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सहज हो आय कर ढांचा

संपादकीय /  December 10, 2019

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गत सप्ताह संकेत दिया कि सरकार व्यक्तिगत आय कर दरों को कम करने और कहीं अधिक तार्किक बनाने पर विचार कर रही है। सरकार ऐसा आर्थिक वृद्धि को प्रोत्साहित करने के लिए उठाए जा रहे कदमों के तहत कर सकती है। स्मरण रहे कि वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर घटकर 4.5 फीसदी रह गई है। सरकार को आगामी बजट में आय कर को संशोधित कर और तार्किक बनाना चाहिए। इसकी तमाम वजह हैं। उदाहरण के लिए इससे पहले सरकार ने कॉर्पोरेशन कर दर में कमी की है जिसके बाद यह तार्किक कदम होगा। इससे प्रत्यक्ष कर सुधार की प्रक्रिया और आगे ले जाई जा सकेगी। कर ढांचे को सहज बनाने से मध्यम से दीर्घ अवधि में कर संग्रह में सुधार की संभावना बढ़ती है। दूसरा, इससे करदाताओं की अन्य श्रेणी के लिए कर को तार्किक बनाने और विसंगति दूर करने में मदद मिलेगी।
 
उदाहरण के लिए दिवंगत अरुण जेटली ने 2018 के अपने बजट भाषण में कहा था कि आकलन वर्ष 2016-17 में वेतनभोगी लोगों ने औसतन 76,306 हजार रुपये का कर चुकाया जबकि पेशवरों तथा व्यक्तिगत कारोबारी करदाताओं के मामले में यह औसतन 25,753 रुपये था। यहां तक कि समेकित स्तर पर भी वेतनभोगी लोगों का कर संग्रह व्यक्तिगत कारोबारी करदाताओं और पेशेवरों द्वारा चुकाये गए कर का तीन गुना तक था। तीसरा, व्यक्तिगत करदाताओं के लिए कर दर कम करने से उनकी खर्च करने लायक आय में इजाफा होगा और खपत में सुधार होगा। हालांकि संपूर्ण अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव सीमित हो सकता है क्योंकि व्यक्तिगत करदाताओं की तादाद बहुत ज्यादा नहीं है।
 
यकीनन सरकार प्रत्यक्ष कर कानूनों की समीक्षा करने वाले कार्य बल की रिपोर्ट जारी करती तो अच्छा रहता। इससे इस विषय पर और अधिक जानकारीपरक बहस हो पाती। इससे सरकार भी सुधार प्रक्रिया को आगे ले जाने के मामले में कहीं अधिक बेहतर स्थिति में रहती। व्यापक स्तर पर देखें तो एक ओर जहां व्यक्तिगत आय कर दर को तार्किक बनाने की बात उचित है, वहीं यह भी ध्यान रखना होगा कि सरकार राजस्व संग्रह के मोर्चे पर कठिन स्थिति में है और उसे बेहद बारीक संतुलन साधना होगा। दरों में उल्लेखनीय कटौती राजस्व पर बुरा असर डाल सकती है और सरकार की राजकोषीय स्थिति और बिगड़ सकती है। ज्यादातर विश्लेषक मानते हैं कि सरकार के लिए इस राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.3 फीसदी के तय लक्ष्य के भीतर रखना लगभग असंभव है। चूंकि अर्थव्यवस्था में निकट भविष्य में कोई बड़ा सुधार होता नहीं दिखता इसलिए राजस्व संग्रह अगले वर्ष भी दबाव में रह सकता है।
 
ऐसे में विसंगतियों को समाप्त करने और रियायतों को तार्किक बनाने पर ध्यान देना चाहिए। इसमें कर दरें भी शामिल हैं। ऐसा करने से राजस्व संग्रहण पर पडऩे वाले असर को न्यूनतम किया जा सकेगा। जुलाई के बजट में सरकार ने अत्यधिक अमीर करदाताओं पर अधिभार बढ़ा दिया था। इससे आय कर ढांचा और जटिल हो गया। ऐसे उपायों से बचा जाना चाहिए। एक छोटे समूह के लिए कर दरों में अहम वृद्धि कर वंचना की संभावना बढ़ाती है। यह भी निश्चित नहीं है कि आय कर दर में कटौती से व्यय बढ़ेगा ही क्योंकि कठिन वक्त में लोग बचत करना चाहते हैं। तार्किक कर दर वाली सहज व्यवस्था में अनुपालन में सुधार और संग्रह के आधार में इजाफा अवश्य हो सकता है। इस बीच सरकार को कर विभाग में संस्थागत क्षमता बढ़ाने पर भी विचार करना चाहिए। इस दौरान तकनीक का बेहतर इस्तेमाल कर कर वंचना पर निगरानी रखनी चाहिए। इससे राजस्व संग्रहण में बेहतरी आएगी और ईमानदार करदाताओं पर से दबाव कम होगा। 
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