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मोदी सरकार के लिए मुफीद है राहुल बजाज की टिप्पणी

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  December 05, 2019

वरिष्ठ उद्योगपति राहुल बजाज ने नरेंद्र  मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के सामने एक अहम सवाल खड़ा किया है। आखिर उद्योग जगत, मौजूदा सरकार की आर्थिक नीतियों के खिलाफ बोलने को लेकर भयभीत क्यों है? मोदी सरकार के कार्यकाल में इतना डर का माहौल क्यों है कि उद्योगपति सरकार को लेकर आलोचनात्मक टिप्पणी करने से भी घबरा रहे हैं? बजाज ने कहा कि तुलनात्मक रूप से देखें तो यही उद्योग जगत, मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने से नहीं घबराता था। मोदी सरकार ने बजाज की बातों को काफी गंभीरता से लिया है। गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि ऐसी कोई वजह नहीं जिससे उद्योग जगत माने कि भय का वातावरण है। परंतु चूंकि ऐसी टिप्पणी की गई है तो सरकार देखेगी कि क्या सुधार किए जा सकते हैं।

 
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि सवालों का जवाब चाहना हमेशा अपनी धारणाओं को फैलाने से बेहतर होता है क्योंकि इससे राष्ट्रीय हित को नुकसान पहुंच सकता है। रेल एवं वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसे सवाल उठाए जाने का अर्थ ही है कि भय का कोई वातावरण नहीं। आवास, शहरी मामलों और नागर विमानन मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि बजाज के जैसे वक्तव्य झूठा माहौल तैयार करते हैं। बजाज ने गत सप्ताह मुंबई में देश के उद्योग जगत की शीर्ष हस्तियों और मंचासीन वरिष्ठ मंत्रियों की मौजूदगी में जो कुछ कहा उसके संदर्भ और निहितार्थ की पड़ताल जरूरी है।
 
ध्यान रहे कि 80 वर्ष की उम्र के इस उद्योगपति ने अपनी आलोचनात्मक टिप्पणी के आरंभ में कहा कि मोदी सरकार कुछ अच्छा काम कर रही है। परंतु वह इस बात से दुखी थे कि उद्योग जगत के लोग इस बात को लेकर निश्चित नहीं थे कि सरकार के प्रति उनकी आलोचनात्मक टिप्पणी की सराहना होगी या नहीं और सरकार उसे ठीक से लेगी या नहीं। यह, मोदी सरकार के आर्थिक चुनौतियों से निपटने के तरीके की आम आलोचना से अलग है। बजाज की आलोचना मौजूदा आर्थिक मंदी से उपजी चुनौतियों से निपटने के सरकार के तौर तरीकों पर केंद्रित नहीं थी। बजाज उस बॉम्बे क्लब के संस्थापक सदस्य थे जिसने सन 1990 के आरंभ में मांग की थी आर्थिक खुलापन आने के बाद देश के घरेलू उद्योग जगत के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों से बचाव सुनिश्चित किया जाए। बजाज मोदी सरकार के टैरिफ बढ़ाने या दुनिया की सबसे बड़ी व्यापार व्यवस्था बन सकने वाले व्यापक क्षेत्रीय आर्थिक साझेदारी (आरसेप) से बाहर आने को लेकर असहज नहीं थे।
 
आलोचना मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर केंद्रित नहीं थी बल्कि वह इस बात के खिलाफ थे कि सरकार उद्योग जगत की प्रतिपुष्टि सुनने को तैयार नहीं है। यहां तक कि उद्योग जगत अब आलोचना करने से भी घबरा रहा है। बायोकॉन की चेयरपर्सन और प्रबंध निदेशक किरण मजूमदार शॉ ने बजाज की बातों का समर्थन किया और आशा जताई कि सरकार अब उद्योग जगत से इस विषय पर चर्चा करेगी कि आर्थिक वृद्धि में सुधार कैसे किया जाए। शॉ ने सोशल मीडिया पर अपनी टिप्पणी में कहा कि अब तक सरकार अर्थव्यवस्था की आलोचना नहीं सुनना चाह रही थी। 
 
ऐसे में बजाज दरअसल यह कहना चाह रहे थे कि मोदी सरकार को उद्योग जगत के नेताओं और सत्ता प्रतिष्ठान के बीच संवाद कायम करना चाहिए। वह कारोबारियों की यह इच्छा सामने रख रहे थे कि सरकार और कारोबारियों के बीच संबद्धता नए सिरे से तय होनी चाहिए। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के शुरुआती दिनों में इन शर्तों को नए ढंग से तय किया गया था। उद्योग जगत ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार की सराहना की थी। उसे लग रहा था कि प्रधानमंत्री मोदी और अधिक आर्थिक सुधार लाएंगे। अपेक्षाओं के अनुरूप मोदी ने भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन का कड़ा प्रयास किया लेकिन बढ़ते राजनीतिक प्रतिरोध के चलते उन्हें पीछे हटना पड़ा। पहले कार्यकाल के बचे हुए वक्त में मोदी ने वस्तु एवं सेवा कर, अचल संपत्ति नियमन और ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया निस्तारण जैसे कई अहम सुधार किए। दूसरे कार्यकाल में भी मोदी सरकार ने कॉर्पोरेशन कर दर में कमी और महत्त्वाकांक्षी निजीकरण कार्यक्रम के माध्यम से साहसी कदम उठाए। 
 
परंतु यह स्पष्ट होता जा रहा था कि मोदी सरकार उद्योग जगत के करीब दिखना नहीं चाहती। इसलिए क्योंकि उद्योग जगत के बहुत करीब दिखने के राजनीतिक जोखिम हैं और इससे भाजपा को राजनीतिक नुकसान हो सकता था। ऐसी स्थिति में बजाज का यह कहना कि उद्योग जगत के लोग सरकार की आलोचना करने से डरते हैं, दरअसल भाजपा की इस राजनीतिक छवि को मजबूत करता है कि वह उद्योग जगत से दूर है। यहां तक कि 2019 के आम चुनाव में ज्यादा बहुमत से सत्ता में आने के बाद भी भाजपा नेतृत्व निरंतर अपनी राजनीतिक पूंजी और छाप मजबूत करने में लगा हुआ है। 
 
ऐसा इसलिए कि महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन उसके लिए एक झटका साबित हुआ। उसे आगामी विधानसभा चुनावों में जबरदस्त जीत की आवश्यकता है। वह एक ऐसी सरकार के रूप में दिखना चाहती है जिसके उद्योग जगत के साथ करीबी रिश्ते नहीं हैं। नतीजा? उद्योग जगत के लोगों का सरकारी नीतियों के खिलाफ बोलने से डरना आगामी चुनावों में उसे राजनीतिक रूप से लाभ पहुंचा सकता है। बजाज की बातों ने इस छवि को मजबूत किया है। तथ्य यह है कि उद्योग जगत और सरकार के करीबी रिश्ते भाजपा को चुनाव नहीं जिता सकते। इसके विपरीत उद्योग जगत यदि भाजपा सरकार के साथ सहज है और उसके साथ मित्रतापूर्ण रिश्ता रखता है तो इसका पार्टी के चुनावी प्रदर्शन पर बुरा असर हो सकता है। विपक्षी दल मोदी सरकार को लेकर बजाज की आलोचना से खुश हो सकते हैं लेकिन भाजपा को इसे राजनीतिक वरदान मानना चाहिए।
Keyword: narendra modi, BJP, rahul bajaj, manmohan singh,,
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