बिजनेस स्टैंडर्ड - अर्थव्यवस्था की स्थिति और सरकार का रुख
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अर्थव्यवस्था की स्थिति और सरकार का रुख

देवाशिष बसु /  December 12, 2019

ढांचागत सुधारों का संबंध निजीकरण, भूमि और श्रम से उतना नहीं है जितना कि यह निजी उपक्रमों के दायरे में विस्तार और उन्हें अधिक प्रतिस्पर्धी तथा उत्पादक बनाने से है। बता रहे हैं देवाशिष बसु
 
देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्घि दर इस वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में गिरकर 4.5 फीसदी रह गई। पूरे वर्ष के लिए यह अधिक से अधिक 5 फीसदी रहेगी। आम आदमी को यह समझ नहीं आ रहा कि पांच वर्ष से अधिक समय से देश पर विकास पुरुष का शासन होने के बावजूद वृद्घि दर 7.5 फीसदी से गिरकर 4.5 फीसदी कैसे रह गई। मायूसी की स्थिति है लेकिन इस अप्रत्याशित स्थिति को लेकर कोई आधिकारिक आर्थिक दलील सुनने को नहीं मिली जो हालात को स्पष्ट कर सके। अब जरूर सरकार की ओर से आर्थिक दलील सुनने को मिल रही हैं। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन विवेक देवराय ने पत्रिका 'ओपन' में एक आलेख लिखकर मंदी के बारे में स्पष्टीकरण दिया है। उनकी मुख्य दलीलें इस प्रकार हैं।
 
1. हम अभी भी वृद्घि हासिल कर रहे हैं, प्रसन्न रहिए: भारत दुनिया की सबसे तेज विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। मेरा (उनका नहीं) मानना है कि लोग बिना मंदी को महसूस किए मंदी की बात करते हैं। परिभाषा की बात करें तो लगातार दो तिमाहियों में जीडीपी में कमी आने पर ऐसा कहा जा सकता है। यह सच है लेकिन देवराय अनुमान बनाम हकीकत की बात पर चूक जाते हैं। लोगों ने मतदान बेहतरी के लिए दिया था या बदतरी के लिए? सन 2014 में क्या वाकई उन्होंने उम्मीद की होगी कि मोदी सरकार के पांच साल के कार्यकाल के बाद 5 फीसदी की वृद्घि दर मिलेगी। 
 
2. मुद्रास्फीति कम है, प्रसन्न रहिए: चूंकि जीडीपी के आंकड़ों का मुद्रास्फीति के साथ समायोजन किया जाता है इसलिए यदि मुद्रास्फीति 3 फीसदी है तो वर्ष की नॉमिनल वृद्घि 8 फीसदी होगी। वर्ष 2014 के बाद से सरकार की प्रमुख उपलब्धियों की बात करें तो मुद्रास्फीति में कमी इनमें प्रमुख है। लेकिन इसकी अधिक सराहना नहीं होती। वह कहते हैं कि मुद्रास्फीति गरीबों को अधिक प्रभावित करती है। वह याद दिलाते हैं कि यदि वास्तविक वृद्घि दर 5 फीसदी, मुद्रास्फीति 10 फीसदी और सांकेतिक वृद्घि दर 15 फीसदी होती तो हालत ज्यादा खराब होती।
 
यहां कई बातें हैं। कम मुद्रास्फीति कम समेकित मांग के कारण है। यह स्वतंत्र चर नहीं है क्योंकि मोदी सरकार के विभिन्न कदम वृद्घि और मुद्रास्फीति में इस गिरावट के लिए उत्तरदायी हैं। यह एक अनचाहा परिणाम है। इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि मुद्रास्फीति को कम करके गरीबों को राहत देना सरकार का नीतिगत लक्ष्य था। हकीकत में मोदी सरकार का सबसे बड़ा वादा किसानों की आय दोगुनी करने का था। चूंकि देश कोई बड़ा कृषि निर्यातक नहीं है इसलिए इससे भारी खाद्य मुद्रास्फीति उभरती। 
 
3. कमजोर वैश्विक कारोबार का दोष है सरकार का नहीं: देवराय कहते हैं कि जीडीपी वृद्घि का कम से कम 3 फीसदी निर्यात से आता है। यदि निर्यात वृद्घि समाप्त हो जाएगी तो जीडीपी वृद्घि दर 6 फीसदी पर सिमट जाएगी। देवराय के मुताबिक निर्यात को तीन कारक प्रभावित करते हैं: वैश्विक मांग, वैश्विक आपूर्ति और विनिमय दर। इनमें से पहले के बारे में सरकार कुछ नहीं कर सकती और तीसरे में भी उसका मामूली दखल है। जहां तक आपूर्ति की बात है तो सरकार ने लॉजिस्टिक्स में सुधार के उपाय अपनाए हैं। यानी कुल मिलाकर विशुद्घ निर्यात सीमित बना रहेगा। 
 
