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शक्तिकांत दास: शांति से काम को अंजाम

अनूप रॉय /  12 08, 2019

अब तक का सफर

11 दिसंबर 2018 : आरबीआई के 25वें गवर्नर घोषित, अगले दिन कार्यभार संभाला।
फरवरी : वर्ष 2019 की पांच दर कटौतियों में से पहली कटौती।
मार्च : विदेश मुद्रा विनिमय की शुरुआत
जून : दर में कटौती, नीतिगत रुख बदलकर उदार कर दिया।
7 जून : बैंकों द्वारा ऋणग्रस्त परिसंपत्तियों का समाधान किए जाने के लिए संशोधित खाका जारी किया गया
जुलाई : एनएचबी से आवास वित्त के नियमन का अधिकार आरबीआई के पास
सितंबर : पीएमसी बैंक संकट सामने आया, आरबीआई ने निकासी पर रोक लगाई
नवंबर : आरबीआई ने डीएचएफएल के बोर्ड अपने हाथ में लिया।
दिसंबर :  एमपीसी ने फरवरी के बाद पहली बार दर कटौती रोकी

ऊर्जित पटेल के इस्तीफे के एक दिन के भीतर केंद्र सरकार में आर्थिक मामलों के पूर्व सचिव शक्तिकांत दास को 11 दिसंबर, 2018 को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का गवर्नर नियुक्ति किया गया। उस समय अत्यधिक स्वतंत्र केंद्रीय बैंक को वित्त मंत्रालय के विभाग में तब्दील किए जाने के कयास लगाए जा रहे थे। 

दास को आरबीआई का गवर्नर बने करीब एक साल हो गया है और पहले की चर्चाएं अब कमजोर पड़ गई हैं। आरबीआई पर नजर रखने वाले और अंदर के लोगों का कहना है कि दास अपने प्रतिभाशाली  पूर्ववर्तियों की तरह शांति से अपने काम को अंजाम देने वाले साबित हुए हैं। केंद्रीय बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न प्रकाशित करने का आग्रह करते हुए कहा, 'यह संभव है कि जब आप आरबीआई में आएं तो सरकारी आदमी हों। लेकिन छह महीने पद पर रहने के बाद आप पर आरबीआई का प्रभाव बहुत बढ़ जाता है और आप खुद को आरबीआई का गवर्नर बनने से नहीं रोक पाते हैं।'

दास बहुत बड़े अर्थशास्त्री नहीं हैं। असल में वह प्रशिक्षण के लिहाज से अर्थशास्त्री नहीं हैं। केवल वह वित्त मंत्रालय से जुड़े रहे हैं। लेकिन आरबीआई के पर्यवेक्षकों का कहना है कि उन्होंने स्वाभाविक रुझान दिखाए हैं, जिन्होंने मौजूदा समस्याओं के सबसे उचित समाधान मुहैया कराए हैं। ये समस्याएं पिछले एक साल के दौरान बहुतायत में रही हैं क्योंकि आर्थिक वृद्धि घटकर 2012-13 के निचले स्तरों पर आ गई है, क्षमता उपयोग घटा है और बैंक ऋण में वृद्धि भी धीरे-धीरे घटने लगी है। 

आरबीआई के कर्मचारी दास को एक सज्जन, मृदुभाषी और संतुलित व्यक्ति मानते हैं, जिनसे उनके कनिष्ठ सहयोगी कभी भी संपर्क कर सकते हैं। दास आरबीआई की कैंटीन में जाने में कोई संकोच नहीं करते हैं। कर्मचारियों को सेल्फी के लिए कभी निराश नहीं करते हैं। कार्यक्रमों में दोनों हाथ जोड़कर कर्मचारियों का अभिवादन करते हैं और लंबे समय से बरकरार पेंशन के मुद्दों का समाधान निकालकर उनका भरोसा जीतते हैं। 

