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इस संकट को न गंवाएं

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  November 29, 2019

जुलाई-सितंबर तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि दर पिछली 26 तिमाहियों में न्यूनतम स्तर पर है। यह बात चौंकाती नहीं क्योंकि अधिकांश विश्लेषकों ने पहले ही बुरी खबर की आशंका जता दी थी। यह स्पष्ट है कि यदि सरकार अब से दो महीने बाद यानी बजट तक हालात को संभालती नहीं है तो जल्द सुधार की आशा त्यागनी होगी। अर्थव्यवस्था ऐसे मोड़ पर है जहां से यह किसी भी दिशा में जा सकती है। यह वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के परीक्षण की घड़ी है। अनेक विश्लेषकों को मोदी सरकार की बढ़ती आर्थिक दिक्कतों में परपीड़ा का आनंद आ रहा है। परंतु इससे आगे देखें तो आलोचकों को भी यह बताना होगा कि सरकार को क्या करना चाहिए? सबसे पहले तो उसे झूठा साहस त्याग कर यह प्रदर्शित करना बंद करना चाहिए कि सब कुछ नियंत्रण में है। देश की समस्याओं की प्राथमिक वजह वैश्विक मंदी नहीं है। यदि ऐसा होता चीन के आंकड़ों (जुलाई-सितंबर में 6 फीसदी की वृद्धि दर)के साथ अंतर इतना नहीं बढ़ा होता। न ही बांग्लादेश 7 फीसदी से अधिक की दर से विकसित हो रहा होता। इस बहस का भी कोई अर्थ नहीं है कि यह केवल धीमापन है या वाकई पूरी तरह मंदी आ गई है। जब चार तिमाहियों में वृद्धि दर 7 फीसदी से घटकर 4.5 फीसदी हो जाए तो यह मंदी ही है।

 
विश्लेषक हाल तक कह रहे थे कि हालात में जल्दी सुधार आ सकता है लेकिन इसकी आशा मत कीजिए। आंकड़ों की पड़ताल की जाए तो मौजूदा तिमाही के आंकड़े पिछली से कतई बेहतर नहीं हैं और पूरे वर्ष के दौरान वृद्धि दर का स्तर मोदी के सत्ता में आने के बाद से सबसे धीमा रहने वाला है। याद रहे वह दो अंकों की वृद्धि और अच्छे दिन के वादे के साथ सत्ता में आए थे। अब तक सरकार अर्थव्यवस्था का सबसे तेज बढ़ता हिस्सा रही है लेकिन राजकोषीय घाटे का पूरे वर्ष का लक्ष्य सात महीने में पार हो जाने के बाद यह जारी नहीं रहने वाला। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक लगातार निराश कर रहा है। मूलभूत क्षेत्रों के उत्पादन आंकड़ों  का भी यही हाल है। बिजली खपत कम हुई है, डीजल खपत का भी यही हाल है, व्यापारिक आंकड़े गिर रहे हैं और विनिर्माण या तो स्थिर है या गिर रहा है। खपत या औद्योगिक मोर्चे पर कोई अच्छी खबर नहीं है। 
 
हर मंदी में एक चक्रीय तत्त्व होता है और वाहन क्षेत्र की मंदी के खत्म होने में इसके कुछ प्रमाण नजर आ रहे हैं। परंतु सच तो यह है कि बैंक ऋण में सुधार का ज्यादा हिस्सा इस क्षेत्र में नहीं जा रहा। जबकि ऋण के बट्टे खाते जाने की गति बढ़ी है। गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के ऋण प्रवाह में भारी गिरावट आई है। कंपनियां अभी तक अपने बहीखाते दुरुस्त करने में ही लगी हैं। जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, नये निवेश की आशा करना बेमानी है। हमें अगले तीन-चार महीने की अवधि के दौरान इन चक्रीय कारकों के असर करने की अपेक्षा करनी होगी लेकिन इस बीच गहन ढांचागत मसलों को हल करने की आवश्यकता है। कृषि क्षेत्र में खराब उत्पादकता और अपर्याप्त घरेलू मांग की बुनियादी दिक्कत बनी हुई है। इसके लिए कुछ हद तक ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की आय का न बढऩा भी वजह है। सरकार का कर राजस्व आधार दिक्कतों से भरा है और किसी को पता नहीं कि कर क्षेत्र की दिक्कतों को कैसे दूर किया जाए। सेवा निर्यात की मजबूती की वजह से रुपया ऐसे स्तर पर है जहां विनिर्माण निर्यातक निर्यात बाजार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रहे हैं। सरकारी क्षेत्र में सुधार की बात करें तो वहां नाकाम हो रही कंपनियों के कर्मचारियों को लेकर मामला अटकता है। अंबानी से रुइया तक और थापर से सुभाष चंद्रा तक एक के बाद एक कारोबारी जिस तरह हथियार डाल रहे हैं उससे देश के नामी उद्यमियों के वृद्धि का वाहक बनने की क्षमता पर ही सवाल खड़े हो गए हैं।
 
ऐसे में सबसे अच्छी सलाह यही हो सकती है कि यह एक ऐसा संकट है जिसे गंवाया नहीं जाना चाहिए। मोदी सरकार का अब तक का व्यवहार ऐसा रहा है मानो वह आर्थिक मोर्चे पर बुरी खबरों की अनदेखी कर सकती है और अपने राजनीतिक और सामाजिक एजेंडों के साथ आगे बढ़ सकती है। आगे ऐसा जारी नहीं रह सकता। संकटकाल में सरकार लोगों से अपेक्षा कर सकती है कि वे व्यापक हित में कुछ बलिदान करें। कुछ नहीं करने का खतरा यह है कि 6 फीसदी या उससे कम की वृद्धि दर अस्वीकार्य होने के बजाय मानक बन जाती है। 
Keyword: india, economy, GDP,,
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