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सही मिश्रण जरूरी

संपादकीय /  December 01, 2019

पेट्रोल के साथ मिलाने के लिए एथनॉल की उपलब्धता और आवश्यकता के बीच भारी अंतर को देखते हुए इसमें दो राय नहीं कि इसका उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता है। परंतु सरकार इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए जो प्रयास कर रही है वे पर्याप्त नहीं प्रतीत होते। इनमें सबसे बहसतलब है एथनॉल निर्माताओं (अधिकांशतया चीनी मिल मालिक जो इसे राब से बनाते हैं) द्वारा गन्ने के रस को सीधे अल्कोहल में बदलना। इसके अलावा वे अधिशेष चीनी और खाद्यान्न मसलन गेहूं, चावल और मक्के को भी इसके लिए प्रयोग में लाते हैं। इतना ही नहीं सरकार ने इन कच्चे मालों के प्रयोग को बढ़ावा देने वाले कदम के रूप में इनसे बनने वाले एथनॉल की अपेक्षाकृत ऊंची कीमत तय की है।

 
ऐसे में किसान गन्ने की खेती और चीनी मिलें गन्ने की खरीद, चीनी बनाने के बजाय इस जैव ईंधन के लिए करेंगी। चूंकि गन्ना, गेहूं और चावल के उत्पादन में खूब पानी लगता है इसलिए कहा जा सकता है कि जैव ईंधन उत्पादन में इनका इस्तेमाल पर्यावरण के लिए किसी त्रासदी को आमंत्रण देने के समान है। इनके उत्पादन में लगने वाले पानी की लागत को केवल आर्थिक संदर्भ में नहीं आंका जा सकता। इसकी सामाजिक कीमत, पेट्रोल में एथनॉल मिलाने से होने वाली आर्थिक बचत से कहीं अधिक हो सकती है। 
 
इतना ही नहीं भारत जैसे देश में जहां बुनियादी ढांचे, उद्योग धंधों और अन्य उद्देश्यों के लिए भी जमीन मुश्किल से मिलती है वहां जैव ईंधन फसल के उत्पादन में इसका इस्तेमाल समझदारी भरा नहीं होगा। जहां तक खाद्यान्न की बात है, फिलहाल ऐसा लग सकता है कि अधिशेष अन्न को आसानी से जैव ईंधन बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन देश में व्याप्त कुपोषण और भूख को देखते हुए इसे उचित ठहराना मुश्किल होगा। हकीकत में कई भूसंपदा समृद्ध और औद्योगिक देश, जो गैसोलीन में फसल से बनने वाला जैव ईंधन मिलाते हैं, वे भी अपनी नीतियों की समीक्षा कर रहे हैं। अध्ययन बताते हैं कि इससे फसल बुआई के तरीके बदल गए हैं और खाद्यान्न कीमतें बढ़ी हैं। जैव ईंधन वाली फसल उगाने के लिए वनों की कटाई की सलाह को भी पर्यावरणविद चुनौती दे रहे हैं। गौरतलब है कि ब्राजील तथा कुछ अन्य देश ऐसा कर रहे हैं।
 
एक अन्य बात जिस पर ध्यान देना जरूरी है वह यह कि भारत में गन्ने तथा खाद्यान्न से इतर तरीकों से भी एथनॉल तैयार करने की काफी संभावना मौजूद है जिसका पूरा दोहन होना अभी बाकी है। वर्ष 2009 की राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति जिसे 2018 में संशोधित किया गया, वहां ग्रामीण और शहरी कचरे, सेलूलोसी और लिंगो सेलुलोसी बायोमास (कृषि के शुष्क पदार्थ) तथा गेहूं और धान के अवशेषों से एथनॉल का कच्चा माल तैयार किया जा सकता है। हालांकि ऐसा एथनॉल राब से बनने वाले एल्कोहल की तुलना में थोड़ा महंगा हो सकता है लेकिन फसल अवशेष जलाने के कारण होने वाले पर्यावरण नुकसान को रोककर यह भरपाई भी कर देता है। अच्छी बात यह है कि तेल विपणन कंपनियों ने इस विचार का समर्थन किया है और 11 राज्यों में ऐसी एथनॉल रिफाइनरी लगाने का काम चल रहा है। इस पर आगे और जोर देने की आवश्यकता है। गैर खाद्य और तेजी से विकसित होने वाले शैवालों की मदद से एथनॉल बनाने की दिशा में शोध ने सकारात्मक परिणाम दिए हैं। ऐसी नवाचारी तकनीक की मदद से पर्यावरण के अनुकूल जैव ईंधन की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकती है। ऐसा करने से पर्यावास अथवा खाद्य सुरक्षा पर कोई बुरा असर भी नहीं होगा।
Keyword: sugar, farmer, mills, ethanol fuel,
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