इसके अलावा वह अपने सहयोगियों को यह भरोसा दिलाने की कोशिश करते हैं कि आरबीआई सुरक्षित हाथों में है और यह वित्त मंत्रालय के दखल का केंद्र नहीं बनेगा। वह अपने सहयोगियों को चिंतित नहीं होने का भरोसा देते हैं। ऐक्सिस बैंक में मुख्य अर्थशास्त्री सौगत भट्टाचार्य ने कहा, 'गवर्नर दास ने मौद्रिक नीति, ऋण देने, बैंकिंग नियमन या पूंजी खाते को उदार बनाने जैसे कई मसलों में नपे-तुले उपाय लागू किए हैं। उन्होंने  सरकार के साथ नीतिगत मसलों पर प्रभावी समन्वय किया है।'

दास की अगुआई में आरबीआई के लिए वृद्धि हमेशा एक प्रमुख एजेंडा रहा है। उन्होंने अपनी पहले संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने वादा किया था कि वह जितना संभव हो सकेगा, उतना मुद्दों को बातचीत से हल करने की कोशिश करेंगे, आरबीआई की स्वायत्तता बनाए रखेंगे। लेकिन 'सरकार न केवल एक भागीदार है बल्कि देश एवं अर्थव्यवस्था को चलाती है और प्रमुख नीतिगत फैसले लेती है। इसलिए सरकार और आरबीआई के बीच बातचीत जरूरी है।'

दास ने कहा था कि महंगाई का लक्ष्य करना आरबीआई का काम है। लेकिन आरबीआई अधिनियम में वृद्धि का भी जिक्र है। इसलिए भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि को तेज बनाए रखना भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसी वजह से मौद्रिक नीति समिति ने महंगाई गिरकर डेढ़ फीसदी आने पर भी दरों को ऊंची रखने की नीति नहीं अपनाई। फरवरी से दास की अगुआई में आरबीआई ने पांच बार में दरों में 135 आधार अंक की कटौती की है। 

दास के गवर्नर बनने के तुरंत बाद आरबीआई ने द्वितीयक बाजार से बॉन्ड खरीदारी के जरिये बैंकिंग प्रणाली में तीन लाख करोड़ रुपये की नकदी झोंकी है। उन्होंने छह बैंकों को प्रतिबंधात्मक त्वरित उपचारात्मक कार्रवाई (पीसीए) से बाहर निकाला है। हालांकि दास ने फंसे ऋण नहीं दिखाने वाले बैंक प्रबंधन को लेकर कोई उदारता नहीं दिखाई है। आरबीआई लगातार उन बैंकों पर जुर्माने लगा रहा है, जो बैंकिंग दिशानिर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं। 

उन्होंने मौद्रिक बाजार की दरें 137 आधार अंक घटाकर इनका लाभ ग्राहकों तक सुनिश्चित करने की कोशिश की है। बैंकों के पूरी तरह अपने पोर्टफोलियो को बाजार आधारित बेंचमार्कों के दायरे में लाने से ऋण दरों में यह असर दिखेगा। दास की अगुआई में आरबीआई की यह भी उपलब्धि है। दास सार्वजनिक तौर पर सरकार के साथ मतभेद जाहिर करने में यकीन नहीं रखते। जब उनसे सरकार के उन कदमों के बारे में सवाल किए गए जिस पर आरबीआई को एतराज हो सकता था तब उनका एक ही जवाब होता था, 'हमें इस मुद्दे पर जो कुछ भी कहना है उसके बारे में सरकार को सूचना दे दी गई है।' जबकि ऊर्जित पटेल मीडिया के कई सवालों का जवाब देते थे हालांकि उनके जवाब भी तयशुदा ही होते थे।

दिक्कत की बात यह भी है कि आरबीआई की मौद्रिक नीति में सरकार की राजकोषीय फिजूलखर्ची पर कुछ भी नहीं कहा जाता। विश्लेषक कहते हैं कि ऐसा लगता है कि सरकार राजकोषीय स्थिति के बारे में जो कुछ भी कहती है उस पर दास और आरबीआई को पूरा यकीन है। वृद्धि और मुद्रास्फीति के अनुमानों में संशोधन भी मौजूदा रुझानों के असर को महसूस करने के बाद किया गया था।   

