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स्टार्टअप की अब अंतरिक्ष में उड़ान

टी ई नरसिम्हन /  December 01, 2019

भले ही उनका आकार छोटा है और उनके पास भरपूर नकदी नहीं है, लेकिन फिर भी भारत के अंतरिक्ष उद्योग में उत्साही उद्यमियों की कमी नहीं है। अंतरिक्ष उद्यमियों का मानना है कि इस क्षेत्र में संभावनाएं अपार हैं। उपग्रह सलाहकार यूरोकंसल्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक केवल छोटे उपग्रहों को प्रक्षेपित करने का बाजार ही वर्ष 2027 तक 69 अरब डॉलर का होने का अनुमान है। अगले आठ वर्षों के दौरान दुनियाभर में 7,000 छोटे उपग्रहों का प्रक्षेपण होने का अनुमान है। अगर इसमें अंतरिक्ष बाजार के अन्य हिस्सों को भी शामिल करते हैं तो पूरा उद्योग 350 अरब डॉलर का हो जाता है। इसमें भारत की हिस्सेदारी महज दो फीसदी है। 

 
इस क्षेत्र में अपार अवसरों को देखते हुए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के बहुत से कर्मचारी आराम से वेतन मिलने का मोह त्याग रहे हैं और खुद के उपक्रम शुरू कर रहे हैं या अन्य स्टार्टअप से बतौर सलाहकार जुड़ रहे हैं। इन स्टार्टअप में से ज्यादातर उन तीन क्षेत्रों में शुरू हुए हैं, जिनमें भारतीय वैज्ञानिकों को बढ़त प्राप्त है। ये तीन क्षेत्र हैं- अंतरिक्ष से संबंधित हार्डवेयर और कलपुर्जों की डिजाइनिंग और विनिर्माण, अंतरिक्ष से प्राप्त डेटा से संबंधित सेवाएं और अंतरिक्ष से संबंधित अन्य स्टार्टअप को परामर्श देना। इन स्टार्टअप के आंकड़े ही इनकी कहानी बयां करते हैं। तीन साल पहले तक अंतरिक्ष क्षेत्र में महज 3-4 कंपनियां थीं, जिनकी तादाद आज 30 से अधिक हो गई है। 
 
विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र के पूर्व इंजीनियर और 2018 में स्काईरूट की स्थापना करने वाले पवन कुमार चांदना ने कहा, 'अंतरिक्ष के भविष्य में मेरी रुचि, मांग में बढ़ोतरी, वैश्विक अंतरिक्ष कारोबार में भारत को बढ़त और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनने के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी की जरूरत जैसी विभिन्न वजहों से मैंने नौकरी छोड़ी और खुद का उद्यम शुरू किया।' स्काईरूट एयरोस्पेस के पास 35 लोगों की टीम है। इनमें से ज्यादातर रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन और इसरो के पूर्व कर्मचारी हैं। यह टीम छोटे उपग्रहों के लिए लॉन्च व्हीकल विकसित कर रही है। ये लॉन्च व्हीकल 200 से 720 किलोग्राम पेलोड क्षमता के हैं। ये लॉन्च व्हीकल उपग्रहों को किफायती लागत में पहुंचाने की पेशकश करते हैं। सैटश्योर के सह-संस्थापक और मुख्य कार्याधिकारी प्रदीप बसु ने कहा कि इसरो के कर्मचारियों के यह कंपनी बनाने से इसे साफ तौर पर फायदा मिला है। उन्होंने कहा कि सबसे अहम बात यह है कि टीम को उद्योग के बारे में सभी जानकारियां हैं। सैटश्योर 2016 में शुरू हुई थी और आज इसके कार्यालय भारत, स्विटजरलैंड, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में हैं। 
 
