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'प्रसुप्त जीवंतता' से सुधरेगी आपात चिकित्सा की स्थिति

तकनीकी तंत्र
देवांग्शु दत्ता /  November 27, 2019

प्रसुप्त जीवंतता (सस्पेंडेड एनीमेशन) विज्ञान की गल्प कथाओं का पुराना रूपक है। इसके पीछे एक जिंदा शख्स का शरीर फ्रीज करने के साथ ही उसके सभी प्रमुख अंगों को अस्थायी तौर पर निष्क्रिय करने की सोच है। शरीर को एक जीवाणु-रहित परिवेश में रखा जाता है ताकि उसे यथावत रखा जाए और फिर बाद में उसमें जान फूंक दी जाती है। तमाम कहानियों में इस काल्पनिक तकनीक का इस्तेमाल लंबी दूरी की अंतरिक्ष यात्राओं और किसी लाइलाज बीमारी की चपेट में आए शख्स को उपचार मिलने तक सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है।

 
चिकित्सा शोधकर्ताओं ने इस संकल्पना पर अधिक व्यावहारिक नजरिये से देखना शुरू कर दिया है। जानलेवा चोटों के शिकार एक रोगी को आपातकालीन कक्ष में निर्जीव-प्राय स्थिति में रखा जा सकता है ताकि डॉक्टरों को उसके इलाज के लिए अधिक वक्त मिल सके। चोटिल व्यक्ति को निर्जीव-प्राय स्थिति में ले जाने के लिए एक आपातकालीन परिरक्षण एवं पुनर्जीवीकरण (ईपीआर) प्रक्रिया अपनाई जाएगी। शरीर को फ्रीज करने के असामान्य प्रभाव सदियों से ज्ञात हैं। सामान्य शरीर तापमान (37 डिग्री सेल्सियस) पर अगर हृदय से रक्तसंचार में ऑक्सीजन का प्रवाह नहीं हो रहा हो तो कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं। अगर मस्तिष्क को पांच मिनट के लिए भी ऑक्सीजन न मिले तो मस्तिष्क की अपूरणीय क्षति हो जाती है। हालांकि बर्फीले पानी में गिरने वाले लोगों को धड़कन थमने के 30 मिनट बाद भी बचाया गया है। इसकी वजह यह है कि बहुत कम तापमान होने पर कोशिका धीमी गति से काम करने लगती है और लगभग बंद हो जाती है। ऐसा होने पर शरीर को ऑक्सीजन की जरूरत भी बेहद कम हो जाती है। दिल एवं दिमाग की सर्जरी के दौरान शरीर को बेहद ठंडा करने के लिए बर्फ की पट्टियों का इस्तेमाल किया जा सकता है जबकि रक्त को ठंडा होने के लिए कृत्रिम संचरण प्रणाली के जरिये दूसरी तरफ भेज दिया जाता है। यह प्रक्रिया डॉक्टरों को जटिल सर्जरी करने के लिए अधिक वक्त दे देती है लेकिन यह एक धीमी प्रक्रिया है। 
 
अगर दिल नहीं धड़क रहा है तो फिर मरीज के पास चंद मिनट ही बचे होते हैं। बड़े पैमाने पर होने वाले रक्तस्राव के लिए भी यह बात सही है। ऐसे में ईपीआर काफी काम आ सकता है। ईपीआर की प्रेरणा वियतनाम युद्ध के दौरान किए गए अध्ययन तक जाती है। सेना के सर्जनों ने देखा कि सैनिकों की मौत का बड़ा कारण गहरी चोट लगने के बाद के शुरुआती 5-20 मिनटों में होने वाला रक्तस्राव है।  नई सदी की शुरुआत में एरिजोना यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने सूअरों पर परीक्षण शुरू किए। सूअर को गंभीर चोट पहुंचाने के बाद उसके खून की जगह ठंडा सेलाइन द्रव डाल देते थे। डॉक्टरों को यह पता चला कि जानवरों को धड़कन बंद होने के तीन घंटे बाद भी जिंदा किया जा सकता है और उनमें इलाज के बाद कोई बुरा असर भी नहीं दिखता है। 
 
