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वेतन का एक हिस्सा लेकर प्रशिक्षण देने वाली स्टार्टअप का चलन

टी ई नरसिम्हन /  December 01, 2019

माना कि आप कोई कोर्स करना चाहते हैं, लेकिन आपके पास फीस के लिए पर्याप्त धनराशि नहीं है। ऐसे में कोई कंपनी न केवल फीस भरने बल्कि अच्छे वेतन की नौकरी लगवाने की भी गारंटी देती है।  यह कंपनी आपके वेतन में से फीस की उस राशि की कटौती करती है और मामूली ब्याज वसूलती है। दरअसल अब ऐसा भारत में हो रहा है। ऐसी कंपनियों को लेकर ग्राहकों और निवेशकों की रुचि बढ़ रही है। इसे आय साझा समझौता (आईएसए) शिक्षा मॉडल नाम दिया गया है। छात्र नौकरी मिलने तक उच्च शिक्षा की फीस को वापस लौटाने को टाल सकते हैं। यह मॉडल अमेरिका और यूरोप के कुछ हिस्सों में लोकप्रिय है। भारत में भी इस क्षेत्र में करीब आधा दर्जन स्टार्टअप मौजूद हैं, जो अभी केवल पेशेवरों को नए कौशल मुहैया कराने पर ध्यान दे रही हैं। स्कूल ऑफ एक्सीलरेटेड लर्निंग (एसओएएल) के सह-संस्थापक प्रतीक अग्रवाल ने कहा, 'आईएसए कॉलेज डिग्री की फीस भरने के सबसे उत्साहजनक नवोन्मेष के रूप में उभरा है।'

 
कैसे करता है काम 
 
इस अनुबंध के तहत छात्र को विद्यार्थी ऋण लेने के बजाय अपने भविष्य की आय का एक हिस्सा कुछ वर्षों तक चुकाना होता है। ये स्टार्टअप फ्रेशर और इंजीनियरिंग स्नातकों को नए कौशल देने के लिए फीस का भुगतान करती हैं। इस साल अनुमान लगाया गया था कि भारत में कॉलेज शिक्षा के बाद कौशल मुहैया कराने का बाजार 37 करोड़ डॉलर (26,300 करोड़ रुपये) और कॉलेज के बाद तकनीकी कौशल का बाजार 18 करोड़ डॉलर का है। यह बाजार हर साल करीब 50 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। हर साल करीब 90 लाख छात्र कॉलेजों से स्नातक की डिग्री हासिल करते हैं, लेकिन 85 फीसदी को अच्छी और व्हाइट कॉलर नौकरी नहीं मिल पाती है। आंकड़े दर्शाते हैं कि प्रतिष्ठित तकनीकी कंपनियां सभी बीई/बीटेक स्नातकों में से आधे छात्रों और 60 फीसदी एमबीए डिग्रीधारियों को भर्ती करने योग्य नहीं मानती हैं। 
 
एटेनयू के सह-संस्थापक और मुख्य कार्याधिकारी दिव्यम गोयल ने कहा, ' आईएसए मॉडल अच्छी शिक्षा प्राप्त करने में मददगार है। हमारे 80 फीसदी छात्र अपने परिवारों पर निर्भर हैं और परिवार की आय सालाना 5 लाख रुपये से कम है।' गोयल का दावा है कि उनके पास सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग के पांच बैचों में 500 से अधिक छात्र नामांकित हैं। सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग में छात्रों को फुल स्टैक वेब डेवलपमेंट की शिक्षा मुहैया कराने पर जोर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि पहला बैच स्नातक होने जा रहा है और उनमें से 40 फीसदी को प्री-प्लेसमेंट ऑफर मिल चुके हैं। 
 
