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'बाजार ने अच्छे और कम अच्छे एनबीएफसी में किया है फर्क'

सुब्रत पांडा / मुंबई December 05, 2019

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर शक्तिकाांत दास ने आज कहा कि बाजार ने अच्छे और कम अच्छे एनबीएफसी में अंतर किया है और बेहतर प्रदर्शन करने वाले एनबीएफसी को आईएलऐंडएफएस की घटना से पहले की दरों पर पैसा मिल रहा है। फिलहाल अच्छे एनबीएफसी 3 महीने के वाणिज्यिक पत्र 5-6 फीसदी के ब्याज दर पर जुटा रहे हैं जबकि उनके मुकाबले कम अच्छे एनबीएफसी को 3 महीने के वाणिज्यिक पत्र के लिए करीब 8-9 फीसदी की दर से ब्याज चुकाना पड़ रहा है। वहीं इस श्रेणी में आने वाली कुछ एनबीएफसी को ऋण बाजार या धन बाजार से बिल्कुल भी पैसा नहीं मिल पा रहा है।
 
इक्रा के उपाध्यक्ष और सेक्टर प्रमुख अनिल गुप्ता ने कहा, 'आईएलऐंडएफएस के दौर से पहले 3 महीने के वाणिज्यिक पत्र के लिए दरों में अंतर 1 फीसदी से कम था और अब यह करीब 3 फीसदी है।' टाटा कैपिटल के प्रबंधन निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी राजीव सभरवाल ने कहा, 'एनबीएफसी के लिए रकम की उपलब्धता में सुधार आया है। रकम की लागत कम हुई है (वास्तविक ब्याज दर कम हुए हैं) और लंबी अवधि का वित्त उपलब्ध है। अब वाणिज्यिक पत्र 12 महीनों के लिए जारी किए जा रहे हैं जो पहले 3-6 महीनों के लिए जारी किए जा रहे थे और ऋण पत्र 3-5 साल के लिए मौजूद हैं जो कि 12-18 महीनों के लिए ही थे।' 
 
  दास ने मौद्रिक नीति समिति की बैठक के बाद मीडिया से बातचीत में कहा, 'एनबीएफसी क्षेत्र पर नजर रखी जा रही है और इस क्षेत्र में धीरे धीरे ऋण के प्रवाह में सुधार हो रहा है।' इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि छाया बैंकिंग प्रणाली में व्याप्त तरलता की स्थितियों को देखते हुए रिजर्व बैंक जहां कहीं भी जरूरी होगा यह सुनिश्चित करने में संकोच नहीं करेगा कि कोई भी बड़ा या व्यवस्थागत रूप से महत्त्वपूर्ण एनबीएफसी धराशायी नहीं हो। रिजर्व बैंक लगातार शीर्ष 50 एनबीएफसी पर करीबी और सघनता से नजर बनाए हुए है। गवर्नर ने कहा, 'हमें जहां कहीं भी लग रहा है हम गहराई से उनके बही खातों और अन्य संख्याओं पर नजर रख रहे हैं। हमें पूरी तरह से पता है और मैं कुछ हद तक विश्वास से कह सकता हूं कि हमें अच्छी तरह से समझ है कि संकट कहां पर है और जो एनबीएफसी संकटग्रस्त हैं हम गहनता से उन पर नजर रख रहे हैं।' 
 
बहरहाल, गवर्नर ने कहा कि रिजर्व बैंक संकटग्रस्त एनबीएफसी के प्रबंधन और प्रमोटरों के साथ एक निश्चित अंतराल पर विचार विमर्श करता है।  गवर्नर ने कहा, 'रिजर्व बैंक इन एनबीएफसी के प्रमोटरों के साथ साथ उनके प्रबंधन के साथ भी चर्चा करता है। हम उन्हें स्पष्टï अपने अपेक्षित उपायों के बारे में बताते हैं जो उन्हें अपनी समस्याओं से बाहर निकलने के लिए उठाने चाहिए।' आईएलऐंडएफएस की असफलता के बाद एनबीएफसी को बाजार से रकम नहीं मिल पा रहा था और बैंक भी सचेत हो गए थे जिसके बाद वे उन्हें ऋण नहीं दे रहे थे। गवर्नर ने कहा हालांकि, एनबीएफसी को मिलने वाले बैंक ऋण में नवंबर के अंत तक 26.5 फीसदी का इजाफा हुआ है। 
 
रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक बैंकों ने गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों को अप्रैल से अक्टूबर 2019 तक 72,136 करोड़ रुपये दिए जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में 66,222 करोड़ रुपये दिए गए थे। बैंक उच्च खुदरा ऋण पूलों (आवास, उपभोक्ता ऋण) और एसएमई की खरीदारी करके भी वित्त कंपनियों की मदद कर रहे हैं। सितंबर 2018 में आईएलऐंडएफएस की ओर चूक किए जाने के बाद बैंक एनबीएफसी क्षेत्र को अतिरिक्त कर्ज देने में सतर्कता बरतने लगे। अब वे एनबीएफसी को कर्ज प्रदान कर रहे हैं जो आगे खुदरा और एसएमई ऋण देती हैं। दूसरी तरफ बड़े थोक पोर्टफोलियो वाले एनबीएफसी अतिरिक्त रकम जुटाने के लिए संघर्ष कर रही हैं। ऋणदाताओं ने वित्त फर्मों के ऋण प्रोफाइल का निरीक्षण करना भी रोक दिया है और ऋण देने के बदले में पहले से अधिक ब्याज दर और पहले से अधिक जमानती कवर वसूल रहे हैं।   
 
अनिल गुप्ता ने कहा, 'बैंक कर्ज की बढ़ी हुई रकम ज्यादातर एनबीएफसी के पास जा रहा है। इसकी बड़ी वजहों में से एक रिजर्व बैंक की ओर से बैंकों के लिए किया गया विशेष प्रावधान है जिसके तहत वे एनबीएफसी द्वारा प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को कर्ज देने के लिए उनको ऋण मुहैया करा सकते हैं। इस तरह के ऋण प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को ऋण मुहैया कराने के बैंकों के लक्ष्यों को पूरा कर पाने में सक्षम होंगे।' 
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