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अर्थव्यवस्था में गिरावट लेकिन बाजार में तेजी

आकाश प्रकाश /  December 04, 2019

जब भी मैं उन लोगों से मिलता हूं जो वास्तविक अर्थव्यवस्था में शामिल हैं, उन्हें यह कभी समझ में नहीं आता कि जब अर्थव्यवस्था संकट में हो तो बाजार नई ऊंचाइयों पर कैसे पहुंचते हैं। इससे इसी धारणा को बल मिलता है कि बाजार अतार्किक ढंग से काम करते हैं। आखिर अर्थव्यवस्था के 4.5 फीसदी तक लुढ़कने के बाद निफ्टी नई ऊंचाई पर कैसे?

ध्यान रहे कि 4.5 फीसदी का यह आंकड़ा पिछली 26 तिमाहियों का न्यूनतम है और इसमें भी सरकारी व्यय की हिस्सेदारी 1.9 फीसदी है। समायोजित वार्षिक दर के आधार पर जीडीपी केवल 3.6 फीसदी की दर से बढ़ी थी। निजी निवेश न के बराबर है और सकल स्थायी पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ) की दर बमुश्किल एक फीसदी रही। असमायोजित जीडीपी वृद्घि दर 6.1 फीसदी के नए स्तर तक गिर गई। यह 2019 की दूसरी तिमाही में 12 फीसदी से करीब आधी है। वित्त वर्ष 2019-20 के बजट में सरकार ने असमायोजित यानी नॉमिनल जीडीपी के 11.5 फीसदी रहने का अनुमान जताया था। ऐसे में राजकोषीय गणित और जटिल हो गया है। सरकार द्वारा इस वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को हासिल करने की संभावना नहीं नजर आती। उसके लिए व्यय में भारी कटौती करनी होगी। ऐसी कटौती अर्थव्यवस्था की हालत और पतली करेगी। एक अंक वाली असमायोजित जीडीपी वृद्घि भी कारोबारी आय के लिए प्रतिकूल है क्योंकि लंबी अवधि में जीडीपी और कारोबारी आय के बीच गहन संबंध होते हैं। यानी 6 फीसदी असमायोजित जीडीपी के साथ 20 फीसदी की आय वृद्घि नहीं हासिल की जा सकती। भारत जैसे प्राथमिक घाटे वाले देश के लिए असमायोजित जीडीपी वृद्घि का ऋण की लागत से कम होना उसके ऋण दुष्चक्र में फंसने की वजह बन सकता है। यदि असमायोजित जीडीपी वृद्घि धीमी बनी रहती है तो रेटिंग एजेंसी जल्दी ही दोबारा चिंतित हो जाएंगी। चाहे जैसे भी देखें, अर्थव्यवस्था की स्थिति खराब बनी रहेगी। 

ऐसे में बाजार नई ऊंचाई पर कैसे पहुंच रहे हैं? पहली बात, जैसा कि हमने पहले भी कहा है, हमारे बाजार बहुत अधिक ध्रुवीकृत हैं। कुछ ही शेयर ऐसे हैं जो बाजार को ऊपर ले जा रहे हैं। निफ्टी के नई ऊंचाई पर होने के बावजूद मिड कैप और स्मॉल कैप शेयर अपने उच्चतम स्तर से 25 फीसदी और 40 फीसदी नीचे हैं। जाहिर है यह तेजी लार्ज कैप शेयरों की बदौलत है। यहां तक कि निफ्टी 50 सूचकांक में भी समस्त प्रतिफल 15 शेयरों से ही मिले हैं। अगर निफ्टी को दो हिस्सों में बांट दिया जाए तो दिसंबर 2015 से शीर्ष 15 शेयरों वाला सूचकांक 40 फीसदी तक उछला जबकि शेष 35 कंपनियों वाला सूचकांक 35 फीसदी नीचे गया है। 

यह व्यापक बाजार की बढ़त नहीं है। बुनियादी बात यह है कि पूरी प्रक्रिया व्यापक आर्थिक गति को प्रदर्शित नहीं करती। बल्कि यह दर्शाती है कि निवेशक किसी भी कीमत पर लार्ज कैप शेयरों में कारोबार करना चाहते हैं। इस असमान वृद्घि में ध्रुवीकरण को आसानी से महसूस किया जा सकता है। 

