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ब्रोकरेज फर्मों को अनुपालन लागत बढऩे का डर

जश कृपलानी / मुंबई December 10, 2019

ब्रोकिंग हाउस को अनुपालन लागत बढऩे की आशंका है क्योंकि कार्वी घोटाले के बाद बाजार नियामक सेबी ब्रोकिंग फर्मों के नियामकीय ढांचे को सख्त बनाने जा रहा है। घटते प्रतिफल, कारोबार में गिरावट और तकनीकी व नियामकीय बदलाव के कारण बढ़ती लागत की वजह से देसी ब्रोकिंग फर्म पहले से ही दबाव में हैं। बाजार के प्रतिभागियों ने कहा, छोटे ब्रोकरेज फर्मों को अनुपालन लागत मेंं होने वाली बढ़ोतरी को समाहित करने में और मुश्किल हो सकती है। पहले से ही ब्रोकरों की संख्या घट रही है। 2014-15 में ब्रोकरों की संख्या 5,899 थी, जो 31 दिसंबर 2018 को घटकर 3,542 रह गई, यानी उसमें 34 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई। यह जानकारी सेबी के आंकड़ों से मिली।
 
एक ब्रोकिंग हाउस के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, परिचालन लागत बढऩे के साथ हम कुछ और ब्रोकरेज फर्मों को अपना कामकाज बंद करते देख सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में बढ़ती अनुपालन लागत ने कई ब्रोकरेज फर्मों को पहले ही उद्योग से बाहर निकाल दिया है। हम अपनी बात करें तो अभी हमारे यहां अनुपालन टीम में 30 लोग हैं और डीलिंग रूम में अलग व्यक्ति है और खाता खोलने वाली टीम अलग है। उद्योग के प्रतिभागियों ने कहा कि कई ब्रोकरों ने क्लाइंटों की रकम का इस्तेमाल अपनी कमाई के लिए किया, हालांकि सेबी ने जून में इस जरिये पर रोक लगा दी।
 
उन्होंने कहा, शुद्ध रूप से खुदरा कारोबार चलाने वाले छोटे ब्रोकरों के लिए कई सारी लागत के साथ अपना अस्तित्व बचाए रखना असंभव है। क्लाइंटों की प्रतिभूतियों को गिरवी रखकर या बेकार पड़े क्लाइंटों के फंड पर ब्याज अर्जित करना, आय के स्रोत रहे हैं। हालांकि क्लाइंटों की प्रतिभूतियों या फंडों के इस्तेमाल के मामले में सेबी और एक्सचेंज ने सख्ती बरती है। इस वजह से ऐसी आय पर निर्भर ब्रोकिंग समुदाय के लिए मौत की घंटी हो सकती है। नवंबर में सेबी ने धोखाधड़ी के जरिए क्लाइंटों की 2,300 करोड़ रुपये की प्रतिभूतियों का हस्तांतरण कर्ज लेने के लिए करने और इन प्रतिभूतियों को जमानत के तौर पर गिरवी रखने पर कार्वी स्टॉक ब्रोकिंग पर रोक लगाई है। ब्रोकर ने कथित तौर पर इसके जरिए मिली रकम का इस्तेमाल अन्य कारोबार में किया, जिसमेंं रियल एस्टेट शामिल है। बीएमए वेल्थ समेत अन्य ब्रोकरों पर भी ऐसी ही गड़बड़ी का आरोप है।
 
बाजार के प्रतिभागियों ने कहा कि ब्रोकिंग उद्योग में क्लाइंटों की प्रतिभूतियों का इस्तेमाल असामान्य नहीं है। एक छोटी ब्रोकिंग फर्म के प्रमुख ने कहा, कई ब्रोकरों ने क्लाइंटों के फंडों व प्रतिभूतियों का इस्तेमाल किया। हालांकि ज्यादातर ने इसका इस्तेमाल रियल एस्टेट जैसे कारोबार में नहीं किया। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से अन्य क्लाइंटों की जरूरतें पूरी करने या आर्बिट्रेज ट्रेडिंग के लिए किया, जिसे जोखिम मुक्त माना जाता है। हालांकि कुछ ब्रोकरों की तरफ से गड़बड़ी के बाद पूरे समुदाय को सख्त नियमन का सामना करना पड़ेगा।
 
जून में बाजार नियामक ने ब्रोकिंग उद्योग के लिए नए दिशानिर्देश जारी किए थे। इन नियमों में सभी ब्रोकरों को 31 अगस्त 2019 तक क्लाइंटों की सभी प्रतिभूतियों को गिरवी से मुक्त कराना जरूरी था। साथ ही ब्रोकरेज को खुद की प्रतिभूतियों से क्लाइंट की प्रतिभूतियां अलग करने के लिए अलग खाता रखना जरूरी बनाया गया है। एक ब्रोकरेज फर्म के प्रमुख ने कहा, विगत में ऐसे घोटाले पर सेबी की प्रतिक्रिया नियमों के नए मसौदे के तौर पर देखने को मिली है। हालांकि कार्वी के घटनाक्रम को देखने के बाद लगता है कि ऐसे मामलों को टालने के लिए अकेले नियमन पर्याप्त नहींं है।
 
दूसरी ओर, बाजार के कुछ प्रतिभागियों का मानना है कि अगर नियामक प्रतिभूतियों को संभालने से जुड़े कुछ काम ब्रोकरेज से अलग करने का फैसला लेता है तो लागत में कुछ बचत हो सकती है। अनुपालन लागत के अलावा ब्रोकिंग उद्योग को रकम जुटाने में भी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि कार्वी ने कथित तौर पर क्लाइंट की प्रतिभूतियों का इस्तेमाल बैंकों से उधार लेने में किया। पिछले महीने सेबी के अंतरिम आदेश के बाद एनएसडीएल ने इन प्रतिभूतियों का हस्तांतरण क्लाइंट के खाते में करने का फैसला लिया, जिसके बाद इन बैंकों के पास रखा जमानत समाप्त हो गया। ब्रोकरों को डर है कि कार्वी के घटनाक्रम के बाद ज्यादातर लेनदार उन्हें उधार देने में चौकन्ने हो सकते हैं।
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