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हर बार रीपो दर नहीं घटा सकता भारतीय रिजर्व बैंक

बीएस संवाददाता /  December 05, 2019

पांचवीं द्विमासिक मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) बैठक के बाद आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास ने मीडिया के साथ बातचीत में दर कटौती, ब्याज दरों की स्थिति, एनबीएफसी क्षेत्र के बारे में विस्तार से बातचीत की। पेश हैं उनसे हुई बातचीत के मुख्य अंश:

 
मुद्रास्फीति में गिरावट आने और जुलाई तक इसके 3.8 से 4 प्रतिशत के दायरे में रहने की उम्मीद के बीच आपने दरों में कटौती क्यों नहीं की? आप बजट से क्या उम्मीद करेंगे और क्या फरवरी में दर घटाएंगे?
 
मौजूदा समय में खासकर खाने-पीने की मुद्रास्फीति में मौजूदा तेजी पर विचार करने की जरूरत है। हमारी गणना से पता चलता है कि वित्त वर्ष 2020 की चौथी तिमाही में खाद्य मुद्रास्फीति ऊंची बनी रहेगी, और इसमें नरमी कई कारकों पर आधारित है। मुख्य मुद्रास्फीति मौजूदा दायरे में बनी रहने का अनुमान है, लेकिन दूरसंचार से संबंधित कारक हैं जो इस पर कुछ प्रभाव डाल सकते हैं। एमपीसी इस पर स्थिति स्पष्टï करना चाहेगी। मुद्रास्फीति का सही लक्ष्य निर्धारित करना आरबीआई का मुख्य उद्देश्य है और इसके लिए उसे वृद्घि के लक्ष्य को भी ध्यान में रखने की जरूरत है। एमपीसी ने स्पष्टï कहा है कि आगे और दर कटौती की गुंजाइश है तथा आरबीआई स्थिति को ध्यान में रखते हुए आरबीआई कदम उठाएगा। हम वृद्घि के संबंध में कुछ खास सकारात्मक बदलाव देख रहे हैं, लेकिन इस बारे में कुछ कहना जल्दबाजी है, क्योंकि यह देखना जरूरी है कि हालात कैसे रहेंगे। जहां तक बजट का सवाल है तो यह चिंता का सवाल है कि राजकोषीय घाटा अधिक होगा। हम स्थिति स्पष्टï होने का इंतजार कर रहे हैं। सरकार ने कई कदम उठाए हैं और आरबीआई ने भी उसके बाद दरें घटाई हैं और पर्याप्त तरलता की स्थिति है। दर कटौती का पूरा असर दिख भी रहा है। इसका असर पूरी तरह दिखने में कुछ और समय लगेगा। इसलिए एमपीसी ने दर कटौती को अस्थायी रूप से टालने का निर्णय लिया।
 
क्या एमपीसी फिलहाल वृद्घि के पक्ष में कदम उठा सकती है?
 
मैं इस बिंदु पर बहस नहीं करूंगा। लेकिन दर कटौती का समय 135 आधार अंक की कटौती के असर को समझने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। इसका असर दिखने दीजिए जिससे कि हम ज्यादा लाभ मुहैया करा सकें। हम हर अवसर पर दर कटौती का सिलसिला बरकरार नहीं रख सकते।
 
सरकार राजकोषीय घाटे के मोर्चे पर थक चुकी है और राजस्व वृद्घि धीमी होने से वृद्घि को मदद मिलने की पर्याप्त गुंजाइश नहीं रह गई है। आरबीआई और आप बजट का इंतजार कर रहे हैं। वृद्घि की जिम्मेदारी कौन लेगा?
 
यह जिम्मेदारी दोनों की है और हम तालमेल के साथ इस दिशा में कार्य बरकरार रखेंगे। आपका यह कहना गलत है कि हम इसके लिए एक-दूसरे की ओर देख रहे हैं। वृद्घि एक राष्टï्रीय मुद्दा है। दूसरी और तीसरी तिमाही हमेशा से ऊंचे राजकोषीय घाटे से जुड़ी रही है, क्योंकि राजस्व प्रवाह चौथी तिमाही में बढ़ता है और अन्य कर संग्रह, तथा अन्य खर्च पूरे वर्ष समान रूप से संतुलित रहते हैं। वृद्घि को बढ़ावा देने के लिए सरकार के कदमों पर विचार करने के बाद हमें स्पष्टï स्थिति देखने को मिलेगी।
 
क्या जीडीपी वृद्घि दर में कमी के साथ रोजगार नुकसान की आशंका है?
 
दो महीने के अंतराल के साथ किए गए अपने सर्वेक्षणों के आधार पर हमें अगले वर्ष की दूसरी छमाही में आय वृद्घि में सुधार की उम्मीद है।
 
नीतिगत बयान काफी हद तक आपके द्वारा उठाए गए कदमों से जुड़ा हुआ है, और संकटग्रस्त एनबीएफसी को एनसीएलटी में लाना नियामक का काम है। इस बारे में आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
 
नियामक के तौर पर, आरबीआई की जिम्मेदारी संकटग्रस्त एनबीएफसी को एनसीएलटी के पास भेजने के साथ समाप्त हो जाती है। उसके बाद, इनसॉल्वेंसी प्रोफेशनल और लेनदारों की समिति (सीओसी), और फिर एनसीएलटी को जिम्मेदारी निभानी होती है। इसलिए, हमारा लक्ष्य सिर्फ हालात का विश्लेषण करना और उसका रिकॉर्ड तैयार करना है। हमें पूरी स्थिति व्यावहारिक तौर पर देखने की जरूरत है। हम व्यवस्था में ज्यादा व्यवधान और अनिश्चितता पैदा नहीं कर सकते। 
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