वित्तीय तकनीक के अवसरों में बढ़ोतरी हो रही है, इसलिए यह खंड बढऩे और इसमें निवेशकों की रुचि बढऩे की संभावना है। वित्तीय तकनीक कंपनियां और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां आईएसए के साथ गठजोड़ कर रही हैं। पेस्टो टेक का कहना है कि वह यह भरोसा देती है कि अगर वह छात्र को कम से कम सालाना 15 लाख रुपये की नौकरी नहीं दिला पाई तो इसका मतलब है कि उसका प्रशिक्षण कार्यक्रम अच्छा नहीं था और छात्र को उसके लिए भुगतान करने की जरूरत नहीं है। यह कंपनी सॉफ्टवेयर इंजीनियरों के प्रशिक्षण पर ध्यान दे रही है ताकि वे अंतरराष्ट्रीय तकनीकी कंपनियों में नौकरी हासिल कर सकें। इसके कार्यक्रमों में छात्र को तीन साल के लिए 17 फीसदी वेतन साझा करना पड़ता है। इंटरव्यूबिट एक अलग मॉडल पर काम करती है। इसके पूर्व भुगतान मॉडल में छात्र को छह महीने के कोर्स के लिए 2 लाख रुपये का अग्रिम भुगतान करना पड़ता है, जिसमें नौकरी की गारंटी दी जाती है। एक बाद में भुगतान का मॉडल भी है। इसमें अगर छात्र को सीटीसी (कोस्ट टू कंपनी) की न्यूनतम गारंटी से अधिक वेतन की नौकरी मिलती है तो उसे अपने मूल वेतन का 17 फीसदी भुगतान करना पड़ता है। कंपनी की वेबसाइट पर कहा गया है कि छात्र को अधिकतम 3 लाख रुपये का भुगतान करना पड़ता है। नोवा सेमिता का कहना है कि इसी तरह निवेशको को फायदा तब होता है, जब उनकी स्टार्टअप का आकार बढ़ता है। आईएसए स्टार्टअप को तब फायदा मिलता है, जब छात्रों का करियर बढ़ता है। कंपनी ने कहा, 'हम आपके लिए संसाधनों में निवेश करते हैं और जोखिम खुद पर लेते हैं। इसके बदले हम आपको सालाना वेतन पांच लाख रुपये से अधिक मिलने पर आपकी आमदनी का 12 फीसदी तीन साल तक लेते हैं। अगर हम आपको इतने वेतन की नौकरी नहीं दिला पाते हैं तो आपको हमें कुछ नहीं देने की जरूरत है।'
 
निवेशकों को कैसे होता है फायदा
 
वेंचर इंटेलिजेंस के आंकड़ों से पता चलता है कि अप्रैल से एसओएएल, पेस्टो, इंटरव्यू बिट एकेडमी और मसाई स्कूल ने मैट्रिक्स पार्टनर्स, सिकोया कैपिटल, एस्ट्रैक वेंचर्स, इंडिया क्वोशंट और अन्य से 40 लाख डॉलर से अधिक जुटाए हैं। ऐंजल निवेशकों में गूगल इंडिया के पूर्व प्रबंध निदेशक शैलेश राव, इनटूइट इंडिया के पूर्व प्रमुख निखिल रूंगटा, स्नैपमिंट के संस्थापक अनिल गेलरा और क्रेडएक्स और लेट्स वेंचर्स के संस्थापक मनीष कुमार शामिल हैं। एसओएएल के अग्रवाल का कहना है कि आईएसए मॉडल भारत में अभी शुरुआती अवस्था में है, लेकिन इसमें भारी संभावनाएं हैं। ऐसी बहुत सी युवा आबादी है, जो अध्ययन जारी रखकर अपने कौशल को लगातार बेहतर बनाती रहती है। लेकिन उसके लिए पैसे की कमी अड़चन बनती है। निखिल रूंगटा ने कहा, 'हर साल उत्तीर्ण होने वाले 60 फीसदी इंजीनियरिंग छात्र या तो बेरोजगार रहते हैं या अन्य अपने क्षेत्र से इतर कोई काम करते हैं। अगर हम इंजीनियरिंग के अलावा अन्य क्षेत्रों पर विचार करते हैं तो यह समस्या 10 गुना बढ़ जाती है।'
 
अग्रवाल और गोयल का कहना है कि उनकी चुनौतियों मे फीस लौटाना सुनिश्चित करना है। एक चुनौती यह भी है कि कानूनी विवाद पैदा होने से यह कारोबार पटरी से उतर सकता है। इसके अलावा अधिक संख्या में अच्छी नौकरियां दिलाना भी स्टार्टअप की जिम्मेदारी बन जाता है क्योंकि ऐसा होने पर उसके द्वारा खर्च की गई धनराशि वापस आएगी। इस कारोबार में भरोसा बहुत महत्त्वपूर्ण है और इसे सफल बनाने के लिए गुणवत्ता आवश्यक है। अटेनयू का कहना है कि वह कड़ी मूल्यांकन प्रक्रिया को अपनाती है और अपने 30 सप्ताह के कोर्स के लिए आने वाले कुल आवेदनों में से महज 1.4 फीसदी को चुनती है। एसओएएल ने अब तक आए 1,100 आवेदनों में से केवल 10 फीसदी को नामांकित किया है। अग्रवाल ने कहा, 'यह ऐसी असीमित फीस नहीं है, जो छात्र को चुकानी होती है। लोग 4-7 लाख रुपये में से विभिन्न राशियों की सीमा तय करते हैं।'
 
ये कंपनियां विभिन्न राजस्व मॉडलों को अपनाती हैं। कुछ एक से अधिक मॉडलों पर प्रयोग कर रही हैं। उन्होंने कहा, 'आईएसए के जरिये संस्थान मेधावी छात्रों को प्रवेश दे पाते हैं, अन्यथा जिनके लिए कोर्स की फीस का भार वहन करना मुमकिन नहीं है। इस ऋण ढांचे में संस्थान शामिल हैं और अच्छी प्लेसमेंट का वादा करता है... इससे सुरक्षा की एक अन्य परत तैयार हो जाती है।'
Keyword: company, startup, education, job,,
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