बिजनेस स्टैंडर्ड - मांग, आपूर्ति और वृद्घि में धीमापन
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मांग, आपूर्ति और वृद्घि में धीमापन

रथिन रॉय /  December 10, 2019

यदि देश को विकास के क्षेत्र में बदलाव लाना है तो घरेलू मांग को व्यापक और समावेशी बनाने को पहली प्राथमिकता देनी होगी। इस विषय पर विस्तार से अपनी राय दे रहे हैं रथिन रॉय

 
देश में इस बात पर बहस चल रही है कि क्या मौजूदा मंदी मांग अथवा आपूर्ति बाधित अर्थव्यवस्था को परिलक्षित कर रही है। विश्लेषण किया जाए तो यह सवाल तब उठता है जब मंदी की प्रकृति चक्रीय हो। यदि समेकित मांग कुल उत्पादन क्षमता से कम हो तो अर्थव्यवस्था मांग बाधित होती है। परंतु यदि समेकित मांग के बावजूद वास्तविक उत्पादन, उत्पादन क्षमता से कम हो तो इसे आपूर्ति क्षेत्र की बाधा वाली मंदी कहा जा सकता है। ढांचागत मंदी अधिक जटिल होती है। विकासशील देशों में ऐसी मंदी के लिए विशिष्ट कारकों को उत्तरदायी ठहराया जाता है। इनमें बुनियादी ढांचे की कमी, अत्यधिक नियमन आदि प्रमुख हैं। लेकिन मांग और आपूर्ति के कारक भी उतने ही उत्तरदायी होते हैं।
 
मांग उस मूल्य से संबंधित होती जिस पर वस्तुओं और सेवाओं की पेशकश की जाती है। आपूर्ति क्षेत्र की बाधाओं के कारण कीमतें इतनी अधिक हो सकती हैं कि समेकित मांग कम हो जाए। यह तब होता है जब ये बाधाएं उत्पादकता कम करती हैं और इसलिए कीमत इतनी ज्यादा हो जाए कि वृद्घि को समर्थन देने के लिए जरूरी मांग ही तैयार न हो पाए। व्यापार में कोई बाधा न होने से ऐसी मांग की पूर्ति बढ़े हुए आयात के माध्यम से भी की जा सकती है। इससे घरेलू उत्पादन और वृद्घि को कोई मदद नहीं मिलेगी। 
 
मैं भारत में इसे कुछ इस प्रकार घटित होते देखता हूं। वर्ष 1991 के बाद से भारत की वृद्घि की गाथा कमोबेश कभी निर्यात आधारित नहीं रही है। इसे गति प्रदान करने में घरेलू खपत और निवेश मांग की अहम भूमिका रही। संक्षेप में कहा जाए तो देश के शीर्ष 15 करोड़ लोग जिन जिंस का उपयोग करते हैं उनकी कीमतों में 1991 के बाद से गिरावट आई है। इस क्षेत्र की आबादी की आय से तुलना करके देखें तो उन वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में निरंतर गिरावट आई है जिन्हें आर्थिक वृद्घि का प्रमुख संकेतक माना जाता है। इनमें कारें, दैनिक उपयोग की उपभोक्ता वस्तुएं, हवाई यात्राएं आदि शामिल हैं। 
 
इस गिरावट की प्रमुख वजह हैं उदारीकरण, बढ़ती आय और पूंजीगत लाभ। इन क्षेत्रों को उपलब्ध उपभोक्ता और उत्पादक ऋण भी इसकी वजह है। जैसा कि मैंने पहले भी कहा था। इस बात के प्रमाण हैं कि इस क्षेत्र से मांग वृद्घि छीज रही है।  बहरहाल ढांचागत अवरोध अभी उन वस्तुओं की समेकित मांग को सीमित किए हुए है जिनका उपभोग देश की अगली 30 करोड़ की आबादी करती है। वस्त्र आयात की बात करें तो बांग्लादेश और वियतनाम से होने वाला कपड़े का आयात देश की समेकित मांग की पूर्ति कर देता है। ऐसा इसलिए क्योंकि घरेलू उद्योग उच्च मेहनताने क्षेत्रों से कम वेतन वाले उत्तरी और पूर्वी भारत का रुख नहीं कर पा रहा है। सरकार देश की सबसे बड़ी भूस्वामी है लेकिन इसके बावजूद खासतौर पर शहरों में नियामकीय और संस्थागत बाधाएं इतनी हैं कि वे जमीन का इस्तेमाल कर सस्ते आवास बनाने की संभावनाओं को सीमित करती हैं। न्यूनतम आय पर गुजारा कर रहे भारतीय बिना सब्सिडी के बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य नहीं पा सकते। 
 
