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भाजपा का घटता आधार मगर हिंदुत्व का प्रसार

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  December 01, 2019

आप सब ने गिलास के आधा भरा या आधा खाली होने का किस्सा तो सुना ही होगा। इंडिया टुडे समूह के उस बहुचर्चित ग्राफिक को भी इस तरह देखा जा सकता है जिसमें 2017 से अब तक देश के राजनीतिक मानचित्र पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के तुलनात्मक विस्तार को दर्शाया गया है। पहली नजर में ग्राफिक बताता है कि इन दो वर्षों में देश के राज्यों पर भाजपा का शासन 71 फीसदी से घटकर 40 फीसदी रह गया। ऐसा तब है जब आपको लग रहा होगा कि पार्टी की लोकप्रियता चरम पर है और मोदी के अधीन उसका वर्चस्व बेहद मजबूत है।

 
यह गिलास के आधा खाली होने वाला तर्क है। आधे भरे गिलास वाली दलील कहती है कि गत मई के लोकसभा चुनाव के नतीजों पर नजर डालिए। राजनीतिक हकीकत साफ नजर आती है। समूचे उत्तर भारत, अधिकांश तटीय इलाकों तथा पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में भाजपा के सामने कोई चुनौती नहीं है। अगर दोबारा आम चुनाव हों तो भी नतीजे मई 2019 से अलग नहीं होंगे। तो मोदी के आलोचक किस बात का जश्न मना रहे हैं?
 
राजनीतिक हकीकत जटिल और बहुस्तरीय है और भगवा रंग की कई छवियां दिखाती है। आइए इन परतों को उघाड़ते हैं:
 
मोदी का व्यक्तित्व अपने आप में बहुत बड़ा है लेकिन इंदिरा गांधी जैसा नहीं है। दूसरी तरह देखें तो देश का मतदाता इंदिरा युग से अधिक परिपक्व है। वह लोकसभा और विधानसभा के लिए अलग-अलग चयन करता है। ऐसे में इंदिरा की तरह मोदी भी चाहें तो अपनी पार्टी के टिकट पर एक खंभे तक को चुनाव जिता सकते हैं लेकिन केवल लोकसभा में। इंदिरा की तरह वह इस जादू को विधानसभा में नहीं दोहरा सकते। महाराष्ट्र का मामला थोड़ा जटिल है। हरियाणा के बारे में सोचिए। लोकसभा चुनाव के पांच महीने के भीतर हरियाणा में पार्टी का मत प्रतिशत करीब 22 फीसदी गिरा और 58 फीसदी से घटकर 36 फीसदी रह गया। तमाम दावों के बावजूद पार्टी को बहुमत तक नहीं मिल सका। जबकि हरियाणा में गहरी सैन्य और राष्ट्रवादी परंपरा है। यहां अल्पसंख्यक समुदाय के वोट सीमित हैं और चुनाव अनुच्छेद 370 हटने के 11 सप्ताह के भीतर हुए थे।
 
इससे पीछे जाएं तो 2014 में पूरा सफाया करने के बाद भी मोदी 2017 के अलावा उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और असम में वैसी जीत नहीं पा सके। 2015 में दिल्ली और उसके बाद पंजाब में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। गुजरात में मामला एकदम करीबी रहा। कर्नाटक में कांग्रेस के खिलाफ सत्ताविरोधी माहौल तथा बेल्लारी बंधुओं के साथ शर्मनाक समझौते के बावजूद भाजपा को बहुमत नहीं मिला। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। पंजाब के अलावा जिन राज्यों में भाजपा हारी या निर्णायक जीत पाने में नाकाम रही, उन सभी में उसे लोकसभा चुनाव में जबरदस्त जीत मिली। यहां तक कि दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी उसे शानदार जीत मिली।
 
सबसे अहम, इंदिरा युग में जहां एक दल के दबदबे को स्वीकार कर लिया गया था, उसकेउलट देश अब अधिक संघीय व्यवस्था वाला हो गया है। यदि मतदाता लोकसभा और विधानसभा के लिए अपने चयन में अंतर करता है तो भले ही मतदाता भाजपा के विरोधी न हों लेकिन इससे नवीन पटनायक, के चंद्रशेखर राव, वाई एस जगनमोहन रेड्डी जैसे नेताओं का साहस बढ़ता है जो भाजपा के बड़े शत्रु नहीं हैं। यह केजरीवाल और ममता बनर्जी जैसे भाजपा के शत्रुओं को भी सुकून देता है। लोकसभा चुनाव में संघर्ष के छह महीने बाद तीन उपुचनावों में ममता बनर्जी को जीत मिली है। दो सीटों पर तो बहुत भारी अंतर से। तीसरी श्रेणी के जो क्षेत्रीय नेता इससे प्रसन्न होंगे वे भाजपा के साझेदार हैं। इनमें नीतीश कुमार शीर्ष पर हैं। बिहार में अगले साल चुनाव होने हैं। इस श्रेणी में प्रफुल्ल कुमार महंत असम में और दुष्यंत चौटाला हरियाणा में आकांक्षा पाल सकते हैं।
 