दूसरी बात, वास्तविक अर्थव्यवस्था और बाजार में यह अंतर नया नहीं है। अमेरिका में कहा जाता है कि मेन स्ट्रीट और वॉल स्ट्रीट में अंतर नया नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि शेयर बाजार रियायती व्यवस्था पर काम करते हैं। वे प्रमुख आर्थिक संकेतकों की शृंखला का अंग हैं। वे वास्तविक अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करते हैं। बाजारों का कहना है कि वे सबसे बुरा दौर देख चुके हैं और अगले एक वर्ष में अर्थव्यवस्था में नए सिरे से गति देखने को मिलेगी। राजकोषीय और मौद्रिक नीति का सहयोग अर्थव्यवस्था को स्थिर करेगा और वृद्घि दर में वापसी देखने को मिलेगी। बाजार वृद्घि के सामान्य होने पर दांव लगा रहे हैं। हो सकता है बाजार वृद्घि की वापसी के तरीके को लेकर स्पष्टï न हों लेकिन उन्हें यह साफ पता है कि 5 फीसदी की दर भारत के लिए नव सामान्य नहीं है।

बाजार इस बात पर यकीन कर रहे हैं कि कमजोर अर्थव्यवस्था गंभीर सुधारों और बदलाव का दबाव बनाएगी। किसी को कॉर्पोरेट कर दर में इतनी कटौती और उसके तत्काल असर की उम्मीद नहीं थी। तमाम लोगों को वास्तविक रणनीतिक विनिवेश की उम्मीद भी नहीं थी लेकिन ऐसा होता दिख रहा है। बाजार यह मान रहे हैं कि आगामी बजट में व्यक्तिगत कराधान और अन्य ढांचागत सुधारों की दिशा में गंभीर प्रयास देखने को मिलेंगे। सरकारी क्षेत्र के बैंक भी इससे परे नहीं हैं। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) में कुछ बदलाव करके इसे और सहज बनाया जा सकता है। मोदी सरकार नहीं चाहती कि वह केवल 5-6 फीसदी की वृद्घि दर हासिल करे। अब तक यह स्पष्टï हो चुका है कि 5 फीसदी की वृद्घि दर के साथ सामाजिक कार्यक्रमों पर खर्च करने के लिए धन नहीं रहेगा। इस दर पर वैश्विक कंपनियां भी भारत में निवेश की इच्छुक नहीं रहेंगी। यदि हम 7-8 फीसदी की दर हासिल नहीं कर सकते तो भारतीय नीति निर्माण की इन अनिश्चितताओं पर चर्चा का मतलब ही क्या है। यदि जल्दी तेजी नहीं आती तो निकट भविष्य में हमारे 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की संभावना भी नहीं। यह मंदी बेकार नहीं जाएगी। यही कारण है कि बाजार दांव लगा रहे हैं और शायद सही दांव लगा रहे हैं।

भारतीय बाजार अब अकेले नहीं हैं। दुनिया के तमाम वैश्विक बाजार जोखिम के समक्ष हैं। एसऐंडपी 500 करीब 25 फीसदी ऊपर है और दुनिया भर के बाजार नई ऊंचाई छू रहे हैं। सकारात्मक वैश्विक प्रवाह ने भी बाजारों को ऊपर पहुंचाया है। हालांकि हम नई ऊंचाई पर हैं लेकिन भारतीय बाजारों का प्रदर्शन वैश्विक बाजारों की तुलना में कमजोर रहा है। वैश्विक कारकों के कारण एक सीमा तक भारतीय बाजारों में भी उभार देखने को मिल सकता है। यह स्थानीय कारणों से अलग होगा। बाजार इस बात पर दांव लगा रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था वापसी करेगी।

संभव है कि बाजार अग्रगामी हों लेकिन वे अतार्किक कतई नहीं हैं। अगले छह माह कड़ी परीक्षा वाले होंगे। इस अवधि में कुछ न कुछ करना होगा। हमें उपभोक्ता मांग और कारोबारी आत्मविश्वास दोनों बढ़ाना होगा। ऐसे कई सुधार हैं जिन्हें अपनाया जा सकता है। मुझे यकीन है कि सरकार इस बात से अवगत है कि बाजार दांव लगा रहे हैं और उन्हें यकीन है कि वृद्घि दर की वापसी होगी। अगर अपेक्षाएं टूटी तो बाजार नकारात्मक भी हो सकते हैं। इसके अलावा निफ्टी के नई ऊंचाइयों पर पहुंचने का जश्न मनाते हुए हमें यह भी समझना चाहिए कि इन ऊंचाइयों से कितनी उम्मीद जुड़ी हैं। ऐसे में गंभीर सुधारों की राजनीतिक इच्छाशक्ति आवश्यक है। एक व्यवस्थित और सुविचारित योजना के साथ काम करना होगा। सभी का भविष्य इस पर निर्भर है।
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