अब मैरिलैंड यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ मेडिसिन ने जिंदा बचने की बहुत कम संभावना वाले रोगियों पर ईपीआर तकनीकें आजमाने की अनुमति हासिल कर ली है। कम-से-कम एक रोगी पर ईपीआर तकनीक का इस्तेमाल किया भी जा चुका है। ईपीआर प्रक्रिया में शरीर के भीतर खून को हटाकर बर्फ की मानिंद ठंडा सेलाइन द्रव पहुंचाया जाता है। शरीर के तापमान को 10 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचाने में करीब 15 मिनट लगते हैं। उस स्थिति में शरीर के भीतर खून की एक बूंद भी नहीं रह जाती है, सांस नहीं चलती है और मस्तिष्क भी काम करना बंद कर चुका होता है। नैदानिक (क्लिनिक) तौर पर मर चुके इस मरीज को फिर मशीन से अलग किया जाता है ताकि उसकी सर्जरी एवं अन्य आपात इलाज किए जा सकें। उसके बाद सेलाइन को निकालकर शरीर में दोबारा रक्त प्रवाहित कर दिया जाता है जो शरीर को फिर से गर्माहट देने लगता है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि ईपीआर प्रक्रिया से डॉक्टरों को इलाज के लिए करीब दो घंटे का समय मिल जाता है जबकि बेहद खतरनाक चोटों के मामले में यह वक्त महज कुछ मिनटों का ही होता है। यह साफ नहीं है कि मरीज को कितनी देर तक ईपीआर प्रक्रिया से गुजारा जा सकता है ताकि उसे कोई स्थायी क्षति भी न हो। इसी तरह रीबूट के मानदंड भी साफ नहीं हैं। वार्मअप होने के दौरान कोशिका के स्तर पर रासायनिक प्रतिक्रिया दोबारा शुरू हो जाती है। यह नुकसान का सबब बन सकता है। फिर से ऑक्सीजन मिलना शुरू होने पर कोशिकाओं को 'रिपफ्र्यूजन' चोट लगने का डर होता है। रिपफ्र्यूजन प्रक्रिया को पूरी तरह समझा नहीं गया है और इस क्षति को न्यूनतम करने के लिए दवाइयां भी विकसित की जा सकती हैं ताकि लंबे समय तक ईपीआर पर रखा जा सके।
 
बाल्टीमोर में होने वाले ईपीआर परीक्षणों के दौरान शुरुआत में 10 ईपीआर विषय एवं 10 नियंत्रण होंगे। दुर्घटनाओं में जानलेवा चोटों के शिकार लोगों को मैरिलैंड यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के आपात कक्ष में लाया जाएगा। कानूनी तौर पर यह अटपटा है क्योंकि गंभीर हालत में अस्पताल लाए जाने वाले मरीज ईपीआर के लिए सहमति देने में सक्षम नहीं होंगे। अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग ने इस महत्त्वपूर्ण प्रयोग के लिए सहमति की अनिवार्यता से छूट दे दी है। यह प्रक्रिया उन बेहद गंभीर चोटिल लोगों पर ही अपनाई जाएगी जिनके इलाज का कोई विकल्प नहीं रह गया है और उनके जिंदा बचने के मौके बेहद कम हैं। ईपीआर तकनीक पहले 10 लोगों पर आजमाई जाएगी और उसके नतीजों की तुलना निगरानी में रखे गए 10 मरीजों से की जाएगी। फिर तकनीक में सुधार किया जाएगा और 10 अन्य घायलों पर उसे आजमाया जाएगा। परीक्षणों का यह दौर 2020 तक जारी रहेगा। व्यावहारिक स्तर पर यह तकनीक आपातकालीन चिकित्सा में काफी कारगर हो सकती है। 
Keyword: suspended animation, science,,
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