बिजनेस स्टैंडर्ड - निर्माण में सुस्ती, अर्थव्यवस्था को चपत
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निर्माण में सुस्ती, अर्थव्यवस्था को चपत

अर्णव दत्ता / नई दिल्ली 12 03, 2019

नरमी का असर

बिजनेस स्टैंडर्ड निर्माण में सुस्ती, अर्थव्यवस्था को चपतनवंबर की दोपहरी में रविंदर सिंह ग्रेटर नोएडा के सेक्टर 16बी में आरजी लक्जरी होम्स के निर्माण स्थल की चहारदीवारी के बाहर बैठे अपनेे दो साथियों के साथ बातें कर रहे हैं। उन्होंने अपनी राइफल एक पेड़ पर टिका रखी है। 51 साल के सिंह सिक्योरिटी गार्ड हैं। वह और उनके साथी अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। उन्हें तीन महीने से वेतन नहीं मिला है। आरजी लक्जरी होम्स के निर्माण स्थल पर कभी जोरशोर से काम चलता था लेकिन छह महीने से निर्माण कार्य बंद पड़ा है। यह परियोजना राष्ट्रीय कंपनी कानून पंचाट में फंसी है। परियोजना में फ्लैट खरीदने वाले 1,600 खरीदारों ने शिकायत की थी कि नौ साल इंतजार करने के बाद भी उन्हें फ्लैट नहीं मिले हैं। 

कभी इस साइट ऑफिस पर 30 अधिकारी तैनात थे लेकिन अब इसे रियल एस्टेट नियामक एवं विकास प्राधिकरण के अधिकारियों ने सील कर दिया है। सिंह अपनेे परिवार को कोई पैसा नहीं भेज पा रहे हैं। उनकी पूरी उम्मीद आरजी ग्रुप के अधिकारियों के इस वादे पर टिकी है कि दिसंबर में उन्हें पूरा भुगतान कर दिया जाएगा। उनके दोस्त भी सिक्योरिटी गार्ड हैं और उन्हें भी हर महीने 15,000 रुपये वेतन मिलता था। लेकिन उन्हें ज्यादा उम्मीद नहीं है। वे उस सिक्योरिटी एजेंसी को कॉल कर-करके थक गए हैं जिन्होंने उन्हें नौकरी पर रखा था। वहां कोई भी उनका फोन नहीं उठा रहा है और उन्हें संदेह है कि एजेंसी भी डेवलपर के साथ मिली हुई है।

इस परियोजना के लिए 2010 से बुकिंग शुरू हुई थी और अभी तक खरीदारों को एक फ्लैट भी नहीं दिया गया है। इन फ्लैटों की कीमत 40 से 60 लाख रुपये के बीच थी और बहुमंजिला अपार्टमेंटों को मध्य आय वर्ग के परिवारों को लक्जरी होम बताकर बेचा गया था। लक्जरी तो छोडि़ए, यहां एक भी ऐसा अपार्टमेंट खोजना मुश्किल है जिसका काम पूरा हुआ है। करीब पांच साल पहले यहां 700 मजदूर काम करते थे। निर्माण सामग्री से लदे ट्रकों का आना-जाना लगा रहता था लेकिन अब यह जगह वीरान पड़ी है।

आरजी लक्जरी होम्स दिल्ली-एनसीआर की उन सैकड़ों परियोजनाओं में से एक है जिनका काम रुका हुआ है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था संकट में है। करीब एक किमी दूर आम्रपाली ड्रीम वैली का भी यही हाल है। अदालत के आदेश पर इसके प्रवर्तक जेल में हैं। इस टाउनशिप में कंक्रीट का ढांचा खड़ा है और मवेशियों का अड्डा है। यहां एक नोटिस चस्पा है कि यह प्रोजेक्ट उच्चतम न्यायालय के विचाराधीन है। नोएडा एक्सटेंशन और ग्रेटर नोएडा में आपको ऐसी कई परियोजनाएं दिख जाएंगी। इनमें से अधिकांश की शुरुआत 2010 से 2014 के बीच की गई थी जब रियल एस्टेट की कीमतें आसमान छू रही थीं। वर्ष 2015 में करीब 30 हजार फ्लैट लॉन्च किए गए थे लेकिन जुलाई-सितंबर 2019 तिमाही में एक भी नई परियोजना शुरू नहीं हुई। 

रियल एस्टेट एनालिस्ट फर्म एनारॉक के अनुमानों के मुताबिक नोएडा और ग्रेटर नोएडा में अधबने 142,500 फ्लैटों का काम 2013 में शुरू किया गया था। उनकी कुल कीमत करीब 800 अरब रुपये है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में इसी इलाके में सबसे अधिक अधबने फ्लैट हैं। मुंबई में सबसे अधिक 154,000 अधबने फ्लैट हैं जिनकी कीमत 2 लाख करोड़ रुपये है। आंकड़ों के मुताबिक 2015 से दिल्ली-एनसीआर में जितने की फ्लैट लॉन्च किए गए उनमें से आधे यानी करीब 100,000 फ्लैट नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद में हैं। आर्थिक सुस्ती ने उन हजारों लोगों का सपना तोड़ दिया जिन्होंने फ्लैट बुक कराए थे। आम्रपाली और जेपी ग्रुप जैसे बड़े बिल्डरों और आरजी ग्रुप जैसे छोटे डेवलपरों के 30 हजार से अधिक खरीदारों को चपत लगी है। 

