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राजनीति में सही समय पर सही कदम की अहमियत

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  November 29, 2019

हिंदी में यह कहावत काफी मशहूर है कि 'चौबे गए छब्बे बनने, दूबे बनकर लौट आए'। यानी अपनी औकात से बढ़कर काम करने वाले शख्स की हालत पहले से भी बुरी हो जाती है। जहां तक महाराष्ट्र प्रकरण का सवाल है तो इसमें कई विजेता हैं जिनमें से कुछ लोगों को इतना मिल गया है जिसके बारे में उन्होंने शायद ही सोचा हो या उसकी चाहत रखी हो। लेकिन सबसे ज्यादा चिंता करने की जरूरत इस खेल में हारने वालों को है। नारायण राणे एक निष्ठावान शिवसैनिक हुआ करते थे जिन्हें खुद बाल ठाकरे ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की कुर्सी पर बिठाया था। वह 'साहेब' की इज्जत करते थे लेकिन पार्टी के भीतर उद्धव ठाकरे के उदय को बर्दाश्त नहीं कर पाए। राणे ने कोंकण क्षेत्र में शिवसेना को खड़ा करने और उसे मजबूती देने में अहम भूमिका निभाई थी। जब उद्धव को शिवसेना का कार्यकारी अध्यक्ष नामित किया गया तो राणे काफी दुखी हो गए और वर्ष 2005 में पार्टी छोड़ दी। उनकी विदाई इतनी कड़वी कि बालासाहेब से आखिरी बार मिलने की इच्छा होते हुए भी वह मातोश्री जाने का साहस नहीं जुटा सके। उन्हें आशंका थी कि ठाकरे परिवार के बाकी सदस्य न जाने कैसा बरताव करेंगे। ऐसे में राणे ने शिवसेना से अलग होने के छह महीने बाद कांग्रेस की सदस्यता ले ली और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) की पेशकश ठुकरा दी। उस समय उन्होंने शपथ ली थी कि वह 'अपनी बाकी जिंदगी कांग्रेस के आदर्शों एवं तिरंगे का सम्मान अक्षुण्ण रखने में लगाएंगे।'

 
 राणे के कांग्रेस से जुडऩे की शर्त यह थी कि उन्हें छह महीने के भीतर मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नतीजा यह हुआ कि 10 वर्षों तक किसी तरह कांग्रेस में रहने के बाद राणे ने अपनी शपथ भुला दी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से जुडऩे की देवेंद्र फडणवीस की पेशकश पर हामी भर दी। लेकिन राणे को नहीं पता था कि इसे शिवसेना इतना बड़ा मुद्दा बना देगी। शिवसेना ने भाजपा को साफ-साफ बोल दिया कि अगर फडणवीस राणे को अपनी पार्टी में शामिल कराते हैं तो वह गठबंधन सरकार से समर्थन वापस ले लगी। इस धमकी का असर यह हुआ कि फडणवीस ने फौरन अपने कदम खींच लिए। फिर राणे ने 2017 में महाराष्ट्र स्वाभिमान पक्ष नाम से अपनी एक पार्टी बना ली। वक्त बीतने के साथ फडणवीस ने भी शिवसेना के सामने खड़े होने का साहस जुटाया और एक बार फिर राणे को न्योता दे दिया। एक बार अपने हाथ जला चुके राणे ने भाजपा के साथ जुडऩा स्वीकार कर लिया और राज्यसभा के सदस्य बना दिए गए। अगर राणे ने उद्धव के नेतृत्व को उस समय स्वीकार कर लिया होता तो आज वह कहां होते?
 
