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एनबीएफसी के नियम होंगे सख्त

सुब्रत पांडा / मुंबई December 13, 2019

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) अब गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफासी) और सहकारी बैंकों के लिए भी अधिसूचित वाणिज्यिक बैंकों की तरह सख्त नियम-कायदे का अनुपालन सुनिश्चित करने की तैयारी कर रहा है। आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड की आज हुई बैठक में 'प्रवर्तन नीति और प्रारूप' का दायरा बढ़ाने पर विचार किया गया। अभी इसके दायरे में वाणिज्यक बैंक आते हैं लेकिन अब इसमें एनबबीएफसी और सहकारी बैंक भी आएंगे। इसके तहत एनबीएफसी और सहकारी बैंकों पर भी अधिसूचित वाणिज्यिक बैंकों की तरह ही निगरानी मोर्चे पर पहल करनी होगी। वर्तमान में एनबीएफसी और सहकारी बैंकों के संचालन के लिए अलग नियमन हैं, जो बैंकों की तरह सख्त नहीं हैं। केंद्रीय बैंक ने निरीक्षण विभाग नाम से एक नए विभाग का गठन किया है जिसके पास आरबीआई के नियमन दायरे में आने वाली सभी इकाइयों की निगरानी की जिम्मेदारी होगी। आरबीआई ने इस मकसद के लिए एक अलग निगरानी कैडर तैयार किया है। 
 
आरबीआई के विनियमन में आने वाली सभी इकाइयों के लिए समान निगरानी नियम लागू होंने और उसके उल्लंघन पर जुर्माना भी एकसमान होगा। ऐसे में अगर 'प्रवर्तन नीति और प्रारूप' के दायरे में एनबीएफसी और सहकारी बैंकों को भी शामिल किया जाता है तो उन्हें संपत्ति श्रेणी में विचलन का खुलासा करना होगा और अपने अंकेक्षित वित्तीय विवरण में उसके लिए प्रावधान करना होगा। अभी तक एनबीएफसी और सहकारी बैंकों को इस तरह के खुलासे और प्रावधान से छूट मिलती रही है। देश में 98,000 से अधिक सहकारी बैंक और 10,000 से अधिक एनबीएफसी हैं। ऐसे में आरबीआई मुख्य रूप से शीर्ष 50 सहकारी बैंकों और एनबीएफसी पर ध्यान केंद्रित कर सकता है। आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार अधिसूचित शहरी सहकारी बैंकों की संख्या केपल 54 हैं, वहीं केंद्रीय बैंक पहले से ही रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण 50 प्रमुख एनबीएफसी की निगरानी कर रहा है। अगर आरबीआई इस दिशा में आगे बढ़ता है और नया अनुपालन ढांचा को अनिवार्य बनाता है तो इन इकाइयों की दैनिक आधार पर जांच करना उसके लिए काफी कठिन होगा।
 
वर्ष 2017 में आरबीआई ने कहा था कि बैंकों को उसके बारे में समुचित खुलासा करना होगा अगर केंद्रीय बैंक के आकलन में अतिरिक्त प्रावधान करने की जरूरत संबंधित बैंक के कर बाद शुद्घ मुनाफे से 15 फीसदी अधिक हो। इसके अलावा एनबीएफसी और सहकारी बैंकों के सांविधिक ऑडिटरों की ओर से किसी तरह की गड़बड़ी होती है और ऋणदाता की वित्तीय स्थिति की सही तस्वीर सामने नहीं लाई जाती है तो इसके लिए ऑडिटरों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। बैंकों के लिए पहले से ही इस तरह के नियम लागू हैं। आईएलऐंडएफएस और पंजाब ऐंड महाराष्ट्र सहकारी बैंक के धराशायी होने से सांविधिक ऑडिटरों द्वारा की जाने वाले ऑडिट की गुणवत्ता पर सवाल उठा रहे हैं। राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण के हालिया मूल्यांकन में पाया गया कि डेलॉयट हसकिंस ऐंड सेल्स अकाउंटिंग के मानकों का अनुपालन करने में विफल रही और आईएलऐंडएफएस फाइनैंशियल सर्विसेज के मामले में अपनी स्वतंत्रता के साथ समझौता किया और मोटी शुल्क पर प्रतिबंधित गैर-ऑडिटिंग सेवाएं मुहैया कराई।
Keyword: NBFC, bank, payment, RBI,,
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