बिजनेस स्टैंडर्ड - असम में क्यों हो रहा है विधेयक का विरोध
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Sunday, October 25, 2020 09:15 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम जिरह खबर

असम में क्यों हो रहा है विधेयक का विरोध

साई मनीष /  12 12, 2019

नागरिकता संशोधन विधेयक

असमिया समुदाय को डर है कि बांग्लाभाषियों की बढ़ती आबादी से बदलेगा
राज्य का सामाजिक-सांस्कृतिक स्वरूप

बिजनेस स्टैंडर्ड असम में क्यों हो रहा है विधेयक का विरोधनागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) को लेकर पूर्वोत्तर बंटा हुआ है। खासकर असम में इसका भारी विरोध हो रहा है। बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए गैर मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता देने के मोदी सरकार के फैसले का असम में छात्र, राजनीतिक दल और सिविल सोसाइटी संगठन कड़ा विरोध कर रहे हैं। असमिया समुदाय को लगता है कि बांग्लाभाषियों की बढ़ती आबादी के कारण उनका सामाजिक-सांस्कृतिक अस्तित्व खतरे में है। असमिया लोगों को सीएबी से क्या खतरा है? इसके जवाब का एक हिस्सा पड़ोसी देश बांग्लादेेश से ताल्लुक रखता है जहां से पिछले कई वर्षों के दौरान लाखों लोग भारत आए हैं। बांग्लादेश में 1951 में बांग्लाभाषी हिंदुओं की आबादी 22 फीसदी थी। 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्घ और बांग्लादेश के अलग देश बनने के बाद वहां से बड़ी संख्या में लोग असम आए। 

बांग्लादेश की सीमा असम से लगती है। बांग्लादेश में 1981 में करीब एक करोड़ यानी 12 फीसदी हिंदू थे। लेकिन 2011 तक 30 वर्षों के दौरान वहां हिंदुओं की आबादी महज 10 लाख बढ़ी। आज बांग्लादेश की आबादी में केवल 8.5 फीसदी हिंदू हैं। इन 30 वर्षों के दौरान वहां मुसलमानों की आबादी 10 करोड़ से अधिक बढ़ी। बांग्लादेश में हिंदू आबादी मुसलमानों से अधिक गरीब है, उनकी प्रजनन दर कम है और उनकी जीवन प्रत्याशा भी कम है।

पाकिस्तान में उत्पीड़न के कारण हिंदुओं का पलायन हुआ जबकि बांग्लादेश से पलायन के आर्थिक कारण थे। कई वर्षों के दौरान हिंदू और मुसलमान बांग्लादेश से असम आए। बेल्जियम की संस्था इंटरनैशनल यूनियन फॉर साइंटिफिक स्टडी ऑफ पॉपुलेशन ने 21 वर्षों के पलायन के आंकड़ों का अध्ययन किया। इनमें से 18 वर्षों के दौरान बांग्लादेश से भारत आने वाले हिंदुओं की संख्या मुसलमानों से अधिक थी। अध्ययन के मुताबिक बांग्लाभाषी हिंदू और मुसलमानों की 86 फीसदी आबादी 1992 से 2004 के दौरान भारत आई। 

बांग्लादेश से होने वाले इस पलायन के कारण असम की जनांकीय स्थिति में भी भारी बदलाव हुआ। 1961 में राज्य में 70 लाख असमिया भाषी लोग थे जबकि बांग्ला बोलने वालों की आबादी 20 लाख थी। 2011 में बांग्लाभाषियों की आबादी करीब चार गुना बढ़कर 90 लाख पहुंच गई जबकि इस दौरान असमिया बोलने वाले लोगों की जनसंख्या केवल दोगुना बढ़कर 1.5 करोड़ पहुंची। यानी बांग्लादेश में बांग्लाभाषी हिंदुओं की संख्या में कमी आ रही है जबकि असम में उनकी आबादी बढ़ रही है। असम में 1991 से अजीबोगरीब घटनाक्रम दिखाई देता है।

बिजनेस स्टैंडर्ड असम में क्यों हो रहा है विधेयक का विरोधअसम में 1991 से 2011 के बीच बांग्लाभाषियों की संख्या हिंदुओं की कुल आबादी से थोड़ा ज्यादा और मुसलमानों की आबादी से थोड़ा कम बढ़ी। इस दौरान असमिया बोलने वाले लोगों की संख्या हिंदू या मुसलमान आबादी से आधी बढ़ी। 1991 से 2011 तक असमिया भाषी लोगों की संख्या केवल 20 लाख बढ़ी। इस दौरान बांग्लाभाषी हिंदू और मुसलमान दोनों की आबादी करीब 40 लाख बढ़ी। यानी असम में सबसे ज्यादा बांग्लाभाषियों की ही आबादी बढ़ रही है और यही वजह है कि असमिया समुदाय को अपनी सामाजिक-संस्कृति पहचान खोने की आशंका है।

असमिया समुदाय को डर है कि सीएबी के कारण उसका सामाजिक-सांस्कृतिक अस्तित्व पूरी तरह खत्म हो जाएगा। असम में बांग्ला भाषा और संस्कृति हावी हो रही है। मोदी सरकार ने सीएबी में शरणार्थियों के लिए नागरिकता पाने की कट ऑफ तिथि 31 दिसंबर, 2014 रखी है। यह 1985 के असम समझौते को निरस्त कर देगा जिसमें कट ऑफ तिथि 25 मार्च, 1971 रखी गई थी। सीएबी को संसद की मंजूरी असम समझौते को निरस्त कर देगी और राष्ट्रीय नागरिक पंजिका (एनआरसी) के डर से दूसरे राज्यों को पलायन कर चुके या एनआरसी से बाहर रह गए बांग्लाभाषी भारत की नागरिकता के हकदार होंगे। इस तरह उन्हें असम में रहने, काम करने और परिवार पालने का अधिकार मिलेगा जहां उनका मजबूत सामुदायिक तानाबाना है। 

असम में चल रहा विरोध प्रदर्शन 1980 के दशक के बांग्ला विरोधी आंदोलन की याद दिलाता है। ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) ने 1979 से 1985 तक चले उस आंदोलन की अगुआई की थी और इस बार भी सीएबी के खिलाफ वही सबसे अधिक मुखर है। 1980 के दशक में बांग्ला विरोधी आंदोलन में व्यापक हिंसा हुई थी जिसमें नेली और खोइराबारी नरसंहार भी शामिल है। असम में 1960 के दशक से बांग्ला विरोधी आंदोलन का इतिहास रहा है। 1960 में शुरू हुआ कुख्यात 'बोंगाल खेड़ा' आंदोलन में बांग्लाभाषी हिंदुओं के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन हुए थे और बांग्ला भाषा के स्कूलों को असमिया में बदला गया था। असम में जिस तरह हर दिन विरोध प्रदर्शन बढ़ रहा है, उसके मद्देनजर मोदी सरकार के सीएबी से राज्य में बांग्ला विरोधी ङ्क्षहसा का दौर फिर से शुरू होने की आशंका है। 
Keyword: Citizenship Amendment Bill, parliament, amit shah, north east, military, assam,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या स्मार्टफोन बाजार में दमदार वापसी कर पाएंगी देसी कंपनियां?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.