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ऑनलाइन दवा की बिक्री पर गिरेगी गाज!

सोहिनी दास / मुंबई 12 03, 2019

बनेंगे नियम

डीसीजीआई ने राज्य नियामकों से अदालत के आदेश के मुताबिक ऑनलाइन दवा बिक्री पर रोक लगाने को कहा
ई-फार्मेसी कंपनियां कर रहीं औपचारिक अधिसूचना का इंतजार
अधिसूचना को अदालत में दे सकती हैं चुनौती

बिजनेस स्टैंडर्ड ऑनलाइन दवा की बिक्री पर गिरेगी गाज!भारतीय औषधि महानियंत्रक (डीसीजीआई)ने बिना लाइसेेंस के परिचालन कर रहे ऑनलाइन दवा विक्रेताओं पर सख्ती दिखाई है। इसने 2 दिसंबर को भेजे अपने निर्देश में राज्य के दवा नियामकों से दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार जरूरी कार्रवाई करने को कहा है। अदालत ने पिछले साल दिसंबर में बिना लाइसेंस दवाओं की ऑनलाइन बिक्री पर रोक लगा दी थी। किसी भी ऑनलाइन दवा विक्रेताओं को इस तरह का लाइसेंस जारी नहीं किया गया है क्योंकि फिलहाल इस क्षेत्र के विनियमन के लिए समग्र नियम नहीं हैं।

ई-फार्मेसी कंपनियां मार्केटप्लेस मॉडल के तहत काम कर रही हैं और लाइसेेंसी दवा विक्रेताओं के साथ साझेदारी में चिकित्सक की पर्ची या प्राप्त ऑर्डर के आधार पर दवा की आपूर्ति करती है। सरकार से जुुड़े सूत्रों का दावा है कि अगर मौजूदा मॉडल को अनुमति दी जाती है तो फिर इस क्षेत्र के नियमन के लिए नियम बनाने की क्या जरूरत है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा, 'ऑनलाइन फार्मेसी के विनियमन के लिए नियमों का मसौदा पिछले साल जारी किया गया था। हालांकि अभी इसे अधिसूचित नहीं किया गया है। ऐसे में जब तक इसे अधिसूचित नहीं किया जाता है, तब तक ई-फार्मेसी मॉडल को परिचालन की अनुमति नहीं दी जा सकती है।' हाल ही में मंत्रिसमूह ने ई-फार्मेसी के लिए नियमन पर चर्चा की खातिर बैठक की थी।

हालांकि उद्योग की राय कुछ और ही है। एक अग्रणी ई-फार्मेसी के वरिष्ठ कार्याधिकारी ने कहा कि केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) जब तक इस बारे में औपचारिक अधिसूचना जारी नहीं करता है और चिकित्सकों की पर्ची के जरिये ऑनलाइन दवा की बिक्री पर रोक नहीं लगाई जाती है, वे पुराने मॉडल के तहत परिचालन जारी रख सकते हैं। एक अग्रणी ई-फार्मेसी के संस्थापक ने कहा, 'जब यह अधिसूचना आएगी तो हम उसे कानून के तहत चुनौती देंगे।' उनका तर्क है कि औषधि एवं कॉस्मैटिक्स अधिनियम, 1940 में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से चिकित्सकों की पर्चियां जेनरेट करने के बारे में कुछ नहीं कहा गया है।

एक अन्य वरिष्ठ कार्याधिकारी ने कहा, 'अगर सरकार किसी तरह की बंदिश लगाती है तो हम निश्चित तौर पर उसे अदालत में चुनौती देंगे। अगर आप इसका पालन करते हैं तो फिर फोन या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे कि व्हाट्सऐप के माध्यम से ऑर्डर लेना औषधि एवं कॉस्मैटिक्स अधिनियम के दायरे में नहीं आएगा, जबकि दवा दुकानदारों द्वारा इसका धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाता है।'

पिछले साल दिसंबर में दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा था कि बिना लाइसेंस दवाओं की ऑनलाइन बिक्री उचित नहीं है और उसने सरकार को इस पर रोक लगाने का निर्देश दिया था। दूसरी ओर मद्रास उच्च न्यायालय ने ई-फार्मेसी कंपनियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए इस पाबंदी को हटा दिया था।

ई-फार्मेसी कंपनियों का मानना है कि इस क्षेत्र के लिए व्यापक दिशानिर्देश की जरूरत है। एक ऑनलाइन फार्मेसी के मुख्य कार्याधिकारी ने कहा, 'मौजूदा समय में कारोबार पूरी तरह से वैध है और आईटी अधिनियम और औषधि एवं कॉस्मैटिक्स अधिनियम के दायरे में आता है। हालांकि निवेशकों और ग्राहकों के बीच भरोसा बढ़ाने के लिए क्षेत्र में नियमन की जरूरत है।' मसौदा नियमों के अनुसार केवल सरकार में पंजीकृत ई-पोर्टल ही दवाओं की बिक्री कर सकते हैं। उन्हें दवा की पर्चियों को सहेज कर रखना होगा और मरीजों एवं चिकित्सकों के विवरण का सत्यापन भी करना होगा।

डिजिटल हेल्थ उद्योग के उद्यमियों का संगठन डिजिटल हेल्थ प्लेटफॉम्र्स ने राजधानी दिल्ली में आज संवाददाता सम्मेलन में नियमों को अधिसूचित करने में देरी को लेकर चिंता जताई। 1एमजी के संस्थापक एवं मुख्य कार्याधिकारी प्रशांत टंडन ने कहा, 'हम नियामकों और मंत्रालयों के साथ पिछले चार साल से बातचीत कर रहे हैं और इस मसले पर कई हितधारकों के साथ चर्चा में हिस्सा लिया है। मंत्रालय ने बीते अगस्त में ई-फार्मेसी पर मसौदा अधिसूचना जारी की थी। हालांकि इस क्षेत्र के लिए अब तक स्पष्ट नियामन नहीं बन पाया है।' उद्योग का दावा है कि इस क्षेत्र ने 30,000 से ज्यादा रोजगार का सृजन किया है और इसमें करीब 70 करोड़ डॉलर का निवेश हुआ है। नेटमेड्स के संस्थापक एवं मुख्य कार्याधिकारी प्रदीप डडाह ने कहा कि वे प्रधानमंत्री के आयुष्मान भारत योजना का हिस्सा बनना चाहते हैं। अधिकतर ऑनलाइन फार्मेसी अपना ऑफलाइन मौजूदगी का विस्तार करने पर भी ध्यान दे रही हैं और ओम्नी चैनल विकसित कर रही है।
Keyword: pharma, medicine, online, DCGI,,
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