ऐसे में न्यूनतम आय अर्जित करने वाले लोग जिन चीजों को खरीदने की आकांक्षा रखते हैं उनकी मांग इसलिए जोर नहीं पकड़ पाती क्योंकि आपूर्ति क्षेत्र की बाधाओं ने कीमतों को बढ़ा रखा है।  लॉजिस्टिक्स की बढ़ी हुई लागत, महंगी और अविश्वसनीय ऊर्जा आपूर्ति, मानव संसाधन में कम निवेश, शोध एवं विकास पर पर्याप्त ध्यान न देने और निष्प्रभावी और मनमाने नियमन और प्रशासन के साथ राजकोषीय और ऋण नीतियों के सुसंगत नहीं होने से भी उत्पादकता में कमी की समस्या को बढ़ावा मिलता है। इससे लागत बढ़ती है और इन वस्तुओं और सेवाओं का गुणवत्तापूर्ण उत्पादन प्रभावित होता है।
 
सार्वजनिक नीति के जरिये दी जाने वाली प्रतिक्रिया भी संतोषजनक नहीं रही है। गरीब और न्यूनतम मेहनताना अर्जित करने वालों को खराब गुणवत्ता की सब्सिडी वाली वस्तुओं से ही संतोष करना पड़ता है। इससे वृद्घि को भी कोई सहायता नहीं मिलती। बल्कि इससे लेनदेन की लागत बढ़ती है और दुर्लभ संसाधनों तक पहुंच में प्राथमिकता की चाह भी। यही कारण है कि अफसरशाह और नेताओं को एम्स में चिकित्सा सुविधा, सस्ती दरों पर बेहतरीन निजी स्वास्थ्य सेवा और गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक आवास जैसी सुविधाओं में प्राथमिकता प्रदान की जाती है।
 
मौजूदा मंदी को कई टीकाकारों ने वित्तीय और ऋण बाजार के तमाम ढांचागत झटकों से जोड़ा है। इसे मध्यम अवधि के निवेश-ऋण रिश्तों की कमी भी माना गया जिसने मध्यम अवधि में देश की वृद्घि दर का निर्धारण किया है। कई आकलन बताते हैं कि बेहतर ऋण सुविधा, नकदी और निवेश को आकर्षक बनाने से हालात सुधर सकते हैं। इन दलीलों में दम है लेकिन मेरी नजर में मौजूदा मंदी में इस बात के संकेत निहित हैं कि देश की वृद्घि गाथा की ढांचागत कमजोरी को दूर करना आवश्यक है भले ही यह प्राथमिक कारण नहीं दिख रहा हो। 
 
मैंने कहीं और यह दलील भी दी थी कि मंदी से निपटने के लिए अल्पावधि के उपाय अधिक आवश्यक हैं। सरकार ने इस दिशा में प्रयास भी किए हैं। मैंने यह सुझाव भी दिया था कि ढांचागत मौद्रिक और ऋण नीति के उपायों को अपनाकर भी इस दिशा में प्रयास किया जा सकता है।  परंतु अगर भारत को अपनी विकास अवस्था में बदलाव लाना है तो उसे कहीं अधिक व्यापक और समावेशी घरेलू मांग को महत्ता प्रदान करनी होगी। यह मध्यम अवधि का काम है लेकिन इसके क्रियान्वयन की शुरुआत अल्पावधि के उपायों से होनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया तो अल्पावधि के उपाय मुद्रास्फीतिजनित मंदी की वजह बनेंगे। भारत को ऐसी आय और औद्योगिक नीतियां तैयार करने की आवश्यकता है जो कहीं अधिक व्यापक और समावेशी वृद्घि प्रक्रिया तय करें। ऐसा करके ही हम सफल बदलाव हासिल कर पाएंगे और मध्यम आय के जाल में फंसने से भी बच सकेंगे। इस समस्या पर ध्यान न देने वाले कई देश ऐसे जाल में फंस चुके हैं। 
Keyword: india, economy, infrastructure, export,,
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