रियल एस्टेट में सुस्ती से स्थानीय कारोबारी, वेंडर, प्रॉपर्टी डीलर, ट्रांसपोर्टर और सप्लायर भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। पान की दुकान चलाने वाले मनोज कुमार का कहना है कि 2014 से उनका कारोबार कम से कम 60 फीसदी घट गया है। इन दिनों उनका गुजारा गौड़ सिटी शॉपिंग मॉल में जाने वाले ग्राहकों से होता है। उनकी पत्नी और परिवार मॉल के बाहर परांठे और सब्जी बेचते हैं। स्थानीय ट्रक एसोसिएशन के राधेश्याम तिवारी के मुताबिक कभी यहां रोजाना 100 से अधिक ट्रक चलते थे। लेकिन अब यह संख्या दो दर्जन रह गई है।

यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि इस इलाके में कितने लोगों का रोजगार छिना है लेकिन सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस के अनुराग कुमार ने कहा कि यह संख्या एक लाख से ऊपर हो सकती है। मोटे अनुमान के मुताबिक 2015 से दस लाख से अधिक कार्यदिवसों का नुकसान हुआ है। रियल एस्टेट में सुस्ती की शुरुआत वर्ष 2010 के शुरुआत में हुई थी लेकिन इसे थामने के उपाय नहीं होने से स्थिति गहरा गई। क्रेडाई वेस्टर्न यूपी के अध्यक्ष निर्वाचित और एबीए कॉरपोरेशन के निदेशक अमित मोदी के मुताबिक 2010 की शुरुआत में रियल एस्टेट गतिविधियों में तेजी आई थी लेकिन सरकार बाजार का रुख भांपने में नाकाम रही और उसने इसके लिए जरूरी कदम नहीं उठाए। उन्होंने कहा, 'शुरुआती दिनों में किसानों के मुआवजे का मुद्दा उठा था और इससे बहुत नुकसान हुआ। इसके बाद डेवलपरों को दर्जनों नियामकीय मंजूरियां लेनी पड़ी जबकि वे इस उद्देश्य के लिए सरकार से जमीन खरीद चुके थे। इससे उनकी लागत बढ़ गई। इससे उनके फ्लैट की कीमत अव्यावहारिक हो गई।'

वर्ष 2010 में जब रियल एस्टेट की कीमतों में अचानक तेजी आई तो कई डेवलपर इसमें कूद पड़े। इनमें से कई डेवलपरों को ज्यादा अनुभव भी नहीं था। बेहद प्रतिस्पद्र्घी बाजार में कई डेवलपरों ने प्रोजेक्ट की वास्तविक लागत से कम पर फ्लैट की पेशकश की। इससे स्थिति और बदतर हो गई। मोदी ने कहा, 'कई प्रॉपर्टी डीलर और दूसरे क्षेत्रों से जुड़े लोग भी रियल एस्टेट में कूद गए और उन्होंने खरीदारों को आकर्षित करने के लिए बेहद कम कीमत पर फ्लैट की पेशकश की। ऐसे प्रोजेक्टों को नाकाम होना ही था क्योंकि उनकी निर्माण लागत भी नहीं निकल पाई।'

नरेडको के अध्यक्ष निरंजन हीरानंदानी ने रुकी हुई रियल एस्टेट परियोजनाओं के लिए विशेष कोष बनाने के सरकार के फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा, 'यह अच्छी पहल है लेकिन इस क्षेत्र के लिए ज्यादा बुनियादी समाधान की जरूरत है। इसे पटरी पर लाने के लिए बकाया ऋण के एकमुश्त पुनर्गठन की जरूरत है।'

कीमतों में कमी से मदद मिल रही है। नरेडको और एनारॉक के अनुमानों के मुताबिक सितंबर, 2019 की तिमाही में ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में जनवरी-मार्च, 2015 की तुलना में अनबिके फ्लैटों की संख्या में 46 फीसदी की गिरावट आई। इसकी वजह यह रही कि बिक्री की तुलना में नए प्रोजेक्ट बहुत कम रहे।लेकिन इसके बावजूद ग्रेटर नोएडा में 37 महीने की बिक्री के बराबर अनबिके फ्लैट हैं। सितंबर 2019 तक इस इलाके में करीब 50 हजार अनबिके फ्लैट थे जिनमें से अधिकांश ग्रेटर नोएडा वेस्ट में हैं। 

उद्योग के एक विशेषज्ञ ने सकारात्मक संकेत दिया। उन्होंने कहा, 'इस इलाके के विकास में आर्थिक और जनांकिकीय प्रोफाइल की अहम भूमिका रही है। इसके साथ-साथ नीतिगत बदलावों से बाजार की धारणा पटरी पर लौट सकती है और इससे भविष्य में रियल एस्टेट गतिविधियों में तेजी आ सकती है।'

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