बिजनेस स्टैंडर्ड - मांग में कमी से सिकुड़ रहा इस्पात उद्योग
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मांग में कमी से सिकुड़ रहा इस्पात उद्योग

ईशिता आयान दत्त / कोलकाता 12 02, 2019

नरमी का असर

बिजनेस स्टैंडर्ड मांग में कमी से सिकुड़ रहा इस्पात उद्योगभारतीय इस्पात प्राधिकरण लिमिटेड (सेल) के आईआईएससीओ (इस्को) स्टील प्लांट की पिछले महीने हुई एक बैठक में प्रत्येक विभाग से पूछा गया कि लागत में प्रति टन 3,500 रुपये की कटौती में उनका क्या योगदान होगा। जब तक हर विभाग ने इस बारे में प्रतिबद्घता नहीं जताई, किसी को भी बैठक से नहीं जाने दिया गया। बैठक शाम 5 बजे शुरू हुई और आधी रात तक चली। इससे पता चलता है कि इस्को के मुख्य कार्याधिकारी ए वी कमलाकर लागत में कटौती के लिए कितने गंभीर हैं। पश्चिम बंगाल के आसनसोल में स्थित इस संयंत्र का अगले महीने प्रति टन लागत में 1,500 रुपये कटौती का लक्ष्य है। सुस्त पड़े स्टील बाजार में मुनाफा बरकरार रखने का एकमात्र जरिया लागत में कटौती है। कमलाकर ने कहा कि पिछले एक साल के दौरान शुद्ध बिक्री से होने वाली प्राप्ति प्रति टन 10 हजार रुपये कम हो गई है। केवल पिछली तिमाही में ही इसमें प्रति टन 4,000 से 5,000 रुपये की गिरावट आई है। 

इस्को के वित्तीय प्रदर्शन में भी यह बात परिलक्षित होती है। सितंबर में समाप्त तिमाही में उसे 194.9 करोड़ रुपये का कर पूर्व नुकसान हुआ जबकि जून तिमाही में यह 60.9 करोड़ रुपये था। इस्को मुख्य रूप से निर्माण और बुनियादी क्षेत्र को आपूर्ति करता है जो मॉनसून, सरकारी खर्च में कमी और नकदी संकट के कारण बुरी तरह प्रभावित हुआ है। संयंत्र के वायर रॉड कॉइल का एक छोटा हिस्सा वाहनों के कलपुर्जे बनाने वाली कंपनियां भी इस्तेमाल करती हैं। इस क्षेत्र में भी कमजोर मांग के कारण संयंत्र की मुश्किलें बढ़ी हैं। स्टील की कुल मांग में करीब 60 फीसदी हिस्सा निर्माण क्षेत्र का है जबकि 8 से 10 फीसदी हिस्सा वाहन क्षेत्र का है। स्टील के किसी बड़े एकीकृत संयंत्र में लागत में कटौती के लिए कच्चे माल के अलावा कुछ ही चीजों में बदलाव किया जा सकता है।

एक अधिकारी ने कहा, 'कच्चा माल ही बदलने लायक है। अगर हम प्रति किलो कोक की दर समायोजित करें तो इससे करोड़ों रुपये की बचत होगी।' इस्को की भट्ठी रोजाना पूरी क्षमता के साथ काम करने पर 7,800 टन इस्पात का उत्पादन करती है। सितंबर में उत्पादन 6,000 टन रहा और अक्टूबर में यह 6,700 टन था। अलबत्ता नवंबर में इसकी पूरी क्षमता बहाल हो गई। 

इस्को के पास 6,700 नियमित कर्मचारी हैं जबकि 6,000 कर्मचारी अनुबंध पर हैं। कमलाकर ने कहा, 'उत्पादन भले ही कम हुआ है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हमारे कर्मचारी खाली बैठे हैं। कर्मचारियों पर कोई फर्क नहीं पड़ा है।' घरेलू इस्पात उद्योग की करीब 85 फीसदी कोकिंग कोयले की मांग आयात से पूरी होती है। क्रिसिल रिसर्च के मुताबिक इस साल जनवरी से अक्टूबर के दौरान इसकी प्रति टन कीमत 186 डॉलर रही जो पिछले साल की इस अवधि की तुलना में 9 फीसदी कम है। लेकिन इसमें इस्तेमाल होने वाले एक अन्य प्रमुख कच्चे माल लौह अयस्क की कीमत उच्च स्तर पर बनी हुई है। 

हर किसी के पास एक ही समाधान

कमजोर घरेलू मांग के कारण इस्को का जोर निर्यात पर है। इस्को इस मामले में अकेला नहीं है। छोटी और बड़ी, निजी और सार्वजनिक इस्पात कंपनियों की पिछले नौ महीने से यही स्थिति है। अपने माल को खपाने के लिए वे निर्यात बाजार का रुख कर रहे हैं, उत्पादन घटा रहे हैं और तय समय से पहले ही कारोबार समेट रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक इस वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में तैयार इस्पात की खपत केवल 3.1 फीसदी बढ़ी जबकि पिछले वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में यह 10.3 फीसदी बढ़ी थी।

