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तीन ऐसे खतरनाक मिथक जिनसे बना रहा आशावाद

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  December 12, 2019

मंदी के इस दौर में मौजूदा सरकार जो कदम उठा रही है उन्हें देखकर लगता है कि वह वाकई अपने ही प्रोपगंडा पर यकीन करती है। कुछ लोगों की आशंका है कि असहज करने वाले आंकड़े छिपाने और निवेशकों तथा मतदाताओं के समक्ष गुलाबी तस्वीर पेश करने की उसकी प्रवृत्ति बताती है कि सरकार निजी तौर पर सोचती कुछ है और सार्वजनिक रूप से बताती कुछ और है। परंतु यह गलत हुआ तो? यदि सरकार वाकई अपनी इन बातों पर यकीन करती हो तो? इससे सरकार की आकलन और विश्लेषण क्षमताओं पर कुछ सवाल उठते हैं लेकिन यह उसे छल के आरोप से बरी करता है।

 
सन 2014 से ऐसे आशावादी लोगों की कमी नहीं रही जो अर्थव्यवस्था को लेकर कम नकारात्मक सोच रखने की मांग करते रहे हैं। अब जबकि फिलहाल के लिए ऐसी अधिकांश आवाजें खामोश हो चुकी हैं तो उन्हें संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए और पूछा जाना चाहिए कि किसी को ऐसे भ्रमित कैसे किया जा सकता है। दरअसल तीन मिथक हैं जिन्होंने हमें इस स्थिति तक पहुंचाया।
 
पहला मिथक: यह धारणा कि वर्ष 2012-13 का संकट समाप्त हो चुका है। नीतिगत पंगुता के उस दौर को याद कीजिए। उस वक्त ज्यादातर लोग मानते थे कि संप्रग सरकार पंगु थी और उसकी नीति निर्माण क्षमता और राजनीतिक पूंजी की कमी ने अर्थव्यवस्था को ठप कर दिया, निवेश में धीमापन आया और वृद्धि में गिरावट आई। ऐसे में जब 2014 में बहुमत की सरकार आई तो लगा कि संकट हल हो जाएगा। परंतु यह सोचना गलत था। सन 2012-13 का संकट किसी एक सरकार की नीतिगत पंगुता का संकट नहीं था। यह सरकारी मशीनरी की नाकामी का संकट था। नियमन इतने मजबूत नहीं थे कि वृद्धि और पारदर्शिता दोनों हासिल हो सकें, विवाद निस्तारण व्यवस्था कमजोर थी जिससे पूंजी दांव पर लग गई थी। निजी क्षेत्र के प्रतिफल को प्रभावित करने वाले सरकारी कदमों के कारण अतिरिक्त सतर्कता की स्थिति बन गई थी। इस दिशा में ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता जैसे कुछ कदम उठाए गए। परंतु संकट की बुनियादी वजहों का निराकरण नहीं किया जा सका। हम उसी संकट का परिणाम झेल रहे हैं।
 
दूसरा मिथक: यह धारणा कि भारी-भरकम सरकारी निवेश वृद्धि के लिए पर्याप्त है। यह विचार भी तमाम गलत धारणाओं से उपजा इनमें से एक थी चीन के मॉडल को गलत ढंग से समझना। सच यह है कि बेहतर बुनियादी ढांचा तभी मायने रखता है जब निजी क्षेत्र को उसका उपयोग फायदेमंद लगे। ऐसी बुनियादी परियोजनाओं की सार्वजनिक फंडिंग तभी काम आती है जब निजी क्षेत्र नई परियोजनाओं में निवेश कर अतिरिक्त बुनियादी ढांचे तैयार करता है। चीन की अर्थव्यवस्था राज्य संचालित है। वहां निजी निवेश को आसानी से ऐसा करने को कहा जा सकता है। भारत में इसकी संभावना कम है। खासकर तब जब निजी क्षेत्र के पास फंड की कमी हो। निजी क्षेत्र की दिक्कतों मसलन अतिरिक्त क्षमता, कर्ज के बोझ, कर आंतक और कड़े नियमन को दूर किए बिना बुनियादी क्षेत्र में निवेश की अपेक्षा बेमानी है। ऐसे में राज्य का निवेश अपेक्षित नहीं था। यदि कोई ट्रक खरीदना नहीं चाहता या परिवहन के लिए वस्तुएं ही नहीं हैं तो राजमार्ग निर्माण का कोई मतलब नहीं है। 
 
