प्रयास ने उसे तमाम तरह की अल्पसंख्यक आबादी के सामने ला खड़ा किया है। इसके परिणाम का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। पूर्वोत्तर में इनर लाइन जैसी परिवर्ती व्यवस्था अब स्थायी स्वरूप ले रही है और इसका विस्तार हो रहा है। इससे देश नये तरीके से बंट रहा है। असम में नये सिरे से समस्या शुरू हो गई है जबकि कश्मीर में आम जनता लगातार पांचवें महीने तमाम प्रतिबंधों से गुजर रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो पश्चिम के उदार लोकतांत्रिक देशों ने जिन वजहों से अधिनायकवादी चीन पर भारत को तवज्जो दी थी और उसके साथ आपसी रिश्ते कायम किए उन पर भी अब सवालिया निशान लग गए हैं। 
 
अमेरिका और यूरोप में आलोचना की जा रही है जो आगे और बढ़ेगी। पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में प्रतिक्रिया नजर भी आने लगी है। कमजोर भारतीय अर्थव्यवस्था के चलते चीन से मिल रही चुनौती का सामना करना मुश्किल होता जाएगा, क्योंकि उसने भारत की तरह अपनी गति नहीं खोई है। दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था के नाते भारत आकर्षक बाजार बना रहेगा लेकिन उसने जो गति खो दी उसका असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नजर आएगा। आर्थिक कूटनीति के मामले में हालात उलट गए हैं जिससे हम अप्रभावित नहीं रह सकते। सन 2020 में अर्थव्यवस्था में कुछ हद तक सुधार की अपेक्षा की जा सकती है लेकिन तत्काल पहले जैसी तेज आर्थिक वृद्धि हासिल करने की राह में बड़ी बाधाएं हैं। वित्तीय क्षेत्र की दिक्कतें कायम हैं और छोटे और मझोले उपक्रम संघर्षरत हैं। कृषि के मोर्चे पर दिक्कत है और निर्यातक मुद्रा नीति के कारण परेशानी में हैं। वृहद आर्थिक मोर्चे पर बात करें तो राजकोषीय स्थिति बुरी है क्योंकि केंद्र अपने बिल तक चुकाने की स्थिति में नहीं है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी)में कुछ बुनियादी समस्या हैं जो कर के मोर्चे पर भी दिक्कतदेह बनी हुई हैं। चुनाव पूर्व कर दरों में कमी ने हालात और खराब किए। 
 
मौद्रिक नीति की अपनी सीमाएं हैं और बहुत अधिक गुंजाइश नजर नहीं आ रही। जीएसटी राजस्व में कमी के कारण सरकार की निजी बेहतरी की प्रतिबद्धताएं अब मुश्किल में हैं। इनमें चुनाव पूर्व किसानों को धन राशि देने का वादा भी शामिल है। इन वादों पर अमल अपने साथ राजकोषीय फिसलन लाएगा और इसके लिए ऋण लेना पड़ सकता है जो जीडीपी के अनुपात में सरकारी कर्ज में इजाफा करेगा। परिवहन के बुनियादी ढांचे में भारी निवेश से भी अपेक्षित प्रतिफल नहीं मिला जबकि बिजली क्षेत्र में अव्यवहार्यता बरकरार है। भाजपा की राजनीतिक दबदबे और संबद्धता के नियमों का पुनर्लेखन बताता है कि उसकी प्राथमिकताएं कितनी गलत हैं। ऐसे में शायद वापसी मुश्किल हो जाए। अनुमान यह है कि अगले आम चुनाव से पहले आर्थिक स्थिति सुधर जाएगी लेकिन अगर मौजूदा दिशा नहीं बदली गई तो ऐसे अनुमान गलत साबित होंगे। सरकार को इस पर अधिक ध्यान देना चाहिए। 
Keyword: india, economy, GDP, narendra modi,,
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