बिजनेस स्टैंडर्ड - अर्थव्यवस्था में हरित नीति अपनाने से होगा सुधार
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Sunday, December 15, 2019 05:18 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

अर्थव्यवस्था में हरित नीति अपनाने से होगा सुधार

अरुणाभ घोष /  December 02, 2019

देश की अर्थव्यवस्था को ढांचागत सुधारों के रूप में एक बड़े कदम की आवश्यकता है। इसके साथ ही फिलहाल दूसरी पीढ़ी की हरित नीतियों की भी जरूरत महसूस की जा रही है। विस्तार से बता रहे हैं अरुणाभ घोष

 
क्या हरित अर्थव्यवस्था देश की अर्थव्यवस्था को बचा सकती है? वर्ष 2012-13 की चौथी तिमाही के बाद पहली बार 2019-20 की दूसरी तिमाही में वास्तविक जीडीपी वृद्घि दर 5 फीसदी से नीचे खिसक गई है। सरकारी व्यय, बुनियादी निवेश या उपभोक्ता व्यय से वृद्घि को गति मिल सकती है। परंतु सरकारी व्यय पर राजकोषीय जवाबदेही के नियमों ने अंकुश लगा रखा है। अर्थव्यवस्था को बुनियादी ढांचा क्षेत्र में 1.4 लाख करोड़ रुपये के निवेश की आवश्यकता है, तभी 2024 तक 5 लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य हासिल हो सकेगा। परंतु बुनियादी ढांचा क्षेत्र के बकाया भुगतान आदि के कारण निवेश को बरकरार रखना मुश्किल है। उपभोक्ता व्यय 2019-20 की पहली और दूसरी तिमाही के बीच 6.5 फीसदी घटा है।
 
मौजूदा वृहद आर्थिक दौर में यदि किसी चीज के हरित होने की बात कही जाती है तो यह माना जाता है कि उसके साथ अतिरिक्त लागत जुड़ी होगी। एक दशक पहले जब हरित अर्थव्यवस्था की नीतियां पहली बार प्रभावी हुई थीं तब कई लोग इस पर यकीन करते थे। तब से अब तक भारत ने औद्योगिक क्षेत्र में ऊर्जा किफायत हासिल करने में कामयाबी पाई है, किफायती उपकरण निर्माण की लागत कम की है, हरित इमारतों में इजाफा किया है, जीवाश्म ईंधन सब्सिडी सुधार लागू की, इनकी दरों को न्यूनतम किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व क्षमता प्रदर्शित की। 
 
अब अर्थव्यवस्था और हरित अर्थव्यवस्था दोनों की गति में धीमापन आया है। सितंबर में प्रधानमंत्री ने न्यूयार्क में घोषणा की कि नवीकरणीय ऊर्जा की क्षमता को 450 गीगावॉट तक पहुंचाया जाएगा। सन 2022 तक इसे 175 गीगावॉट तक पहुंचाने का लक्ष्य इसलिए हासिल नहीं हो पाएगा क्योंकि अनुबंधों में देरी हुई और विद्युत विक्रय अनुबंधों पर रद्द होने का खतरा मंडराता रहा। केवल अच्छे लक्ष्य तय करने से निवेशक उत्साहित नहीं होते। ऐसे वक्त में जबकि देश की अर्थव्यवस्था को दूसरी पीढ़ी की हरित नीतियों की आवश्यकता है, देश की अर्थव्यवस्था में ढांचागत सुधारों की आवश्यकता है। दोनों को साथ शुरू करने के लिए चुनिंदा परिस्थितियां आवश्यक हैं। अबाध विकास वाले बाजार, शुरुआती पूंजी निवेश की क्षतिपूर्ति के लिए परिचालन व्यय में कमी, शुद्ध मूल्य वृद्धि के लिए स्वदेशीकरण और सामाजिक और समतामूलक परिस्थितियां। मैं आगामी एक दशक के लिए चार कारक चिह्नित करता हूं।
 
पहला, वितरित ऊर्जा में मौजूद अवसरों का अब तक लाभ नहीं लिया गया है। रूफटॉप सौर फोटोवॉल्टिक क्षमता करीब 4.3 गीगावॉट है जो 40 गीगावॉट के तय लक्ष्य या उससे अधिक की क्षमता से कम है। वाणिज्यिक और औद्योगिक उपभोक्ताओं के पास थोक क्षमता है और पांच राज्यों महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु, गुजरात और कर्नाटक कुल क्षमता का 45 फीसदी पूरा करते हैं। आवासीय उपभोक्ताओं तथा अन्य क्षेत्रों तक विस्तार की काफी गुंजाइश मौजूद है। छत पर नवीकरणीय ऊर्जा उपकरण लगाने से जमीन की बचत भी होती है। परंतु आवासीय उपभोक्ताओं को ऋण के लिए संघर्ष करना पड़ता है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एन्वॉयरनमेंट ऐंड वाटर (कीव) ने नया कारोबारी मॉडल विकसित किया है ताकि बिजली वितरण कंपनियां उपभोक्ताओं के साथ सुसंगत बनें और बिजली की लागत में बचत कर सकें। गौरतलब है कि छत पर लगने वाली परियोजना सामान्य सौर परियोजना की तुलना में सात गुना तक अधिक रोजगार तैयार करती है।
 
