बिजनेस स्टैंडर्ड - ढांचागत क्षेत्र में तरलता प्रवाह हो निर्बाध
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ढांचागत क्षेत्र में तरलता प्रवाह हो निर्बाध

विनायक चटर्जी /  December 11, 2019

आर्थिक वृद्धि को रफ्तार देने के लिए ढांचागत क्षेत्र काफी अहम है। मध्यस्थता पंचाटों के भुगतान संबंधी फैसलों पर प्रक्रियागत सुधार करने जरूरी हैं। बता रहे हैं विनायक चटर्जी

 
अक्सर ऐसा होता है कि मीडिया में उन खबरों को अधिक प्रमुखता नहीं दी जाती है जिनमें अनुकूल दीर्घकालिक प्रभाव डालने की क्षमता होती है। गत 20 नवंबर को आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति (सीसीईए) ने ऐसे तरीके पर मुहर लगाई जो ढांचागत क्षेत्र के लिए कुछ राहत लेकर आएगा। यह एक ऐसा कदम है जिस पर इस क्षेत्र के बाहर शायद ही ध्यान दिया गया है। सीसीईए ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) जैसी सरकारी इकाइयों के लिए मध्यस्थता विवादों में फंसी राशि का 75 फीसदी तक हिस्सा फौरन जारी करने की प्रक्रिया आसान बना दी है। इससे निजी क्षेत्र के साथ विवादों के चलते फंसी रकम में से 75 फीसदी तक राशि निकालने का रास्ता आसान हो जाएगा। खास बात यह है कि यह सुविधा उस स्थिति में भी मिलेगी जब मध्यस्थता अधिकरण के फैसलों के खिलाफ सरकारी इकाइयों ने अपील कर रखी हो। भले ही नीति आयोग ने वर्ष 2016 में इस संदर्भ में निर्देश जारी किए थे लेकिन इस पर ठीक से अमल नहीं किया गया था। संबंधित सरकारी संस्थानों की तरफ से इस 75 फीसदी राशि मुक्त करने के पहले संभावित ब्याज को भी कवर करने के लिए बैंक गारंटी की मांग बड़ा अवरोध होती थी।  सीसीईए के हालिया फैसले में सरकारी संस्थानों को कहा गया है कि वे विवादित रकम के कम-से-कम ब्याज वाले हिस्से के लिए गारंटी की मांग न रखें। निजी क्षेत्र में तरलता की भारी किल्लत होने से ऐसी गारंटी को भुना पाना काफी मुश्किल हो गया है। ऐसे में तरलता बनाए रखने के लिए अधिक तरलता की जरूरत है।
 
यह उम्मीद की गई है कि भविष्य में प्रक्रिया को सरल बनाकर ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है कि बैंक गारंटी की जरूरत ही न रह जाए। इन दिनों ढांचागत क्षेत्र की कंपनियों को बैंक गारंटी मिलने में पेश आने वाली चुनौतियों को देखते हुए यह बेहद जरूरी है। बैंकों को गारंटी देने के लिए प्रोत्साहित करने और सरकारी इकाइयों के लिए बकाये के निपटारे के लिए भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) ने सरकार से बैंकों को एक अलग बायर्स लाइन ऑफ क्रेडिट देने पर विचार करने का अनुरोध किया था जिसका इस्तेमाल सरकारी एजेंसियां मध्यस्थता निर्णयों के तहत वेंडरों का भुगतान करने के लिए कर सकती हैं। उस रकम का इस्तेमाल बैंकों को कर्ज लौटाने में किया जा सकता है।
 
सीसीईए का यह निर्णय अब नीति आयोग के महज एक निर्देश से अलग हटकर केंद्रीय मंत्रिमंडल का फैसला होने जा रहा है जिसे सख्ती से लागू किए जाने की जरूरत है। यह इस बात को स्वीकार करता है कि उत्पादों एवं सेवाओं की सबसे बड़ी खरीदार होने के नाते खुद सरकार ही तरलता संकट खड़ा करने में बड़ी भूमिका निभाती है। भुगतान में देरी से अक्सर दूरगामी प्रभावों का सिलसिला शुरू हो जाता है जिसका नतीजा निजी फर्मों के दिवालिया होने के रूप में सामने आता है क्योंकि ये फर्में काफी हद तक सरकारी ठेकों पर ही निर्भर होती हैं। अनुमानित तौर पर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक राशि सरकारी विभागों एवं सार्वजनिक उपक्रमों पर बकाया है। मध्यस्थता विवादों में जीत के बाद वेंडरों एवं आपूर्तिकर्ताओं को यह रकम दी जानी है। इतना ही अहम यह है कि सीसीईए की बैठक में यह भी कहा गया कि सरकारी इकाइयों को मध्यस्थता अधिकरणों के निर्णयों के खिलाफ अपील करने के पहले सरकार के कानूनी अधिकारी (मसलन, अटॉर्नी जनरल या सोलिसिटर जनरल) की राय लेनी चाहिए। यह हारे हुए मामले को अदालत में ले जाने की सरकारी इकाई की यंत्रवतप्रतिक्रिया को सीधे तौर पर कम करेगा। उम्मीद है कि इस एक कदम से ही अदालतों में दाखिल की जाने वाली अपीलों में भारी कमी आएगी। 
 
