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महज परिधान नहीं एक चरित्र है वर्दी

प्रेमवीर दास /  December 03, 2019

पुलिसबल में तैनात कर्मचारियों की जरूरतों पर निर्णय-निर्माताओं को सावधानी से विचार करना चाहिए। अनुशासन की अहमियत और शिकायतों के प्रति रवैये पर रोशनी डाल रहे हैं प्रेमवीर दास

 
हाल के महीनों में ऐसी तीन घटनाएं हुई हैं जिन्होंने वर्दी के सवाल को केंद्र में ला खड़ा किया। इनमें से एक मौका कानून व्यवस्था बनाए रखने से जुड़ी दो एजेंसियों के बीच हुए अशोभनीय टकराव का है। इस विवाद के बाद दिल्ली पुलिस के सैकड़ों कर्मचारी अपने मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन करने जा पहुंचे और उन्हें शांत कराने के इरादे से पहुंचे अपने ही आयुक्त से सवाल-जवाब करने लगे। हाल ही में हमने राज्यसभा के सभापति के दोनों तरफ खड़े मार्शल को थलसेना के जनरल से मिलती-जुलती वेशभूषा में खड़े हुए देखा। हालांकि इस पर सवाल उठने के बाद मार्शलों की वर्दी फिर से पुराने रूप में लाई जा चुकी है। अभी हाल ही में हमने यह भी देखा कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रदर्शनकारी छात्रों को पुलिस किस तरह लाठियां लेकर दौड़ा रही है। ये सारी घटनाएं वर्दी-पोशाक के सही मायने पर कुछ अहम सवाल खड़ी करती हैं। 
 
भारत में तीन तरह की वर्दीधारी बल हैं- सेना, अद्र्धसैनिक बल और पुलिस। इनमें से हरेक बल की अपनी खासियत एवं स्पष्ट रूप से परिभाषित जिम्मेदारियां हैं। सेना की बुनियादी जिम्मेदारी देश की क्षेत्रीय अखंडता को सुरक्षित रखना है जबकि अद्र्धसैनिक बल को सुरक्षा की दूसरी पंक्ति के तौर पर काम करने के साथ ही आंतरिक सुरक्षा का जिम्मा संभालना होता है। वहीं पुलिसबल का काम कानून व्यवस्था बनाए रखना है। साफ है कि सेना का आम लोगों से सीधा ताल्लुक सबसे कम होता है जबकि पुलिस का सबसे ज्यादा संपर्क होता है। इससे इन बलों पर पडऩे वाला दबाव भी तय होता है और उसमें पुलिस सबसे आगे होती है। लेकिन इन सभी बलों के दायित्वों के निर्वहन में एक बात समान है। भले ही व्यक्तिगत स्तर पर शिकायतें उठाई जा सकती हैं और हमेशा उन्हें सुना भी जाएगा, लेकिन सामूहिक विरोध प्रदर्शन तो अस्वीकार्य है।
 
भारत के आजाद होने के ऐन पहले 1946 में नौसेना का विद्रोह हुआ था जिसमें सैकड़ों नौसैनिकों ने अपनी बैरकों की घेराबंदी कर अपने अधिकारियों को कुछ समय के लिए बंधक बना लिया था। लेकिन बगावत का झंडा उठाने वाले नौसैनिकों पर जल्द ही काबू पा लिया गया और कई विद्रोहियों को या तो बर्खास्त कर दिया गया या फिर उनके खिलाफ अदालतों में मुकदमे चलाए गए। फिर 1968 में भी नौसेना की टोपास शाखा के नौसैनिकों ने सामूहिक प्रदर्शन किया। इस शाखा के नाविकों का काम जहाजों पर बने शौचालयों की सफाई करना था। ब्रिटिश काल में नौसेना की सभी शाखाओं के नौसैनिक यह काम समान रूप से करते थे। हमारे अधिकारियों को यह लगा कि अगर आजादी के बाद भी नौसेना में वही परंपरा जारी रहती है तो जहाजों पर मौजूद जगह का अधिकतम इस्तेमाल किया जा सकता है और इससे नौसैनिकों की संख्या भी बढ़ेगी। जब इस आशय का आदेश जारी किया गया तो नौसैनिकों ने सामूहिक रूप से इसकी अवहेलना की। बड़ी संख्या में नौसैनिकों ने शौचालयों की सफाई को कमतर मानते हुए ऐसा करने से मना कर दिया था। उनके व्यापक विरोध को देखते हुए यह आदेश वापस ले लिया गया लेकिन विरोध करने वाले अधिकतर नौसैनिकों को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया।
 