सर्वेक्षण भाजपा के अधीन 17 राज्य बता रहा है जो आधा सच है। इनमें से कुछ मसलन बिहार और हरियाणा में उसकी साझेदारी ऐसे दलों से है जिनसे उसकी वैचारिकी बिल्कुल नहीं मिलती। मेघालय, नगालैंड और मणिपुर को अभी भी भाजपा की पहुंच वाले राज्य नहीं माना जा सकता। सिक्किम और मिजोरम राजग के हिस्से हैं लेकिन भाजपा के नहीं। एक अनकहा सच यह है कि भाजपा के पास केवल तीन बड़े राज्य हैं: उत्तर प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक। कर्नाटक की स्थिति से सभी वाकिफ हैं।
 
मोदी-शाह के उदय के बाद भाजपा ने एक ही फॉर्मूला अपनाया है। हिंदी प्रदेशों और दो बड़े पश्चिमी प्रदेशों में जीत के साथ देश पर राज। क्योंकि यहां वहां कुछ छोटी मोटी सफलताओं के साथ ऐसा आसानी से हो सकता था। अगर इसे राज्यों में नहीं दोहराया जा सकता तो आपका मुकाबला संघवाद से है। यानी आपको मुख्यमंत्रियों से बातचीत करनी होगी, कुछ लेनदेन पर सहमति देनी होगी और इस हकीकत के साथ जीना होगा कि विरोधी दलों के शासन वाले राज्यों में पुलिस और कानून व्यवस्था पर उनका राज होगा। हो सकता है कुछ राज्य आयुष्मान भारत जैसी आपकी अच्छी और बड़ी योजना तक को लागू करने से मना कर दे। उनको आदेशित नहीं किया जा सकता है। कई बार उनसे समानता का व्यवहार करना होता है। इसके लिए तौर तरीकों में बदलाव जरूरी है। प्रधानमंत्री अक्सर जिस सहकारी संघवाद की बात करते हैं वह केवल मंत्र नहीं बल्कि आवश्यकता है।
 
महाराष्ट्र पर नजर डालें। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) और कांग्रेस ने शिवेसना का साथ इसलिए दिया क्योंकि दोनों दल अस्तित्व और सत्ता की लड़ाई लड़ रहे थे। परंतु शिवसेना क्यों अलग हुई? इसलिए क्योंकि उसे लग रहा था कि प्रांत में भाजपा के विस्तार के साथ उसकी वैचारिक जमीन खतरे में है। शिवसेना की बगावत सीधे-सीधे एक दलकेदबदबे से बचाव का उसका तरीका है।
 
केंद्र-राज्य संबंध सन 1989 से 2014 के बीच के 25 वर्ष वाले दौर में लौट सकते हैं। महाराष्ट्र से आ रही आवाजों को सुनिए: बुलेट ट्रेन का विरोध, मेट्रो के खिलाफ धमकियां। आंध्र प्रदेश ने अमरावती योजना रद्द कर और सिंगापुर से लेकर खाड़ी के लूलू समूह तक विदेशी साझेदारों को बाहर करके देश की एफडीआई के अनुकूल होने की छवि पर सवालिया निशान छोड़ दिए हैं। प्रधानमंत्री को इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भी गले लगाना होगा जैसे वह विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को लगाते हैं।
 
इन सबसे बड़ा मुद्दा है राष्ट्रीय नागरिक पंजी यानी एनआरसी। ममता बनर्जी भले ही इसे खारिज करने वाली पहली नेता हों लेकिन संभावना यही है कि अधिकांश गैर भाजपा शासित राज्य इस विभाजनकारी, खतरनाक और अपने प्रतिकूल विचार को अस्वीकार करेंगे। पूर्वोत्तर के छोटे राज्यों को अपने जनमत से निपटना होगा जो कि नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ है। ऐसे में देखें तो एनआरसी का क्रियान्वयन करना मुश्किल ही है। यह चुनावी कारणों से सांप्रदायिक धु्रवीकरण करने वाला विचार बना रहेगा। वैसे ही जैसे तीन दशक तक राम मंदिर रहा। एनआरसी-सीएबी के मेल के रूप में इसे आगे बढ़ाना मुश्किल है।
 
आखिर में अगर आपको लग रहा है कि मैं केवल भाजपा की कमियां गिन रहा हूं तो ग्राफ को एक बार पुन: देखिए। भगवा विस्तार सिमटता दिख रहा है। यह सीमित चुनावी हकीकत है। वैचारिक तस्वीर को देखिए तो पूरे भारत में आपको ऐसा मुख्यमंत्री नहीं मिलेगा जिसने अनुच्छेद 370 हटाने और अयोध्या मामले पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की आलोचना करना तो दूर, उसका स्वागत न किया हो। बीते दशकों में भाजपा और आरएसएस के इन पसंदीदा मुद्दों ने भारतीय राजनीति का ध्रुवीकरण किया है। अब कश्मीर और राम मंदिर बल्कि समान नागरिक संहिता पर भी आम सहमति बनती दिख रही है। यहां तक कि केरल की वाम मोर्चा सरकार भी सबरीमला में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का पालन कराने का साहस न कर सकी। राहुल गांधी भी सार्वजनिक रूप से अपने जनेऊ का प्रदर्शन करते हैं, मंदिर जाते हैं और उच्च ब्राह्मण गोत्र दर्शाते हैं। भारतीय मानचित्र के राजनीतिक रंग अब भाजपा और आरएसएस के भगवा रंग में रंग चुके हैं। भाजपा न सही, आरएसएस अब अपनी जीत की घोषणा कर सकता है। हेडगेवार, गोलवलकर और सावरकर अवश्य इस पर सहमत होते।
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