बिजनेस स्टैंडर्ड मांग में कमी से सिकुड़ रहा इस्पात उद्योगइक्रा के समूह प्रमुख कॉरपोरेट सेक्टर रेटिंग्स जयंत रॉय इसके लिए कमजोर मांग को जिम्मेदार ठहराते हैं। रॉय ने कहा, 'मांग और कीमतों में कमी से चार बड़ी कंपनियों टाटा स्टील, जेएसडब्ल्यू, जेएसपीएल और सेल के वित्तीय प्रदर्शन पर गहरा असर पड़ा है। वित्त वर्ष 2019 में परिचालन मुनाफा 23 फीसदी से घटकर करीब 18 फीसदी रह गया जबकि  इस दौरान ब्याज कवरेज 4.3 गुना से घटकर तीन गुना रह गया। छोटी कंपनियों की वित्तीय स्थिति तो और बदतर रही।' जाहिर है कि देश की आर्थिक सुस्ती का असर अब हर जगह दिखने लगा है और इसका प्रभाव लोगों पर विभिन्न तरीकों से दिख रहा है। 

मान लीजिए एक प्रमुख निजी इस्पात कंपनी में अधिकारियों का वेरिएबल वेतन करीब 25 से 50 फीसदी है। इसमें 60 फीसदी हिस्सा कंपनी के मानकों से जुड़ा है। इसमें एबिटा भी शामिल हैं। एक अधिकारी ने कहा, 'कंपनी के प्रदर्शन से जुड़ा वेरिएबल वेतन का हिस्सा प्रभावित हो सकता है। अपने खर्च की योजना बनाते समय हमें इस बात का ध्यान रखना होगा।' एकमुश्त राशि का इस्तेमाल अधिकतर महंगी खरीदारी या आवास ऋण के भुगतान में किया जाता है और देश की खपत की कहानी में संभवत: यही पेच है। 

सहायक इकाइयों पर भी पड़ा असर

बड़े इस्पात संयंत्रों से जुड़ी छोटी इकाइयों पर भी सुस्ती का असर साफ देखा जा सकता है। कोलकाता से करीब 15 किमी दूर हावड़ा के औद्योगिक इलाके में स्थित गियरबॉक्स बनाने वाली दो इकाइयां अपना कारोबार बंद कर चुकी हैं। ये इकाइयां जिन कंपनियों को आपूर्ति करती थीं, उन्होंने अब चीन से सस्ते आयात का रुख कर लिया है या स्थानीय स्तर पर खरीदारी कर रही हैं। इसके कारण 300 नौकरियां चली गईं। नोटबंदी और लागू होने के बाद हावड़ा में पिछले दो-तीन साल में करीब 100 इकाइयां बंद हो चुकी हैं। छोटी इकाइयों के लिए जीएसटी अनुपालन की लागत वहन कर पाना मुश्किल हो रहा था। मांग में सुस्ती ने उनकी कमर तोड़कर रख दी। 

हावड़ा चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री के महासचिव संतोष कुमार उपाध्याय ने कहा, 'ई-वे बिल के कारा कुछ लोगों को सामान को दूसरे राज्यों में भेजना मुश्किल हो रहा है। इसलिए वे उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा का रुख कर रहे हैं या नुकसान उठा रहे हैं और एनसीएलटी में जा रहे हैं।'  स्टील ट्यूब और पाइप बनाने वाली कंपनी पैटन के प्रबंध निदेशक संजय बुधिया ने कहा कि निर्यात पर आधारित 70-75 फीसदी कारोबार सुस्ती के कारण प्रभावित नहीं हुआ है लेकिन वाहन क्षेत्र में सुस्ती के कारण बाकी कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ है। 

रिफ्रैक्टरी कंपनियों पर भी इसका दबाव साफ देखा जा सकता है। इंडियन रिफ्रैक्टरी मेकर्स एसोसिएशन के प्रमुख समीर नागपाल ने कहा, 'पिछले 6 से 9 महीने से साफतौर पर सुस्ती का असर है। इस्पात संयंत्रों में भी उत्पादन उस स्तर पर है सि पर पिछले साल था। कुछ में ज्यादा उत्पादन हो रहा है तो कुछ में कम।'इस्पात संयंत्रों को आपूर्ति करने वाली एक रिफै्रक्टरी कंपनी के अधिकारी ने कहा, 'हम बहुत कम मुनाफे पर काम कर रहे हैं। ग्राहक देर से भुगतान कर रहे हैं लेकिन भुगतान में कोई छूट नहीं है। इस तरह यह व्यवस्था चरमरा रही है।' बड़ी इस्पात कंपनियां कीमतें बढ़ा रही हैं जिससे कीमत वसूली के कुछ संकेत हैं लेकिन हर किसी के मन में यह सवाल है कि क्या यह उपाय टिकाऊ है। एक छोटी सहायक इकाई के मालिक ने कहा, 'हम चाहते हैं कि मांग फिर से पटरी पर लौटे।'
Keyword: steel, iron ore, SAIL, IISCO,,
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