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छिपे हुए आंतरिक संबंध वृद्घि को कर रहे प्रभावित

नीलकंठ मिश्रा /  December 06, 2019

राज्यों के बजट पर पड़ रहे राजकोषीय दबाव की प्रकृति चक्रीय अधिक है। वहीं कमजोर आयात के कारण बॉन्ड प्रतिफल बढ़ रहा है। विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं नीलकंठ मिश्रा

 
आर्थिक व्यवस्था एक जटिल व्यवस्था है जहां कई अंत:संबंध होते हैं जिन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। जबकि इनका आर्थिक गति और आर्थिक चक्र पर गहरा असर होता है। राज्य के व्यय से शुरुआत करें तो आम धारणा में सरकार से तात्पर्य केंद्र की सरकार से होता है। जब कंपनियां भुगतान में देरी की शिकायत करती हैं तो हर कोई केंद्र की तरफ देखता है। बहरहाल, विशुद्ध आधार पर देखा जाए तो राज्य मिलकर केंद्र की तुलना में 90 फीसदी अधिक व्यय करते हैं। अपने व्यय के मामले में उन्हें केंद्र की तुलना में अधिक विवेकाधिकार भी हासिल हैं। उदाहरण के लिए केंद्र के व्यय का करीब चौथाई हिस्सा ब्याज भुगतान में जाता है। उसका पांचवां हिस्सा वेतन और पेंशन में जाता है जिसे टाला नहीं जा सकता। रक्षा व्यय, राज्यों को हस्तांतरण और सब्सिडी को इसमें जोड़ें तो केंद्र के व्यय का तीन चौथाई हिस्सा इसमें जाता है।
 
राज्य सरकार के भुगतान को लंबित करने की गुंजाइश अधिक होती है। राज्यों के कुल बजट को देखें तो इस वर्ष उनके पास 38 लाख करोड़ रुपये की राशि व्यय करने को है। यह पिछले वर्ष के व्यय से 19 फीसदी अधिक और जीडीपी की हिस्सेदारी के रूप में करीब एक फीसदी ज्यादा है। पूंजीगत व्यय के गत वर्ष की तुलना में 21 फीसदी बढ़कर 6.3 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है। परंतु इन आंकड़ों में संशोधन के बाद काफी कमी आ सकती है। राज्य अक्सर बजट में तय व्यय एवं प्राप्ति के लक्ष्य से चूक जाते हैं। क्रियान्वयन की चुनौतियां भी हैं। हाल के वर्षों में राज्यों की उधारी तय लक्ष्य से कम रही है। इन वर्षों में प्राप्तियों में कमी इसलिए रही क्योंकि केंद्र से होने वाला कर स्थानांतरण बजट अनुमान से कम रहा। इस वर्ष हालात अधिक खराब हो सकते हैं। हमारा अनुमान है कि कुल व्यय वृद्धि सालाना आधार पर 7 फीसदी तक फिसल सकता है।
 
महालेखा परीक्षक (सीजीए) द्वारा केंद्र सरकार के मासिक आंकड़े पेश किए जाने के साथ ही विश्लेषक केंद्रीय कर में फिसलन का परीक्षण करते हैं। इसके साथ ही वे केंद्रीय घाटे और व्यय पर इसके प्रभाव का आकलन भी करते हैं। बहरहाल, यह देखते हुए कि केंद्रीय कर का 42 फीसदी स्वत: राज्यों को हस्तांतरित हो जाता है और राज्यों के कुल व्यय का 40 फीसदी हिस्सा इन्हीं से बनता है, कहा जा सकता है कि राज्यों पर इसका काफी असर है। राज्यों के पास अपने राजकोषीय घाटा लक्ष्य को लेकर कोई लचीलापन नहीं है। परंतु इसका आकलन मुश्किल है क्योंकि सीजीए की वेबसाइट पर सभी राज्यों के मासिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। चूंकि धीमी अर्थव्यवस्था का असर राज्यों की प्राप्तियों पर भी पड़ता है इसलिए जिन राज्यों के राजकोषीय घाटे की सीमा 3 फीसदी के आसपास है उन्हें व्यय में कटौती करनी होगी। 
 
वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) व्यय का मुद्दा हालात को और खराब कर सकता है। जब जीएसटी की शुरुआत हुई, राज्यों से वादा किया गया था कि पांच वर्ष तक सालाना 14 फीसदी की दर से राजस्व वृद्धि होगी। यह भी कहा गया था कि संग्रह में किसी भी कमी की भरपाई केंद्र सरकार द्वारा जुटाए जा रहे क्षतिपूर्ति उपकर के माध्यम से की जाएगी। यह उपकर कोयला, कारों, तंबाकू और कुछ पेय पदार्थों पर लगे अधिभार से आती। गत वर्ष तक राज्यों को जीएसटी का लाभ मिल रहा था क्योंकि धीमी होती अर्थव्यवस्था के बावजूद उनका राजस्व अधिक प्रभावित नहीं हुआ। बल्कि जीएसटी में समाहित करों के साथ उनकी स्थिति सुधरी। परंतु इस वर्ष जीएसटी कर संग्रह में 14 फीसदी वृद्धि के अनुमान को चुनौती मिल सकती है। इसलिए क्योंकि जीएसटी संग्रह इतना कमजोर रहा है कि क्षतिपूर्ति उपकर की मात्रा इतनी नहीं होगी कि उसे राज्यों को सौंपा जा सके। कोयले में मंदी और वाहनों की मांग में कमी ने इस उपकर संग्रह पर असर डाला है।
 
यदि केंद्र इस वर्ष भरपाई नहीं कर पाता है और अगले वर्ष भी ऐसा होता है तो प्राप्तियों में जो कमी आएगी उसका असर राज्यों के व्यय पर दिखेगा। चूंकि राज्यों ने सातवें वेतन आयोग की अनुशंसा लागू कर दी है इसलिए उनकी व्यय प्रतिबद्धता में भी भारी इजाफा हुआ है। उनका पेंशन बिल पहले ही कुल व्यय का 10 फीसदी है। ऐसे में व्यय में कटौती के लिए विवेकाधीन पूंजीगत व्यय में कमी की जा सकती है। शायद कंपनियां जिस लंबित भुगतान की बात कर रही हैं वह इसी वजह से है। बीते कुछ वर्षों के दौरान राज्यों के समेकित पूंजीगत व्यय का महत्त्व बढ़ा है। इसने कुछ हद तक निजी घरेलू पूंजीगत व्यय में आई कमी की भरपाई की है। राज्य सरकारों के पूंजीगत व्यय में कटौती का नकारात्मक असर भविष्य में आर्थिक वृद्धि पर पड़ सकता है। इससे हालात और बिगड़ेंगे।
 
दूसरा महत्त्वपूर्ण अंर्तसंबंध है ब्याज दरों पर मंदी का प्रभाव। अर्थव्यवस्था में धीमापन आने के साथ ही आयात और वाणिज्यिक वस्तुओं के व्यापार में कमी आई है। चूंकि भारत का सेवा व्यापार 130 अरब डॉलर का है और बीते दो महीनों में उसका वार्षिक वस्तु व्यापार घाटा 125 अरब डॉलर है, तो इससे यही संकेत निकलता है कि देश चालू खाते के अधिशेष में है। यह अस्थायी हो सकता है क्योंकि सोने का आयात सामान्य स्तर से नीचे है। परंतु इस अवधि में निरंतर पूंजीगत आवक के कारण भारत भुगतान संतुलन अधिशेष की स्थिति में भी रहा। केंद्रीय बैंक द्वारा इसके समायोजन के लिए हस्तक्षेप करने के बाद देश का आरक्षित भंडार दो महीने में 15 अरब डॉलर बढ़ा।
 
दिलचस्प बात यह है कि स्थानीय बॉन्ड कारोबारी इसे सरकारी बॉन्ड प्रतिफल में इजाफे की वजह मानते हैं। तर्क यह है कि भारतीय रिजर्व बैंक खुले बाजार में सरकारी बॉन्ड की खरीद के जरिये अथवा मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप के जरिये टिकाऊ नकदी डालता है। मुद्रा बाजार में वह डॉलर खरीदता और रुपये की बिक्री करता है। यदि डॉलर की खपत की दर इतनी अधिक है तो उसे सरकारी बॉन्ड खरीदने की आवश्यकता नहीं। इससे सरकारी बॉन्ड की मांग में कमी की स्थिति बनती है। यही कारण है कि कमजोर आयात और कमजोर अर्थव्यवस्था होने पर भी सरकारी बॉन्ड के लिए प्रभावी ब्याज दर मेंकमी नहीं आ रही। बाजार प्रतिभागियों और नीति निर्माताओं के लिए यह आवश्यक है कि वे अर्थव्यवस्था के इन अंतर्संबंधों की पड़ताल करें और आर्थिक गति पर इनके प्रभाव को सीमित करने के लिए कदम उठाएं।
Keyword: bond, ETF, market, share, economy,,
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