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नियमों के बेहतर क्रियान्वयन में है समाधान

श्रीमी चौधरी /  December 01, 2019

कार्वी स्टॉक ब्रोकिंग (केबीएसएल) मामले में भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के निवारक आदेश से ब्रोकरों द्वारा फायदा उठाए जाने वाली खामियां उजागर हुई हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि मौजूदा नियमों को केवल सख्त बनाए जाने से उसका कारगर समाधान नहीं होगा। उनका मानना है कि कारगर समाधान के लिए मौजूदा नियमों का उचित क्रियान्वयन और बाजार के बिचौलियों जैसे स्टॉक एक्सचेंज एवं ब्रोकरेज पर नजर रखने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले क्लीयरिंग सदस्यों के बीच बेहतर तालमेल होने की जरूरत है। कार्वी प्रकरण ब्रोकरों द्वारा निवेशकों के धन को हड़पने की अपने प्रकार की पहली घटना नहीं है। यह करीब डेढ़ दशक पुराना मामला है जो स्टॉकब्रोकरों की निगरानी के अभाव के कारण लगातार उभर रहा है। ऐसा विशेषकर ग्राहकों से रकम हासिल करने के मामलों में दिखता है।

 
स्टॉकब्रोकरों की निगरानी बढ़ाने के लिए सेबी ने सितंबर 2016 में प्रोपराइटरी खाते के इस्तेमाल पर लगाम लगाने के लिए एक नियम जारी किया था और ब्रोकरेज को निर्देश दिया था कि वे प्रोपराइटरी खाते को ग्राहक खातों से अलग करें। सेबी ने कहा था कि दो तरह के खातों के बीच रकम के हस्तांतरण की अनुमति केवल विशेष परिस्थिति में ही होगी। उसने स्टॉक एक्सचेंजों को भी ब्रोकरों पर निगरानी रखने का निर्देश दिया था। साथ ही यह भी कहा था कि यदि ब्रोकर द्वारा तैयार आंतरिक अंकेक्षण रिपोर्ट में अधिक अंतर दिखता हो तो आंतरिक अंकेक्षक को नए सिरे से नियुक्त करने पर गौर करना चाहिए।
 
लेकिन इन सब उपायों के बावजूद कई मामलों में देखा गया है कि ब्रोकर लगातार संबंधित पक्ष के लेनदेन करते रहे हैं क्योंकि यह प्रोपराइटरी ट्रेडिंग के दायरे में नहीं आता है। साथ ही यह भी देखा गया है कि ब्रोकरों ने किसी प्रकार प्रोपराइटरी ट्रेडिंग को गलत तरीके से प्रस्तुत करने में सफल रहे। पिछले कुछ वर्षों के दौरान फेयरवेल्थ, बीआरएच वेल्थ क्रिएटर्स, गिनीज, कासा फिनवेस्ट, फिकस सिक्योरिटीज जैसे मामलों में देखा गया है कि ब्रोकरों के डिफॉल्ट के कारण निवेशकों और ग्राहकों को कैसे भारी नुकसान उठाना पड़ा। सेबी ने इस स्थिति से निपटने के लिए स्टॉक एक्सचेंज, डिपॉजिटरी और क्लीयरिंग कॉरपोरेशन को एक ढांचा तैयार करने के लिए कहा है ताकि ग्राहकों के धन को ब्रोकरों के खुद के उद्यमों से सुरक्षित रखा जा सके। इस प्रकार के मामलों को ध्यान में रखते हुए बाजार नियामक ने जून में नियमों को और सख्त बनाया था ताकि ब्रोकरों को रकम जुटाने के लिए ग्राहकों के शेयरों को गिरवी रखने से रोका जा सके। इसका उद्देश्य ग्राहकों के पावर ऑफ अटॉर्नी के इस्तेमाल से उनकी रकम को हड़पने की रोकथाम की जा सके। बाजार नियामक ने ग्राहकों के प्रतिभूति खातों को बंद करने के लिए समयसीमा 31 अगस्त निर्धारित की थी लेकिन बाद में उसे 30 सितंबर तक बढ़ा दिया गया था। 
 
प्रॉक्सी सलाहकार फर्म आईआईएएस के संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक (कंपनी प्रशासन) अमित टंडन ने कहा, 'सेबी की इस कार्रवाई से उस समुदाय को एक मजबूत संदेश गया है जो ग्राहकों की प्रतिभूतियों के उपयोग में नियमों की खामियों का फायदा उठा रहे थे। बड़े ब्रोकर सहित तमाम ब्रोकर लंबे समय से बिना किसी अधिकार के ग्राहकों की गिरवी का इस्तेमाल करते रहे हैं। मैं समझता हूं कि निवेशकों की रकम के दुरुपयोग को रोकने के लिए यह एक सही पहल है।' हालांकि कार्वी ने फिलहाल डिफॉल्ट नहीं किया है और उसके प्रबंधन ने बैंकों को आश्वस्त किया है कि समूह के पास पर्याप्त रकम उपलब्ध है। लेकिन लेनदार कोई जोखिम नहीं लेना चाहते हैं क्योंकि कार्वी समूह की कंपनियों में उनका 2,900 करोड़ रुपये का बड़ा निवेश है। प्रतिभूति एवं अपील ट्रिब्यूनल ने शुक्रवार को सेबी को कार्वी की दलील सुनने और ग्राहकों के पावर ऑफ अटॉर्नी के इस्तेमाल पर राहत देने के लिए उसकी याचिका पर गौर करने के लिए कहा था क्योंकि इससे मौजूदा निवेशकों को भारी नुकसान हुआ है। लेकिन सेबी ने अपने अदेश में कोई बदलाव करने से इनकार कर दिया। 
Keyword: Karvy Corporate, SEBI, KBSL,,
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