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श्रीलंका और हिंद महासागर में भारत-चीन प्रतिद्वंद्विता

अनीता इंदर सिंह /  December 09, 2019

आर्थिक क्षेत्र में धीमेपन से गुजर रहे भारत को श्रीलंका में और हिंद महासागर क्षेत्र में चीन से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। इस विषय में विस्तार से अपनी राय रख रही हैं अनीता इंदर सिंह

 
राजनीतिक रूप से दक्ष और चीन समर्थक माने जाने वाले श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे भारत और चीन दोनों से संबंध बढ़ाएंगे। हालांकि भारत ने श्रीलंका को 45 करोड़ डॉलर का ऋण मंजूर किया और दोनों देश आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को लेकर भी प्रतिबद्घ हैं। श्रीलंका सभी देशों से समान दूरी वाले रिश्ते रखना चाहता है। राजपक्षे का श्रीलंका का राष्ट्रपति बनना भी एशिया के दो चिर प्रतिद्वंद्वी देशों भारत और चीन के साथ उसके रिश्तों में कोई बदलाव नहीं लाने वाला। भारत श्रीलंका का सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार है। चीन श्रीलंका में विदेशी निवेश करने वाला सबसे बड़ा मुल्क है। वह पुराना हथियार आपूर्तिकर्ता भी है जिसने श्रीलंका को गृहयुद्घ के दौरान हथियार मुहैया कराए। चीन के साथ श्रीलंका के निवेश और रक्षा संबंधी रिश्ते प्राय: भारत समर्थक माने जाने वाले राष्ट्रपति मैत्रिपाल सिरीसेना के कार्यकाल में भी मजबूत ही हुए। दोनों के रिश्तों की मजबूती अब इस बात पर निर्भर करेगी कि ये दोनों देश श्रीलंका को क्या पेशकश करते हैं। 
 
भारत की एक बड़ी चिंता यह होगी कि क्या चीन का निवेश श्रीलंका में और साथ ही हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी मौजूदगी और सामरिक पकड़ को और अधिक मजबूत बनाएगा। हिंद महासागर में पड़ोसी मुल्क श्रीलंका की सामरिक स्थिति भारत के लिहाज से भी महत्त्वपूर्ण है। श्रीलंका उस जलमार्ग के बीच स्थित है जो चीन को पश्चिमी एशिया से जोड़ता है। भारत के उलट श्रीलंका चीन की बेल्ट ऐंड रोड पहल (बीआरआई) में शामिल है। परंतु भारत के साथ वह चीन के नेतृत्व वाले एशियाई बुनियादी निवेश बैंक का संस्थापक सदस्य भी है।
 
पारंपरिक तौर पर देखा जाए तो भारत हिंद महासागर को अपने प्रभाव वाला समुद्री क्षेत्र मानता रहा है। हिंद महासागर के कुछ हिस्से में भारतीय जल क्षेत्र भी आता है। देश के कुल कारोबार का 90 फीसदी और इसके अहम तेल आयात का सारा हिस्सा समुद्री मार्ग से ही आता है। यानी समुद्री मार्ग की सुरक्षा उसके लिए सामरिक और आर्थिक निहितार्थ समेटे है। यह सही है कि भारत की भौगोलिक स्थिति उसे समुद्री और दक्षिण एशिया में स्थिरता लाने में अहम भूमिका निभाने का अवसर देती है। वहीं चीन ने चेतावनी दी है कि हिंद महासागर कोई भारत का निजी बाग नहीं है। 
 
हिंद महासागर हमेशा से चीन की रुचि का क्षेत्र नहीं रहा है। परंतु चूंकि चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है और वह अपने तेल का 40 फीसदी से अधिक हिस्सा पश्चिम एशिया से खरीदता है इसलिए उसकी रुचि बढ़ी। ऐसा इसलिए क्योंकि इस तेल का परिवहन समुद्री मार्ग से होता है। आश्चर्य नहीं कि हिंद महासागर क्षेत्र में स्थित बंदरगाहों तक पहुंच और उनमें हिस्सेदारी दोनों चीन की शीर्ष सुरक्षा प्राथमिकता हैं। एक बढ़ती वैश्विक शक्ति के रूप में चीन ने पिछले एक दशक में हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी आर्थिक और सैन्य पहुंच का जमकर विस्तार किया है। चीन ने 2015 के रक्षा श्वेत पत्र में सामरिक नीति और अर्थशास्त्र के बीच के रिश्ते की पुष्टि करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास संबंधी हितों की सुरक्षा पर बल दिया। 
 
