बिजनेस स्टैंडर्ड - एलजीबीटीक्यू समुदाय को लेकर पूर्वग्रह से ग्रस्त है कारोबारी जगत
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एलजीबीटीक्यू समुदाय को लेकर पूर्वग्रह से ग्रस्त है कारोबारी जगत

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  December 01, 2019

भारत सरकार पहले क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसेप) में शामिल होने की प्रक्रिया में थी लेकिन बाद में ऐन वक्त पर उसने अपने कदम वापस ले लिए। ऐसा प्रतीत होता है कि देश का कारोबारी जगत यही मानता है कि वह अगले 25 वर्ष की अवधि में रखते हुए चीनी उद्यमों से मुकाबला नहीं कर सकता। आरसेप की वार्ताओं में 25 वर्ष की समायोजन अवधि की बात कही गई है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि देश के कारोबारी जगत के दिग्गज सरकार के समक्ष खड़े होने के मामल में भीरू हैं। यदि कभी कोई मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) सार्वजनिक रूप से छोटी सी भी आलोचना करता है तो यह हमेशा सुर्खियां बन जाती है। अब ऐसा लगता है कि देश का कारोबारी जगत नए लोगों को काम पर रखने के मामले में भी प्रतिगामी है। 

 
यहां मेरा तात्पर्य कॉर्पोरेट जगत में लैंगिक विविधता की कमी से नहीं है। हालांकि यह भी सच है। हम बात कर रहे हैं बेनेट कोलमैन मीडिया समूह के स्वामित्व वाले जॉब पोर्टल टाइम्सजॉब के एक सर्वेक्षण की जो विविधता और समावेशन पर आधारित था। सर्वेक्षण का सबसे अहम निष्कर्ष यह रहा कि भारतीय कारोबारी जगत में समलैंगिक समुदाय को लेकर पूर्वग्रह का भाव है। विभिन्न कंपनियों के जिन 1,137 पेशेवरों से सर्वे में बात की गई उनमें से 77 फीसदी ने कहा कि उनका ऐसा कोई सहयोगी नहीं है जो एलजीबीटीक्यू (समलैंगिक, ट्रांसजेंडर तथा ऐसे अन्य) समुदाय से ताल्लुक रखता हो। जबकि 83 फीसदी ने कहा कि वरिष्ठ पदों पर ऐसा कोई नहीं जो वैकल्पिक यौन रुझान रखता हो। 
 
यहां यह सवाल है कि आखिर सर्वेक्षण में शामिल कर्मचारियों ने अपने सहकर्मियों और वरिष्ठों की यौन प्राथमिकताओं से जुड़े सवालों के जवाब कैसे तलाशे होंगे। यह विचार भी अकल्पनीय है कि देश के कारोबारी जगत में कोई समलैंगिक काम नहीं करता होगा लेकिन यह विषय अभी भी इतना वर्जित है कि कार्यस्थल पर वैकल्पिक यौनिक रुझान वाले लोग गुपचुप रहना ही अधिक बेहतर मानते हैं। इस अवधारणा में चकित करने वाली कोई बात नहीं। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 377 हटाए जाने के बावजूद कॉर्पोरेट जगत में इस विषय को लेकर इतनी अधिक खामोशी है। यह अपने आप में बताती है कि समलैंगिकता को लेकर किस कदर भेदभाव वाला माहौल है। एलजीबीटीक्यू समुदाय के अधिकारों का मुद्दा जनसंपर्क विभागों के लिए भी मायने नहीं रखता जबकि कारोबारी सामाजिक दायित्व कार्यक्रमों के तहत बनने वाले शौचालयों और गरीब बच्चों को मध्याह्न भोजन देने की तमाम खबरें छाई रहती हैं। चौंकाने वाली बात यह भी है कि करीब 65 फीसदी कर्मचारियों ने कहा कि उन्हें धारा 377 के समाप्त होने के बाद भी नीतियों में कोई परिवर्तन देखने को नहीं मिला। हालांकि सर्वेक्षण ने यह नहीं बताया कि जिन 35 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्होंने कुछ बदलाव दर्ज किया है, उन्होंने किस प्रकार के बदलाव कंपनियों में देखे। 
 
आखिर किस तरह के नीतिगत बदलाव की अपेक्षा की जानी चाहिए? सबसे बुनियादी है समलिंगी साथियों (अभी समलिंगी विवाह को वैधानिक मंजूरी नहीं है) और उनके बच्चों को तमाम सुविधाएं प्रदान करना। कुछ कंपनियों ने अपनी मानव संसाधन नीतियों में बदलाव किया है। उदाहरण के लिए गोदरेज समूह और इन्फोसिस ने बिना लिंग का उल्लेख किए 'साथी' को ये सुविधाएं देने की व्यवस्था की है। ओयो समूह की बीमा नीति में भी 'अन्य' को शामिल किया गया है। समस्या का एक बड़ा हिस्सा यह है कि देश के बैंकिंग और बीमा उद्योग की नीतियों में अभी ऐसे बदलाव बाकी हैं जिनकी मदद से खाताधारक ऐसे लोगों को लाथार्थी बना सकें जो उनके रिश्तेदार न हों। बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस समस्या से निजात पाने के लिए विदेशी सेवा प्रदाताओं से बीमा कराती हैं। उनके पास ऐसी पेशकश रहती है। परंतु उनके यहां भारतीय कामगार तबके का बहुत छोटा हिस्सा काम करता है। ऐसी पहल देश के कारोबारी जगत के समलैंगिकता विरोधी माहौल में बहुत मामूली हैं। आश्चर्य नहीं कि 54 फीसदी लोगों ने कहा कि उनकी कंपनी कभी एलजीबीटीक्यू समुदाय के किसी सदस्य को काम पर नहीं रखेगी। 
 
सर्वेक्षण में कॉर्पोरेट जगत में दिव्यांग पेशेवरों और महिलाओं को काम पर रखने की स्थिति को लेकर और निराश करने वाली सूचनाएं हैं। इनमें से तमाम बातें इतनी स्पष्ट हैं कि अब लोग इन पर टिप्पणियां भी नहीं करते। निजी क्षेत्र के प्रवर्तक निहायत सांप्रदायिक भी हैं। सच्चर समिति की रिपोर्ट अरसा पहले इस बात को रेखांकित कर चुकी है। परंतु देश के कारोबारी जगत के अधिकांश हिस्से में व्याप्त संस्कृति के बारे में एक निष्कर्ष दिलचस्प दृष्टि डालता है। करीब 40 फीसदी लोगों ने कहा कि कार्यस्थल पर किसी के बारे में राय बनाने में शारीरिक प्रस्तुतिकरण, जातीयता और व्यक्तिगत पसंद और प्राथमिकता की अहम भूमिका है। यह मानव स्वभाव है लेकिन प्रतिस्पर्धी माहौल में काम कर रहे प्रबंधन को क्षमता और प्रतिभा को भी कुछ तवज्जो देनी चाहिए। जो लोग इस बात पर आश्चर्य करते हैं कि आखिर क्यों 21वीं सदी में देश के कारोबारी समूहों की कार्य संस्कृति पर 20वीं सदी की छाप है, उन्हें ऐसे निष्कर्षों से मदद मिल सकती है। 
Keyword: LGBTQ, office, company, RCEP,,
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