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शहरी सहकारी बैंक

संपादकीय /  December 09, 2019

शहरी सहकारी बैंकों के नियमन में बड़े बदलाव हो रहे हैं। इस समाचार पत्र में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार बड़े शहरी सहकारी बैंक पूरी तरह बैंकिंग नियमन अधिनियम के अधीन हो सकते हैं। इसका असर देश के 1,500 शहरी सहकारी बैंकों पर पड़ेगा जिनके पास 4.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि जमा है। यह वित्तीय तंत्र का बड़ा और अहम हिस्सा है। सन 2017 में इनमें अधिसूचित वाणिज्यिक बैंकों के कुल जमा की 11 फीसदी राशि जमा थी। परंतु दशकों से ये विभाजित नियमन की समस्या से भी दो-चार हैं। फिलहाल इनका प्रमुख नियामक सहकारी समिति पंजीयक है और प्रबंधन चुनाव तथा बाहरी अंकेक्षण पर वही नियंत्रण करता है। परंतु बैंकिंग नियमन अधिनियम के कुछ प्रावधान भी इन पर लागू होते हैं। इनके तहत बैंकिंग नियामक, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) इनका निरीक्षण करता है और ये केंद्रीय बैंक पूंजी पर्याप्तता आवश्यकता की पूर्ति करते हैं। ऐसी तमाम व्यवस्थाओं की तरह इसमें भी भ्रम और मनमानेपन की गुंजाइश रहती है। खासतौर पर आरबीआई के पास सीमित नियामकीय अधिकार थे क्योंकि वह इन बैंकों के बोर्ड पर उस तरह अधिकार नहीं जता सकता था जैसे कि अन्य अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के साथ।

 
जाहिर है यह कदम पीएमसी बैंक में सामने आई धोखाधड़ी के बाद उठाया गया है। इस धोखाधड़ी से जमाकर्ता बुरी तरह प्रभावित हुए। यह कहा जा सकता है कि पीएमसी बैंक के मुद्दे और दोहरे नियमन की समस्या में कोई सीधा संबंध नहीं है और 12,000 करोड़ रुपये के कारोबार वाले पीएमसी बैंक को आरबीआई की अकेली निगरानी के अधीन लाने के लिए 20,000 करोड़ रुपये की सीमा पर विचार किया जा रहा था। जाहिर है यह बड़े शहरी सहकारी बैंकों के भविष्य पर विचार करने का एक अवसर था। पीएमसी बैंक के जमाकर्ताओं की निराशा को देखते हुए एक अहम बदलाव यह होना चाहिए कि इन बैंकों को भी वही संरक्षण मिले जो सामान्य बैंकों को मिलता है। कई पीएमसी बैंक जमाकर्ता यही नहीं जानते कि वे ऐसे बैंक में पैसा जमा कर रहे हैं जिसका नियमन और संरक्षण सामान्य वाणिज्यिक बैंकों से एकदम अलग तरह से होता है। यदि यह अंतर स्पष्ट और पारदर्शी तरीके से जमाकर्ताओं को नहीं बताया जाएगा तो समस्या बनी रहेगी।
 
बैंकिंग क्षेत्र का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है और ऐसे में मौजूदा शहरी सहकारी बैंकों को जारी रखने का कोई स्पष्ट औचित्य नहीं है। शहरी सहकारी बैंकों के लिए सामान्य बैंकों से प्रतिस्पर्धा करना काफी मुश्किल हो गया है क्योंकि उनके पास न तो प्रशिक्षित कर्मचारी हैं और न ही वे पर्याप्त पूंजी जुटाने में सक्षम हैं। आरबीआई के पूर्व डिप्टी गवर्नर आर गांधी की अध्यक्षता वाली एक हालिया उच्चस्तरीय समिति ने सुझाव दिया था कि मौजूदा शहरी सहकारी बैंकों का विलय कर उन्हें इस तरह पुन:स्थापित किया जाए कि उनमें से कई छोटे फाइनैंस बैंक बन जाएं। इन छोटे फाइनैंस बैंकों के लिए कड़े पूंजी पर्याप्तता मानकों के बावजूद पूंजी जुटाना आसान होगा। इसका अहम पहलू होगा प्रबंधन का व्यापक नियंत्रण सुसंगत बनाना और समुचित प्रोत्साहन ढांचा निर्मित करना। यदि शहरी सहकारी बैंकों के संचालन की प्रकृति बदली जा सकी तो नियामकीय व्यवस्था में बदलाव भी सफल साबित होगा। आरबीआई को यह भी समझना होगा कि उसके दायित्वों के साथ उसकी क्षमता भी बढऩी चाहिए। खासतौर पर उसकी अंकेक्षण क्षमता और बोर्डों की निगरानी को गहरा बनाना होगा और उनका दायरा बढ़ाना होगा। बैंकिंग तंत्र में फंसे हुए कर्ज का बढऩा और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की दिक्कतें बताती हैं कि नियामक को अभी काफी कुछ करना है। केवल नियामकीय ढांचा बदलने से शहरी सहकारी बैंकों में स्थिरता नहीं आएगी।
Keyword: bank, loan, debt, RBI, NPA, PMC,,
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