प्रसंगवश, मध्यस्थता अधिनियम समस्या की गंभीरता को मान्यता देता है। वर्ष 2015 में इस कानून में किए गए बदलाव मध्यस्थता निर्णयों को दी जाने वाली चुनौती में कमी लाने और ऐसे निर्णयों के तहत भुगतान की प्रक्रिया तेज करने के लिए लाए गए थे। हालांकि इस साल के शुरू में किए गए संशोधनों ने इस सुधार को 2015 के बाद के विवादों के लिए ही प्रभावी कर दिया। इन हालिया संशोधनों को उच्चतम न्यायालय ने गत 27 नवंबर को निरस्त कर दिया है जो ढांचागत क्षेत्र के लिए एक और राहत की बात है। मध्यस्थता पंचाटों के फैसले आना कहानी का एक हिस्सा है। नकद-प्रवाह की समस्या का दायरा आम तौर पर सरकार से समयबद्ध भुगतान सुनिश्चित करने से जुड़ा है, यहां तक कि सामान्य बिलों के मामले में भी। ढांचागत क्षेत्र के तमाम विश्लेषक इसकी तसदीक करेंगे कि हरेक गुजरते महीने में निजी क्षेत्र की बैलेंस शीट पर बकाया भुगतान के दिनों की संख्या चिंताजनक दर से बढ़ती दिख रही है। इसका बड़ा कारण भुगतान को समय पर जारी करने की जवाबदेही का पूर्ण अभाव है। लिहाजा एक रसीद तैयार होने के साथ ही वह अफसरशाही की भूलभूलैया में एक से दूसरी मेज तक घूमती रहती है और कई महीनों तक पीछा करने के बाद वह रकम बैंक खाते में जमा हो पाती है। कारोबार से सरकार (बी-टू-जी) संपर्क की ऐसी व्यवस्था में तत्काल बदलाव लाने की जरूरत है।
 
सीआईआई ने सभी तरह की सरकारी खरीद इकाइयों के लिए बकाया भुगतान का एक पोर्टल बनाने का सुझाव कई बार दिया है। इस तरह के मोटे आंकड़े जीएसटी ढांचे में हरेक रसीद का विवरण दर्ज होने से पहले से ही उपलब्ध हैं। एक साधारण की प्रोग्रामिंग कर किसी एक निकाय के नाम पर जारी सभी रसीदों को एक साथ देखा जा सकता है। इससे उन रसीदों की भी शिनाख्त हो सकेगी जिन पर भुगतान बाकी है। अगर यह फौरन लागू होता है तो राजनीतिक आका भी समस्या की भयावहता देखकर हिल सकते हैं।
 
सरकार ने इसके बाद यह घोषणा की है कि केंद्र सरकार के विभागों एवं सार्वजनिक उपक्रमों से भुगतान में देरी पर व्यय सचिव की तरफ से निगरानी रखी जाएगी और कैबिनेट सचिवालय के स्तर पर उसकी समीक्षा होगी। ऐसे सवाल उठाए गए हैं कि वाणिज्यिक बैंकों एवं एनबीएफसी के नदारद होने पर दीर्घावधि तरलता को ढांचागत क्षेत्र के लिए समर्पित विकास वित्तीय संस्थान (डीएफआई) के जरिये भेजा जाना चाहिए। ऐसे खुरदुरे उपाय सरकार एवं निजी क्षेत्र के बीच फंड के प्रवाह की बाधाएं दूर कर देते हैं। सरकार को इसे अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी राहत पैकेज में शामिल करना चाहिए।
 
(लेखक सलाहकार फर्म फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं)
Keyword: india, economy, GDP, CCEA,,
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