तीसरा मिथक: अतृप्त भारतीय घरेलू मांग का विचार। हमने कई ऐसे वर्ष देखे हैं जब मांग वृद्धि का सहयोग करती दिखी। परंतु यह एक लोकलुभावन नीति का उत्पाद थी जिसने अस्थायी रूप से आय वृद्धि, घरेलू ऋण विस्तार का सहयोग किया। वहीं खाद्य और ईंधन मुद्रास्फीति में ढांचागत कमी ने आपूर्ति क्षेत्र पर सकारात्मक असर डाला। इनमें से कोई कारक स्थायी नहीं है। ऐसे में अनकही अपेक्षा यह थी कि मांग में तब तक तेजी बनी रहेगी जब तक कि निजी क्षेत्र में क्षमता का पूरा इस्तेमाल सुनिश्चित नहीं हो जाता और निवेश को नए सिरे से गति नहीं मिल जाती। परंतु ऐसा लगता है कि यदि ऐसा संभव था तब भी मांग उस सीमा तक नहीं पहुंच सकी। निजी क्षेत्र ऋण की कमी से जूझ रहा है लेकिन उसे उन निवेश परियोजनाओं की धन के लिए पैसे की जरूरत भी महसूस नहीं हो रही है जो अचानक आकर्षक प्रतीत होने लगी हैं। दिक्कत यह है कि देश की उपभोक्ता आधारित अर्थव्यवस्था के आकार और उसके घटक को लेकर जरूरत से ज्यादा विश्वास किया जा रहा था। ऐसी अर्थव्यवस्था जो विकास की हमारे जैसी अवस्था में हो वह निवेश और वृद्धि के लिए केवल घरेलू मांग पर निर्भर नहीं रह सकती। चीन ने वृद्धि का जो चमत्कार किया है या उससे पहले पूर्वी एशिया के देशों में जो हुआ उसकी वास्तविक व्याख्या यह है कि घरेलू आपूर्ति प्रतिक्रिया घरेलू के बजाय वैश्विक मांग से संबद्ध रही। दूसरे शब्दों में भारत को कारोबारी देश बनना होगा। शायद सरकार का यह सोचना सही है कि घरेलू उद्योग को व्यापारिक प्रभावों से बचाया जाए लेकिन यदि ऐसा है तो पहले दिन से सरकार का प्रयास यह होना चाहिए था कि भारतीय विकास को विश्व बाजार तक पहुंच बनानी चाहिए, बस चुनिंदा घरेलू उद्योगों को अस्थायी संरक्षण देना चाहिए। खेद की बात है कि सरकार की दृष्टि केवल घरेलू मांग और उद्योग पर केंद्रित है। विश्व बाजार उसकी नजर से ओझल है। यानी सतत मांग की कमी के कारण निजी क्षेत्र में अतिरिक्त क्षमता की समस्या बनी रहेगी।
 
परंतु यदि मध्यम अवधि में ऐसा आशावादी रुख रखना है तो यह इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या नकारात्मकता के इन स्रोतों को समाप्त किया जा सकता है? प्रशासनिक और कारक बाजार के ढांचागत सुधार की मदद से ही 2012-13 के संकट से उबरा जा सकता है। निजी क्षेत्र के सहयोग के साथ सरकारी व्यय की गुणवत्ता सुधारनी होगी, ऐसा करके ही सरकार के पूंजीगत व्यय की मदद से उत्पादकता और वृद्धि में सुधार किया जा सकता है और अतिरिक्त क्षमता का इस्तेमाल और निवेश परियोजनाओं की कमी दूर की जा सकती है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो नकारात्मकता के बरकरार रहने की पर्याप्त वजह है।
Keyword: Recession, india, economy, GDP,,
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