यह अपने कारोबारी ग्राहकों को बेसपोक जियोस्पेटियल बिग डेटा प्लेटफॉर्म मुहैया कराती है। यह प्लेटफॉर्म उपग्रह तस्वीरों, प्रपाइइटेरी एल्गोरिद्म को मौसम, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, ड्रोन तस्वीरों, सामाजिक एवं आर्थिक आंकड़ों से जोड़ता है ताकि कृषि, बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं एवं बीमा, बुनियादी ढांचा एवं जलवायु से संबंधित तात्कालिक और विशेष भौगोलिक स्थिति की जानकारी मिल सके। उदाहरण के लिए यह 1990 के दशक के उपलब्ध उपग्रह डेटा का इस्तेमाल कर सूखे, बाढ़ या कीटों के प्रकोप जैसे जोखिमों का आकलन कर सकता है और उन्हें कम करने के लिए कदम उठा सकता है। इसमें तात्कालिक सूचनाओं और शुरुआती चेतावनी संकेतों के सृजन के लिए जियोस्पेटियल तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। जहां स्टार्टअप होती हैं, वहां निवेशक भी  आते हैं। वर्ष 2019 में ही अब तक इस क्षेत्र में 34 लाख डॉलर आ चुके हैं। ज्यादातर पैसा आईआईटी, ऐंजल निवेशकों, वेंचर कैपिटल, पीई जैसे इन्क्यूबेशन सेंटरों और धनी उद्यमियों से आया है। उदाहरण के लिए पेटीएम के विजय शेखर शर्मा ने कावा स्पेस में निवेश किया है। कावा स्पेस ऐसी स्टार्टअप है, जो वित्तीय सेवा कंपनियों, सरकारों आदि के लिए पृथ्वी पर्यवेक्षण उपग्रहों की डिजाइनिंग एवं परिचालान करती है। यह पहले के अंतरिक्ष उद्योग की प्रकृति में बड़ा बदलाव है। पहले यह उद्योग क्लस्टरों में विकसित हुआ और केवल इसरो की जरूरत को लेकर बना, जो इसरो को उसके मिशनों के लिए कलपुर्जों की आपूर्ति करता है। इसके नतीजतन उद्योग सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यमों तक ही सीमित रहा। 
 
फिक्की की अंतरिक्ष शाखा के पूर्व सलाहकार और एक अंतरिक्ष परामर्शदाता रतन श्रीवास्तव ने कहा, 'अब रॉकेटों, उपग्रहों, ऐप्लीकेशन और संबंधित जमीनी बुनियादी ढांचे की जरूरत में भारी बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में निजी उद्योग के लिए घरेलू बाजार को आपूर्ति और वैश्विक आपूर्ति शृंखला से जुडऩे के लिए उत्साहजनक समय है।' पिक्सल लैब्स के संस्थापक और सीईओ अवैस अहमद ने कहा, 'आज अंतरिक्ष उद्योग उस जगह है, जहां कंप्यूटर उद्योग 1970 के दशक में था।' पिक्सल लैब्स नैनो-उपग्रहों के लिए कॉन्सटलेशन बनाती और प्रक्षेपित करती है।  उन्होंने कहा, 'प्रक्षेपण की लागत में कमी आ रही है। अहम इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्जों का आकार छोटा होता जा रहा है और ऑफ-दी-सेल्फ उत्पादों से विनिर्माण की लागत घट रही है। यह स्टार्टअप शुरू करने के इच्छुक व्यक्ति के लिए बहुुत आकर्षक बाजार है।'
 
इस बात में कोई संदेह नहीं है कि कृषि और प्रदूषण निगरानी जैसे क्षेत्रों में अंतरिक्ष तकनीक को अपनाए जाने की भारी संभावनाएं हैं। आज बहुत सी कंपनियां अंतरिक्ष से संबंधित एवं उत्पाद खरीदना चाहती हैं। लेकिन इन स्टार्टअप में से कोई भी मजबूत स्थिति में नहीं पहुंची है। श्रीवास्तव ने कहा, 'इन स्टार्टअप में वृद्धि एवं स्थायित्व और वीसी मूल्यांकन को तर्कसंगत साबित करने के लिए लंबी अवधि की कारोबारी योजना विकसित करने को लेकर समस्याएं हैं।' इस समय मांग अन्य कारोबारों से आती है। उन्होंने कहा कि इसरो भारतीय स्टार्टअप की बहुत अधिक सेवाएं नहीं लेता है। इसलिए यह कारोबारी मॉडल उद्योग की अन्य स्टार्टअप से राजस्व सृृजित करने का है। उपग्रह स्टार्टअप को प्रक्षेपण स्टार्टअप की और प्रक्षेपण स्टार्टअप को उपग्रह स्टार्टअप की जरूरत है। उपग्रह कलपुर्जा विनिर्माताओं को उपग्रह ऑपरेटरों और उपग्रह ऑपरेटरों को उपग्रह कलपुर्जा विनिर्माताओं की जरूरत है। 
 
इस उद्योग को वर्क-शेयर मॉडल से बाहर निकलकर भरा-पूरा निर्यातक बनने के लिए पहले कुछ चीजों में बदलाव करना होगा। श्रीवास्तव ने कहा, 'हमें अंतरिक्ष बुनियादी ढांचा विकसित करने की जरूरत है। इस समय हमारे पास चालू स्पेस पोर्ट है, जहां से रॉकेट प्रक्षेपितकिए जा सकते हैं।'
Keyword: ISRO, Satellite, startup,,
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