इसी तरह अजित पवार भी अपने चाचा शरद पवार के मनमुताबिक चलने से उकता चुके थे। पिछले कई सालों से उनके मन में ऐसे भाव उठ रहे थे। इसमें सबसे ताजा मामला विधानसभा चुनावों के पहले का है जब अजित राकांपा की चुनावी सभाओं में पार्टी के झंडे के साथ छत्रपति शिवाजी की तस्वीर वाला भगवा झंडा भी लगाना चाह रहे थे। लेकिन शरद पवार ने सार्वजनिक तौर पर इसे खारिज करते हुए कह दिया कि यह अजित की निजी राय है। चुनावी नतीजे आने के बाद बदले हुए हालात में शरद पवार ने अजित को यह भरोसा दिया था कि उद्धव की अगुआई में बनने जा रही सरकार में उन्हें उप मुख्यमंत्री का पद मिलेगा। इसके बावजूद अजित ने यह सोचा कि वह सौदेबाजी के मामले में अपने चाचा को मात दे सकते हैं, लिहाजा वह भाजपा के पास ऐसी पेशकश लेकर गए जिसे वह नकार नहीं सकी। अजित को भाजपा के खेमे में भी उप मुख्यमंत्री पद दिया जाना था। लेकिन चंद दिनों के ही भीतर देखिए क्या हो गया। 
 
विधानसभा चुनाव के पहले राकांपा के इतने लोगों ने भाजपा से नाता जोड़ा था कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह यह व्यंग्य कर गए कि शरद पवार और कांग्रेस के पृथ्वीराज चव्हाण को छोड़कर हर कोई भाजपा में शामिल होने के लिए लाइन में खड़ा है। अब ये सारे लोग कहां हैं? कांग्रेस की मुंबई इकाई के पूर्व अध्यक्ष संजय निरुपम भी पहले शिवसेना में रह चुके हैं। निरुपम ने शिवसेना से कांग्रेस के हाथ मिलाने की चर्चा तेज होने पर हर मंच से खुलकर विरोध किया। जब फडणवीस ने सुबह-सवेरे शपथ ली तो निरुपम यह कहने से खुद को नहीं रोक पाए कि 'मैंने तो पहले ही कहा था'। लेकिन बहुत जल्द हालात बदल गए। अगर निरुपम ने उस समय शांति दिखाई होती तो वह आज महाराष्ट्र सरकार में कहीं-न-कहीं होते।
 
उनकी तरह कुछ और लोग भी हैं। राधाकृष्ण विखे पाटील को कांग्रेस ने पिछली विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाया था। लेकिन जब उनके बेटे ने भाजपा का दामन थाम लिया तो वह भी बेटे के साथ चले गए। पाटील ने भाजपा के लिए खुलकर प्रचार किया। कांग्रेस से उनके अलग होने का फायदा बालासाहेब थोरात को मिला। अहमदनगर से ताल्लुक रखने वाले थोरात के बारे में विधायक कहते हैं कि 'उनके पास किसी कछुए जैसा ही करिश्मा' है। लेकिन आज हंसी थोरात के चेहरे पर ही दिख रही है। आठवीं बार विधायक बने थोरात ने नई सरकार में मंत्री पद संभाल लिया है। 
 
अंत में उन लोगों की बात करते हैं जो सबसे अधिक चतुर निकले। इनमें सबसे ऊपर प्रियंका चतुर्वेदी हैं जो एकदम सही समय पर सही जगह मौजूद रहीं। प्रियंका ने जब कांग्रेस छोड़ी थी तब वह उसकी प्रमुख प्रवक्ता एवं चेहरा हुआ करती थीं। लेकिन वह चुनावों के ऐन पहले शिवसेना में शामिल हो गईं और इस समय वह विजेता पक्ष में हैं। कोई नहीं बता सकता है कि यह सरकार कितना टिकेगी या तीनों गठबंधन दलों के बीच भविष्य में कैसे संबंध विकसित होंगे? लेकिन यह चुनाव हमें बताता है कि भले ही वफादारी एवं निष्ठा का फल मिलता है लेकिन इसमें सही समय का होना सबसे जरूरी है। 
Keyword: maharashtra, BJP, shivsena, congress, NCP,,
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