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संदेश पर ध्यान दे सरकार संदेश देने वाले पर नहीं

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  December 09, 2019

हमारा समाज ऐसा है जो मुद्दों से कहीं बेहतर अपने प्रतीकों को संभालता है। इस हद तक कि जब मुद्दे खुद नमूंदार होते हों तब भी हम मुद्दे को नहीं बल्कि उससे जुड़े प्रतीक को ही देखते हैं। कंपनी जगत में व्याप्त भय के माहौल के बारे में भारतीय उद्योग के मुखर सदस्य राहुल बजाज की शिकायत भी इसी प्रवृत्ति की शिकार हो गई है। बजाज ने भय के माहौल का जिक्र एक सार्वजनिक सभा में किया था जिसमें तीन कैबिनेट मंत्री मौजूद थे। उनका कहना था कि डर की वजह से भारतीय उद्योग का कामकाज प्रभावित हो रहा है। उनकी इस आशंका का जवाब देते हुए केंद्रीय गृह मंत्री ने संयम का परिचय दिया। यह कुछ साल पहले 'असहिष्णुता' पर व्यक्त एक अभिनेता के विचार की अवमानना नहीं है। असल में, एक और मंत्री ने बाद में यह कह दिया कि यह पूरी चर्चा किस तरह से 'राष्ट्रीय हित' के खिलाफ इस्तेमाल की जा सकती है।

 
इस घटना के बारे में 'मुख्यधारा के मीडिया' पर कमोबेश सोशल मीडिया जैसी राय ही देखने को मिली हैं। एक अखबार ने 'सत्ता के समक्ष आधा सच' बोलने के लिए बजाज की खिंचाई की है। दूसरे अखबारों ने रस्मी हिचकिचाहट दिखाई। पहले तो उन्होंने बजाज के उठाए मुद्दे पर ध्यान दिए जाने की सलाह दी और फिर इस हस्तक्षेप को हमला भी करार दिया। एक पूर्व प्रधानमंत्री के पूर्व मीडिया सलाहकार उन चुनिंदा लोगों में से एक थे जिन्होंने बजाज के उठाए मुद्दों पर फौरन ध्यान देने की खुलकर वकालत की। संप्रग-1 सरकार के समय मीडिया सलाहकार रहे इस शख्स ने अपनी किताब में यह कहा था कि प्रधानमंत्री कार्यालय पर 10, जनपथ से रिमोट कंट्रोल के जरिये नियंत्रण रखा जाता है।
 
बहरहाल, इस लेख का मकसद यह बताना नहीं है कि किसने क्या कहा? ऐसा होने पर यह लेख भी मुद्दों से हटकर प्रतीकों पर केंद्रित हो जाएगा। अगर किसी को व्यक्ति नहीं बल्कि संबंधित मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करना है तो इस समस्या की संभावित संरचना इस तरह होगी: 
 
बैंक कर्मचारी कर्ज देने से संबंधित फैसलों के लिए अपने पूर्व सहयोगियों की गिरफ्तारी और उन पर आरोपपत्र दायर होते हुए देख रहे हैं। हो सकता है कि कर्ज देने का फैसला तथ्यपरक रहा हो और बैंकरों ने अपने पास उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर निर्णय लिया हो। 
 
मुसीबत से बचने के लिए इंसानी व्यवहार यही है कि मुसीबत लाने वाला काम करने से बचा जाए। कर्ज आवेदनों की फाइल के निपटारे में भी यही प्रवृत्ति हावी रही है। लिहाजा वित्तीय सेवा क्षेत्र के अधिकारी निर्णय लेने को लेकर काफी चौकस हैं।
 
तरलता की भारी कमी से जूझ रहे कर्जदार अपनी रोजमर्रा का नकद प्रवाह भी नहीं बनाए रख पाते हैं जिससे उनके सामने भुगतान चूक का संकट पैदा हो जाता है। ऐसा होने पर उन्हें यह आशंका घेर लेती है कि भुगतान में चूक को क्या उनकी तरलता समस्या के तौर पर देखा जाएगा या फिर उसे धोखाधड़ी माना जाएगा?
 
अगर राजनीतिक सत्ताधारियों को यह लगता है कि बैंकों को अधिक कर्ज देने के लिए प्रोत्साहित करने से हालात सुधरेंगे तो फिर उन्हें दोस्ताना पूंजीवाद के समर्थक होने का आरोप भी झेलना पड़ सकता है। 
 
ऐसी स्थिति में निजी पूंजी का सृजन बाधित हो जाता है और कारोबार का विकास भी नहीं होता है जिससे आर्थिक वृद्धि धीमी पडऩे लगती है।
 
यहां पर एक बार फिर बहस इस तरफ मुडऩे लगती है कि क्या इस स्थिति को मंदी कहा जा सकता है या फिर आर्थिक गतिविधि में व्याप्त सामान्य सुस्ती भी मंदी का पर्यायवाची ही है। एक बार फिर, सार्वजनिक विमर्श का बड़ा हिस्सा इस तरफ जाता है कि क्या यह लेबल सही है? 'सुस्ती नहीं मंदी समान' के विषयवस्तु पर बने इंटरनेट मीम्स की तुलना स्वास्थ्य से संबंधित घिसे-पिटे रूपकों से करना इस मुद्दे को ही बेदम करने की कोशिश है। इसके अलावा बेहद समझदार टिप्पणीकार आंकड़ों को दबाने की कोशिश को शासन की एक वैध नीति बताकर सही ठहराने की कोशिश करते भी नजर आए हैं। कुछ महीनों पहले जब एक टिप्पणीकार को एक पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम में यह कहते हुए सुना था कि सत्ता में बैठे हरेक दल को सामान्य हालात दिखाने के लिए सांख्यिकी आंकड़ों में हेर-फेर करने का अधिकार है तो उस समय निराशा हुई थी।
 
समस्या दूर करने की दिशा में पहला कदम यह है कि हम पहले उसे स्वीकार करें। सही संदेश पहुंचाने की शिनाख्त करना और उसे निशाना बनाना या फिर उसे सम्मानित करना प्रतीकों पर बहस करने की कवायद है। जरूरत इस बात की है कि उठाए गए मुद्दों पर चर्चा की जाए, बिना यह सोचे कि उसे किसने और किस मंच पर उठाया? नीति-निर्माताओं के लिए अब यह वक्त आ गया है कि स्वतंत्र विचार एवं अभिव्यक्ति का विषय हम वकीलों पर छोड़ दे और हम ऐसी कई दलीलें लेकर आ सकते हैं कि मुक्त भाषण पर तर्कसंगत निषेध क्या हैं और क्या भाषण की सामग्री राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध है? इसके बजाय, नीति-निर्माताओं के लिए इस बात पर ध्यान देना अपरिहार्य है कि बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों में विश्वास बहाल करने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं ताकि वे अपने थैले का मुंह खोलें और कारोबार जगत को खुलकर कर्ज दें जिससे हम किसी मंदी की चपेट में जाने से बच जाएं। 
 
(लेखक अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)
Keyword: rahul bajaj, amit shah, media, social media,,
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