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भारतीय कॉर्पोरेट जगत मुखर होने से हमेशा करता रहा है परहेज

श्यामल मजूमदार /  December 08, 2019

राहुल बजाज की टिप्पणी के बाद उथल-पुथल सी मच गई है। पिछले दिनों बजाज ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि भारत का उद्योग जगत सरकार की आलोचना करने से डरता है। इस बयान के बाद प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया और सबसे अपरिपक्व बयान सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों की तरफ से आए हैं। इन मंत्रियों ने बजाज पर अनर्गल बातें करने और मोदी सरकार के दामन पर कीचड़ उछालने का आरोप लगाया। एक मंत्री ने कहा कि ऐसे बयानों से राष्ट्र हित को नुकसान पहुंचता है, वहीं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक वरिष्ठ नेता ने तो बजाज को 'उनकी राजनीतिक निष्ठा खुलकर प्रकट करने और भय तथा अविश्वास जैसे शब्दों की ढाल उतारने की नसीहत थमा दी।' सरकार के मंत्रियों और भाजपा नेताओं की कटु प्रतिक्रियाओं की एक वजह यह थी कि बजाज ने यह बात अमित शाह जैसे ताकतवर नेता की उपस्थिति में कही थी। दूसरी तरफ स्वयं शाह की प्रतिक्रिया काफी सधी रही और इसके लिए उनकी सराहना की जानी चाहिए।

निष्ठा का प्रदर्शन अच्छी बात है, लेकिन क्या इसका प्रकटीकरण सदैव जरूरी होता है। अगर बजाज के बयान के बाद थोड़ी भी सूझबूझ का परिचय दिया गया होता तो सरकार के मंत्री और भाजपा नेता यह बखूबी समझ जाते कि भारत में हरेक सरकार को ऐसे सत्य या मिथ्या आरोपों से रूबरू होना पड़ा है। इस पूरे मामले पर हड़बड़ाहट में प्रतिक्रियाएं देने से पहले उन्हें आपस में इस बात पर विचार करना चाहिए था कि देश में उद्योग एवं अफसरशाही में किस तरह सुधार किए जा सकते हैं। वैसे भी यह सरकार दूसरी सरकारों से अपनी छवि अलग होने का दावा करती रही है। दूसरी तरफ अगर बजाज अगर इतिहास के पन्ने पलटें तो वह यह महसूस करेंगे कि देश में भय का माहौल या विश्वास का अभाव कोई नई बात नहीं है। पिछले कई वर्षों से देश का उद्योग जगत तत्कालीन सरकारों की आलोचना करने की जहमत नहीं उठा पाया है, इसलिए केवल मौजूदा सरकार पर दोष मढऩा शायद तर्कसंगत नहीं माना जाएगा। राजीव गांधी सरकार में जब विश्वनाथ प्रताप सिंह वित्त मंत्री थे तो तब क्या हालत थी। कालेधन का पता लगाने के लिए सिंह ने उस समय देश के कुछ सबसे प्रतिष्ठित औद्योगिक घरानों के खिलाफ जांच एवं छापेमारी करने के आदेश दिए थे। जांच एजेंसियों के कर्मी उस समय एक दिग्गज उद्योगपति एस एल किर्लोस्कर के घर आधी रात पहुंच गए। यह बरताव कुछ ऐसा ही था जैसा तुच्छ अपराधियों के खिलाफ होता है। उस समय देश के उद्योग जगत में सरकार के विद्वेष के खिलाफ आवाज उठाने वाला शायद ही कोई था। 

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अगले दिन कहा कि 'देश में आर्थिक भागीदारों के बीच भय एवं भरोसे की कमी से आर्थिक विकास थम गया है।' यह वक्तव्य सही हो सकता है, लेकिन यही आरोप संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार पर भी लगाए जा सकते हैं। बजाज उस समय भी अपनी आवाज उठा सकते थे, लेकिन उद्योग जगत के ज्यादातर लोग परोक्ष में ही कानाफूसी करते रहे और कोई भी बात अपनी बात दमदार तरीके से रखने के लिए आगे नहीं आया। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) जैसी एजेंसियों को कई बार सर्वोच्च न्यायालय की फटकार झेलनी पड़ी है। इन एजेंसियों पर अक्सर सत्ता में मौजूद लोगों के इशारों पर काम करने या अपने कार्य के निष्पादन में गंभीरता नहीं बरतने के आरोप लगते रहे हैं। एक के बाद एक सरकारों पर अपने राजनीतिक विरोधियों एवं कुछ मामलों में अपने सहयोगियों, कुछ खास अधिकारियों एवं उद्योगपतियों को जान बूझ कर परेशान किए जाने के आरोप लगते रहे हैं। 

एक बार राज्यसभा में बतौर नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने कहा था कि कानून निर्माताओं, सीबीआई और विधि अधिकारियों के आपसी संबंध संप्रग सरकार के दौरान न्याय के लिए एक त्रासदी साबित हुआ है। जब वाई एस राजशेखर रेड्डी का कांग्रेस में रुतबा था तो सीबीआई ने उनके भ्रष्टाचार के बाद भी आंखें मूंद ली। इसके बाद वाई एस जगन मोहन रेड्डी ने कांग्रेस से जब नाता तोड़ा तो सरकार ने सीबीआई को उनके पीछे छोड़ दिया। इसके बाद हुई एक घटना ने एक बार फिर बहस छेड़ दी। सीबीआई ने विदेश से अवैध रूप में कार आयात करने के मामले में द्रमुक  नेता एम के स्टालिन के घर छापा मारा था। यह छापेमारी तब हुई जब द्रमुक संप्रग सरकार से बाहर हो गई थी।  

आखिकार संप्रग सरकार के कार्यकाल में ही सीबीआई पर 'पिंजरे का तोता' होने का तमगा लगा था। वर्ष 2013 में न्यायमूर्ति बी एम लोढ़ा ने कोयला खदान आवंटन मामले की जांच में सीबीआई के कामकाज में दखल देने के लिए तत्कालीन कानून मंत्री की जमकर खिंचाई की। न्यायालय ने पाया कि सीबीआई की रिपोर्ट में मुख्य बातें पलट दी थीं, जो सीधे तौर पर सरकार को राहत पहुंचा रही थीं। न्यायालय की कड़ी टिप्पणी के बाद कानून मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। 

नैतिकता का राग अलापने वाली कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार में सीबीआई ने कोयला खदान आवंटन मामले में उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला और कम से कम दो पूर्व कोयला सचिवों के खिलाफ मामले दर्ज किए थे। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के पूर्व प्रमुख सी बी भावे को भी परेशानी का सामना करना पड़ा जब सीबीआई ने कहा कि वह स्टॉक एक्सचेंज की स्थापना के लिए एमसीएक्स का आवेदन मंजूर करने के मामले में उनकी (भावे) भूमिका की जांच कर रहा है। सीबीआई ने 2006 से 2009 के बीच कोयला सचिव रहे एच सी गुप्ता के खिलाफ भी जांच शुरू की थी। गुप्प्ता बाद में भारतीय प्रतिस्पद्र्धा आयोग के सदस्य बन गए। सीबीआई को उनकी जांच के लिए कंपनी मामलों के मंत्रालय से अनुमति मांगनी पड़ी। गुप्ता को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। यह परंपरा जारी है। हालांकि अपनी बात रखने वाले या किसी विषय पर आवाज उठाने वालों के खिलाफ सख्त रुख अपनाने से कोई रास्ता नहीं निकलेगा। इससे इतर राह पर चलकर ही स्वच्छ सरकार एवं प्रशासन का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।

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