हिंद महासागर क्षेत्र के अन्य देशों की तरह श्रीलंका में चीन ने अपना दखल और प्रभाव दो तरह से बढ़ाया। पहली बात, उसने इन देशों के साथ व्यापार और निवेश समझौते किए। दूसरा, उसने अपनी नौसैनिक मौजूदगी बढ़ाई। नौसैनिक सुविधाओं तक चीन की पहुंच विश्वसनीय रूप से मजबूत हुई है। इसके साथ ही उसने हिंद महासागर के आसपास गहरे समुद्र में बंदरगाह सुविधा का नेटवर्क भी स्थापित किया है।  भारत का कहना है कि चीन ने पनडुब्बियों के साथ-साथ अन्य विनाशक उपकरण, विशेष सशस्त्र बल तथा मिसाइल दागने में सक्षम जलपोत हिंद महासागर में तैनात किए हैं। 
 
चीन ने श्रीलंका में बुनियादी विकास, परिवहन, बिजली और ऊर्जा आदि के क्षेत्र में 11 अरब डॉलर का निवेश किया है। वह कोलंबो स्थित इंटरनैशनल फाइनैंशियल सिटी की फंडिंग करके श्रीलंका की मदद कर रहा है ताकि वह गांधी नगर स्थित भारतीय वित्तीय केंद्र का मुकाबला कर सके। श्रीलंका की फाइनैंशियल सिटी की स्थापना हिंद महासागर क्षेत्र में वित्तीय और लॉजिस्टिक्स हब बनने की महत्त्वाकांक्षा पूर्ति के लिए की जा रही है। जाहिर है भारत के साथ दोस्ती और प्रतिस्पर्धा दोनों साथ-साथ चल रहे हैं।
 
चीन के सबसे बड़े निवेश में से एक हंबनटोटा बंदरगाह में है। हंबनटोटा को एक छोटे से मछली पालन करने वाले कस्बे से नौवहन केंद्र के रूप में बदल दिया गया। इसके लिए श्रीलंका ने चीन से 1.3 अरब डॉलर की वित्तीय मदद ली। परंतु श्रीलंका 2017 तक ऋण नहीं चुका पाया और उसने बंदरगाह पर चीन को नियंत्रण अधिकार और 99 वर्ष तक इसके परिचालन की लीज उसे दे दी। चीन के लिए बीआरआई के साथ यह मील का एक और पत्थर था। कारण एकदम स्पष्ट है। हंबनटोटा उन बंदरगाहों के नेटवर्क का हिस्सा है जो चीन को यह क्षमता प्रदान करते हैं कि वह हिंद महासागर में अमेरिकी श्रेष्ठता को चुनौती दे सके। भारत की दृष्टि से देखें तो चीन और श्रीलंका के बीच सैन्य और हथियारों का सहयोग चिंताजनक है। सन 2014 में तो श्रीलंका ने दो चीनी पनडुब्यियों और एक युद्घपोत को कोलंबो बंदरगाह पर खड़ा होने की जगह भी दे दी। इस पहुंच ने भारत को परेशान किया। इस सामरिक महत्त्व के क्षेत्र में चीन के आर्थिक और सैन्य विस्तार के बाद भारत भी हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी सैन्य मजबूती बढ़ा रहा है। 
 
परंतु आर्थिक रूप से भारत उतना सक्षम नहीं है और यह चीन से प्रतिस्पर्धा में आड़े आ रही है। चीन का नौसैनिक शक्ति के रूप में उदय 40 साल की निरंतर प्रगति की बदौलत है। इस क्रम में उसे श्रीलंका समेत हिंद महासागर क्षेत्र के तमाम देशों के साथ आर्थिक और सैन्य सहयोग का भी लाभ मिला है। इस क्षेत्र के देशों में बुनियादी परियोजनाएं पूरी करने की क्षमता मजबूत करने के अलावा भारत को अपनी अर्थव्यवस्था और सैन्य बलों का आधुनिकीकरण भी करना होगा। खासतौर पर नौसेना का। 
 
श्रीलंका में चीन की आर्थिक और सैन्य उपस्थिति तथा हिंद महासागर में उसकी नौसेना की मौजूदगी आने वाले वर्षों में और बढ़ेगी। चीन-श्रीलंका समझौता पहले ही यह दर्शा रहा है कि कैसे अर्थव्यवस्था, नीति और क्षमता की मदद से एक सक्षम नौसेना तैयार कर चीन हिंद महासागर में प्रभावशाली भूमिका हासिल कर चुका है। क्या भारत इस चुनौती से पार पाने के लिए अपनी सैन्य क्षमताओं में तेजी से सुधार कर सकता है? उसकी क्षमता या अक्षमता ही यह तय करेगी कि दक्षिण एशियाई शक्ति के रूप में उसका कद कैसा होगा? 
 
(लेखिका सेंटर फॉर पीस ऐंड कॉन्फ्लिक्ट रिजॉल्यूशन, नई दिल्ली की संस्थापक प्रोफेसर हैं)
Keyword: india, sri lanka, china, sea,,
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