इसके कुछ साल बाद 1973 में भी नौसेना के भीतर सीमित स्तर का एक और सामूहिक विरोध देखा गया। उस समय नौसेना के अग्रणी पोत आईएनएस मैसूर के सारे नौसैनिकों ने खाना खाने से इनकार कर दिया। उस समय आईएनएस मैसूर सफर पर निकला हुआ था और यह साफ नहीं था कि यह सामूहिक विरोध केवल स्थानीय है या इसका अधिक व्यापक रूप है। कमान मुख्यालय की जांच से पता चला कि यह विरोध केवल उसी जहाज तक सीमित है। जहाज के अधिकारियों के अलावा एडमिरल ने भी इस विरोध की वजह पता करने की कोशिश की लेकिन कुछ भी सामने नहीं आया। नौसैनिक अपना विरोध जताने के बाद शांति से अपने-अपने काम पर चले गए और रात का खाना भी खाया। बाद में इस घटना की जांचों से पता चला कि नौसैनिकों के बीच ऐसी धारणा पैठ कर गई थी कि उस जहाज के नए कप्तान अनुशासन पर कुछ ज्यादा ही जोर दे रहे हैं। इस शांतिपूर्ण विरोध की वजह चाहे जो भी रही हो, उसे नजरअंदाज नहीं किया गया और उकसाने या भड़काने के काम में किसी भी तरह से शामिल रहे सौ से अधिक नौसैनिकों को सेवामुक्त कर दिया गया। 
 
वर्ष 1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर पर सैन्य कार्रवाई के बाद सेना के भीतर भी सामूहिक विरोध की एक घटना हुई थी। बिहार (अब झारखंड) के रामगढ़ कैंट में मौजूद रेजिमेंट की एक सैन्य टुकड़ी ने अचानक दिल्ली की तरफ कूच कर दिया था। लेकिन जल्द ही उन्हें रोका गया और वापस बैरकों में लाया गया। इस घटना में कोई हिंसा नहीं हुई थी लेकिन कूच करने वाले अधिकतर सैनिकों को या तो नौकरी से हटा दिया गया या दंडित किया गया। सैन्यबलों में सामूहिक विरोध की ये कुछ उजागर घटनाएं हैं। कुछ और घटनाएं भी रही होंगी जिनके बारे में अधिक पता नहीं है। असली बात यह है कि इन सभी घटनाओं में सैनिकों के सामूहिक विरोध को अस्वीकार्य आचरण माना गया और उसी हिसाब से उनसे निपटा भी गया। इस दौरान विरोध का कारण बनने वाले बिंदुओं को स्वीकार करने के साथ उन्हें सुधारा भी गया।
 
वर्दीधारियों के विरोध की हालिया घटनाओं को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। अन्य वर्दीधारी बलों की तुलना में आम नागरिकों के साथ करीबी संपर्क के मामले में पुलिस का काम बेहद जटिल एवं दुरुह है। इसके अलावा पुलिस के दायित्व भी एकदम अलग हैं। पुलिस के कुछ कदम अनावश्यक रूप से कठोर लग सकते हैं लेकिन इनसे बचा भी नहीं जा सकता है। भले ही आंदोलन के मुहाने पर खड़े प्रदर्शन का सामूहिक रवैया बहस का विषय हो सकता है लेकिन यह तय है कि सेना एवं अद्र्धसैनिक बलों के लिए तय मानदंड पुलिस पर नहीं लागू किए जा सकते हैं, लिहाजा कुछ अलग मानक तय करने होंगे। ऐसा भी नहीं है कि पुलिस के भीतर की शिकायत के सामने आने का यह पहला मौका है। तमाम सुधारात्मक कदम भी उठाए गए हैं। पुलिस सुधारों पर विस्तृत रिपोर्ट काफी समय से सार्वजनिक विमर्श के लिए उपलब्ध हैं लेकिन उन पर अमल नहीं किया गया है। पुलिस के कई पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों ने इन सुझावों पर फौरन ध्यान देने की जरूरत बताई है। इस मामले में अगर आला अधिकारियों ने कुछ शुरुआती कदम उठाए होते तो मदद मिली होती। पुलिसबल में सेवारत कर्मचारियों के हितों की सुरक्षा के लिए जरूरी कदमों पर नीति-निर्माताओं को बहुत सावधानी से विचार करने की जरूरत है ताकि वे अपनी वर्दी के हिसाब से आचरण भी करें। इस प्रकरण में आईएएस और आईपीएस ऑफिसर एसोसिएशन की तरफ से जारी किए गए बयान गैरजरूरी होने के साथ ही वांछित परिणाम के लिहाज से भी मददगार नहीं हैं।
 
(लेखक नौसेना की पूर्वी कमान के पूर्व प्रमुख और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के पूर्व सदस्य हैं)
Keyword: police, dress, advocate,,
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