दूसरा, गतिशीलता से नई संभावनाएं तैयार होती हैं। रॉकी माउंटेन इंस्टीट्यूट और नीति आयोग के मुताबिक सन 2015 से 2030 के बीच देश में वाहनों की तादाद 3.4 से 3.8 गुना तक बढ़ जाएगी। सन 2030 तक वाणिज्यिक कार-जीप और तिपहिया वाहन क्षेत्र में इलेक्ट्रिक व्हीकल का दबदबा हो सकता है। कीव के शोधकर्ताओं का अनुमान है कि यदि सन 2030 तक इलेक्ट्रिक व्हीकल इंजन की लागत के मामले में सामान्य इंजन के समान हो जाता है तो उस समय तक भारत में 2.7 करोड़ इलेक्ट्रिक वाहन होंगे। हमारा अध्ययन बताता है कि सन 2030 में प्रति वाहन कार्बन डाइ ऑक्साइड उत्सर्जन 2 फीसदी से 16 फीसदी कम होगा। एक अन्य सर्वेक्षण में शामिल 37 फीसदी लोगों ने सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल किया और औसतन 1.4 किमी चलकर सार्वजनिक परिवहन की सेवा ली। बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता और सेवाओं की आवृत्ति अहम गतिरोध है। इलेक्ट्रिक वाहन के जरिये हालात में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।
 
यदि स्वदेशीकरण पर ध्यान दिया जाए तो वितरित उत्पादन और गतिशीलता में स्थायित्व अधिक काम आएगा। सन 2030 तक इलेक्ट्रिक वाहनों की 30 फीसदी बिक्री के साथ देश के वाहन क्षेत्र में 5.7 फीसदी मूल्यवर्धन होगा। बशर्ते कि 90 फीसदी पावरट्रेन और बैटरी देश में बनें। घरेलू विनिर्माण के बिना इस क्षेत्र का मूल्यवर्धन 8 फीसदी तक गिरेगा। बैटरी तकनीक में उल्लेखनीय वृद्धि में संभावनाएं निहित हैं। लिथियम आयन बैटरी की कीमतों में 2010 से अब तक 85 फीसदी गिरावट आई है लेकिन कोरियाई, चीनी और जापानी विनिर्माता बाजार पर दबदबा रखते हैं। इस बीच भारत में इसरो, इंडियन ऑयल और टाटा केमिकल्स कम लागत वाली ली-इयॉन अथवा अल्ट्रा लाइट धातु बैटरियों के निर्माण के साथ प्रयोग कर रहे हैं। ये कंपनियां उत्पादन बढ़ाने के लिए संयुक्त उपक्रम की तलाश में हैं। भविष्य में भंडारण उपकरणों की क्षमता 2018 के 24 गीगावॉट प्रति घंटा से बढ़कर 270 से 365 गीगावॉट प्रति घंटे हो सकती है।
 
स्वच्छ तकनीक का प्रयोग चौथा कारक है। ऊर्जा की मांग का अहम हिस्सा न केवल वितरित बुनियादी और इलेक्ट्रिक परिवहन के लिए होगा बल्कि कूलिंग की आवश्यकता के लिए भी। सन 2038 तक आवासीय, गतिशीलता और वाणिज्यिक क्षेत्र में प्रशीतन और वातानुकूलन आठ गुना बढ़ेगा। इन तमाम क्षेत्रों में निवेश बढ़ेगा। जब सूरज चमकेगा तब आवासीय ऊर्जा की मांग कम हो सकती है। लोड को इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग या कूलिंग से संतुलित किया जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में वितरित ऊर्जा से चलने वाली किफायती मोटर आय बढ़ाने वाले उपक्रम को ऊर्जावान कर सकती हैं। इस बाजार का अनुमानित आकार 53 अरब डॉलर है। वितरित ऊर्जा फर्म पहले ही 3 लाख प्रत्यक्ष रोजगार तैयार कर चुकी हैं। सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई में भी वृद्धि हो रही है। व्यवस्थित बनाने पर यह व्यवहार्य भी हो सकती है। ऐसे में अधिशेष बिजली का इस्तेमाल अन्य ग्रामीण उपभोक्ताओं को जोडऩे के लिए किया जा सकता है। इससे किसानों की आय बढ़ेगी।
 
वितरित ऊर्जा, स्थायित्व भरी गतिशीलता, स्वदेशीकरण (खासकर बैटरी निर्माण में) और एकीकृत स्वच्छ तकनीक हरित अर्थव्यवस्था के नए वाहक हैं। इनमें से हर कारक नए निवेश को आकर्षित करने वाला है। यह सारी प्रक्रिया मूल्यवर्धन और रोजगार तैयार करने वाली है। बोझ बनने के बजाय हरित सुधार अर्थव्यवस्था को जरूरी बचाव मुहैया कर सकती है। 
 
(लेखक कौंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट ऐंड वाटर के सीईओ हैं)
Keyword: india, economy, GDP,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या बैंकों की तरह सख्त नियम से एनबीएफसी में बढ़ेगी जवाबदेही?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.