यदि यह सब जमीनी घटनाक्रम की तुलना में बहुत असंबद्घ और अकादमिक प्रतीत हो रहा है तो वाकई ऐसा है। सन 2010 में विश्व के वस्त्र निर्यात में चीन की हिस्सेदारी 36.6 फीसदी थी जो 2018 में घटकर 31.8 फीसदी रह गई क्योंकि श्रम की लागत बढ़ी और तमाम ढांचागत बदलाव देखने को मिले। इसका लाभ वियतनाम और बांग्लादेश को मिला जिनकी हिस्सेदारी क्रमश: 2.9 फीसदी से बढ़कर 6.2 फीसदी और 4.2 फीसदी से बढ़कर 6.4 फीसदी हो गई। जबकि भारत की हिस्सेदारी 3.3 फीसदी से गिरकर 3.2 फीसदी रह गई। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि भारत में कारोबार करने की छोटी मोटी लागत बहुत अधिक है। इसके लिए केंद्र और राज्य दोनों उत्तरदायी हैं। इसे ढांचागत सुधारों की मदद से हल किया जा सकता है लेकिन देवराय के अनुसार यह दलील बेतुकी है। अगले बिंदु पर गौर कीजिए। 
 
4. ढांचागत बनाम चक्रीय की बहस बेमानी है: देवराय लिखते हैं कि संकट की प्रकृति के ढांचागत या चक्रीय होने को लेकर एक बहस चल रही है जो बेमानी है। यह बेमानी क्यों है? क्योंकि उनके मुताबिक सरकार असहाय है। वह मानते हैं कि ढांचागत बदलाव का अर्थ केवल निजीकरण और श्रम एवं भूमि कानूनों में बदलाव है। वह कहते हैं कि निजीकरण एक प्रक्रिया है जिसमें हड़बड़ी नहीं की जा सकती। विधायी बदलाव आवश्यक हैं जो संसद ही कर सकती है। जबकि सर्वाधिक मूल्यवान परिसंपत्ति यानी भूमि पर प्राय: राज्य सरकारों का आधिपत्य है। इसे केंद्र सरकार नहीं बेच सकती। 
 
देवराय कहते हैं कि भूमि और श्रम आंशिक रूप से राज्य का मसला हैं और भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 ने भूमि की लागत बढ़ाई और बुनियादी परियोजनाओं को पूरा करना कठिन कर दिया। उनके मुताबिक देश की वृद्घि दर में राज्यों के क्रियाकलाप का भी पूरा असर होता है और अकेले केंद्र सरकार ज्यादा कुछ नहीं कर सकती। सच तो यह है कि ढांचागत सुधारों का निजीकरण, भूमि या श्रम से ज्यादा लेनादेना नहीं होता। इसका संबंध निजी उद्यमों के दायरे के विस्तार तथा उनको प्रतिस्पर्धी और उत्पादक बनाने की इजाजत से अधिक है। इसकी शुरुआत कारोबार करने की छिटपुट लागत खत्म करने और राज्यों में भ्रष्टाचार के समापन से होनी चाहिए। वर्ष 2015 में एक आलेख में मैंने पूछा था कि आखिर भाजपा के इकलौते वोट जुटाऊ नेता (जो राज्यों के चुनाव में भी पार्टी के लिए वोट जुटाते हैं) प्रधानमंत्री मोदी भाजपा के शासन वाले राज्यो के साथ तालमेल करके हमें क्यों नहीं दिखाते कि राज्य स्तर पर किन सुधारों को अंजाम दिया जा सकता है?
 
कुल मिलाकर देवराय के मुताबिक 5 फीसदी की वृद्घि दर में दिक्कत की कोई बात नहीं। यह 6 फीसदी तक हो सकती है और अभी जो 'साफ-सफाई' चल रही है वह अर्थव्यवस्था को अधिक औपचारिक और किफायती बनाएगी। परंतु ऐसा रातोरात नहीं होगा। देवराय की बातें इस बारे में बहुत उपयोगी हैं कि आप इस सरकार से मंदी को लेकर क्या कदम उठाने की उम्मीद कर सकते हैं? आखिर हम सभी यह बात जानना चाहते हैं। इसका सीधा उत्तर है: कुछ खास नहीं। 
Keyword: india, economy, GDP, infra,,
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