लेकिन दिसंबर में आरबीआई ने कुछ ऐसा किया जो पूरी तरह से अप्रत्याशित था। इसने चुप्पी साध ली और मंदी से जुझने के लिए गेंद सरकार के पाले में डालने को तरजीह दी। उनका कहना है कि वृद्धि दर बढ़ाने के राष्ट्रीय स्तर के प्रयास में राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों में एक करीबी तालमेल होना जरूरी है इनमें समन्वय जरूरी है। हालांकि यह बात देर से महसूस हुई है कि अगर चीजें गलत होती हैं जिसकी ज्यादा संभावना दिख रही है तब केंद्रीय बैंक को काफी सावधानी बरतनी होगी।  

एलऐंडटी फाइनैंस ग्रुप की मुख्य अर्थशास्त्री रूपा रेगे नित्सुरे ने बताया, 'दास ने सलाहकारी प्रक्रिया फिर से शुरू की। दुर्भाग्य की बात यह है कि वह आरबीआई में ऐसे वक्त में अपनी सेवाएं दे रहे हैं जब मौद्रिक नीति एक सीमा के बाद प्रभावी नहीं हो सकती है।' केयर रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस कहते हैं, 'आरबीआई के गवर्नर जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं करते। वह एनबीएफसी संकट से सफलतापूर्वक निपटे और सहकारी बैंक से जुड़े संकट को भी उन्होंने बड़ी चतुराई से संभाला।' विचार-विमर्श की प्रक्रिया का एक नतीजा यह हुआ कि ऊर्जित पटेल के कार्यकाल के दौरान आरबीआई द्वारा एक दिन के डिफॉल्ट को लेकर जो परिपत्र जारी हुआ था उसे दास ने पूरी तरह बदल दिया। संकटग्रस्त परिसंपत्तियों के मसौदे से जुड़े 7 जून के संशोधित परिपत्र से बैंकों को यह प्रोत्साहन मिला है कि वे व्यवहारिक रूप से पूरी सक्षमता के साथ फंसे कर्जों का हरसंभव समाधान कर सकें।

दास और उनके मातहत सहयोगी किसी भी अहम मुद्दे पर अपने विचार सार्वजनिक नहीं करते। सरकार और बाजार के बड़े दबाव के बावजूद डिप्टी गवर्नर एन एस विश्वनाथन ने एनबीएफसी को राहत देने के लिए कोई नरमी नहीं दिखाई। कृषि ऋण से जुड़ी समिति की अध्यक्षता करने वाले एम के जैन ने केंद्र और राज्य स्तर पर सरकारों को लताड़ा। दास ने अपनी तरफ से सार्वजनिक बैंकों के बोर्ड में तात्कालिक सुधार और बैंकों तथा गैर बैंकिंग संस्थानों में कॉरपोरेट प्रशासन मानक में सुधार की गुहार लगाई।

सरकार ने दास के नेतृत्व वाले आरबीआई पर इस बात के लिए भरोसा दिखाया कि आवास वित्त कंपनियों का नियमन केंद्रीय बैंक द्वारा होना चाहिए न कि राष्ट्रीय आवास बैंक द्वारा। दास के कार्यकाल के दौरान ही आरबीआई ने गैर-बैंकिंग नियनम पर पूरा नियंत्रण बनाया। लेकिन क्या सरकार के साथ सब कुछ अच्छा चल रहा है? सूत्रों का कहना है कि सरकार और आरबीआई के बीच काफी मतभेद हैं। आरबीआई की अधिशेष राशि का हस्तांतरण सरकार के खाते में करने और सॉवरिन बॉन्ड जारी करने का मुद्दा बेहद विवादास्पद रहा। इन दोनों ही मुद्दों पर दास के नेतृत्व में आरबीआई ने बड़ी कुशलता से अपना दबाव बनाए रखा।

दास ने 11 दिसंबर को आरबीआई का गवर्नर बनने के बाद पहले संवाददाता सम्मेलन में पत्रकारों से कहा था, 'आरबीआई एक बड़ा संस्थान है और इसकी एक लंबी और समृद्ध विरासत है। मैं एक संस्थान के तौर पर आरबीआई की स्वायत्तता और विश्वसनीयता को बनाए रखूंगा। मैं यह सुनिश्चित करूंगा कि इसकी अखंडता बनी रहे।' विश्लेषकों का कहना है कि ऐसा लगता है कि वह अपनी बातों पर टिके हुए हैं।

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