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कर राजस्व में आनुपातिक बढ़त का कर बंटवारे पर असर

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  November 26, 2019

पिछले 28 वर्षों में 2002-2003 में देश में टैक्स बॉयंसी (सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि के मुकाबले कर राजस्व में आनुपातिक इजाफा) सर्वाधिक रही थी। उस वर्ष टैक्स बॉयंसी 2 दर्ज की गई थी। यानी केंद्र का सकल कर राजस्व महंगाई समायोजित किए बिना देश की आर्थिक वृद्धि दर या नॉमिनल जीडीपी के मुकाबले दोगुनी रफ्तार से बढ़ा था। उस समय वित्त मंत्रालय की कमान यशवंत सिन्हा के पास थी। टैक्स बॉयंसी देश की कर प्रणाली की कार्य क्षमता मापने का एक प्रमुख संकेतक है। इससे जीडीपी में आई तेजी की प्रतिक्रिया में कर संग्रह के स्तर का पता चलता है। टैक्स बॉयंसी मोटे तौर पर कर करदाताओं की संख्या, कर प्रशासन की कार्य कुशलता एवं उनके दोस्ताना रवैये और कर दरों की सरलता पर निर्भर करती है। हालांकि केवल एक वर्ष के टैक्स बॉयंसी के आधार पर कर प्रणाली की कार्य कुशलता एवं सक्षमता या आर्थिक वृद्धि के मुकाबले कर संग्रह के आंकड़े को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं माना जा सकता है। कई ऐसे कारक हैं, जो टैक्स बॉयंसी को उछाल देते हैं या इसमें कमी लाते हैं। कराधान से जुड़ी नीतियां भी टैक्स बॉयंसी रेट को प्रभावित करती हैं और इनका आकलन एक लंबी अवधि के आंकड़ों एवं रुझान को देखकर ही किया जा सकता है। 

 
उदाहरण के लिए केवल एक वर्ष ही टैक्स बॉयंसी 2 के उच्चतम स्तर पर पहुंचा था और 2001-02 में इसमें गिरावट दर्ज की गई थी। उस वर्ष देश की नॉमिनल जीडीपी दर 8 प्रतिशत से कुछ अधिक रही थी। लिहाजा, कर बॉयंसी ऋणात्मक रही और देश में आर्थिक सुधारों की कसरत के बाद केवल एक बार यह इतने निचले स्तर पर रही थी। एक रुचिकर बात यह है कि सिन्हा के कार्यकाल में ही देश में सर्वाधिक और सबसे कम टैक्स बॉयंसी दर्ज हुई थी। वित्त मंत्री के तौर पर अपने पांच वर्षों के कार्यकाल के दौरान उन्हें दो वर्षों में कमतर टैक्स बॉयंसी से जूझना पड़ा, हालांकि शेष तीन वर्षों के दौरान टैक्स बॉयंसी सराहनीय रही।  
 
इस मापदंड के आधार पर सिन्हा का प्रदर्शन एक और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम के मुकाबले थोड़ा ही कमतर माना जा सकता है। मनमोहन सरकार में चिदंबरम 2004-05 से 2008-09 तक देश के वित्त मंत्री थे। इस दौरान बतौर वित्त मंत्री उनके पहले चार वर्षों के दौरान टैक्स बॉयंसी 1.3 से 1.7 के बीच रही। यह एक अच्छा आंकड़ा माना जा सकता है। पांचवें वर्ष यानी 2008-09 में (हालांकि मुंबई में आतंकवादी हमले के बाद चिदंबरम ने दिसंबर 2008 में वित्त मंत्रालय छोड़ दिया था) टैक्स बॉयंसी में खासी कमी आई और यह कम होकर करीब 0.2 रह गई। टैक्स बॉयंसी में इतनी अधिक गिरावट के लिए वैश्विक वित्तीय संकट और अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए किए गए आर्थिक प्रोत्साहन जिम्मेदार थे। 
 
वैसे किसी वर्ष में टैक्स बॉयंसी पर उस दौरान घटित प्रतिकूल बातों का प्रभाव दिख सकता है, लेकिन अमूमन करीब पांच वर्षों की अवधि में दीर्घ अवधि के टैक्स बॉयंसी के रुझान कुछ वर्ष पूर्व नीतियों में हुए बदलाव के नतीजे होते हैं। नीतियों में बदलाव के परिणामस्वरूप टैक्स बॉयंसी पर कुछ समय बाद होने वाले असर की अनदेखी शायद ही की सकती है। लिहाजा वर्ष 1991-92 और 1997-98 के दौरान सात वर्षों में चार में टैक्स बॉयंसी औसतन 1.0 से 1.3 के बीच रही थी और शेष तीन वर्षों में यह कमजोर थी। हालांकि इन वर्षों के दौरान टैक्स बॉयंसी में तेजी लाने के लिए उठाए गए कदमों का असर बाद के दशक में स्पष्ट तौर पर दिखा। इस दौरान भी कुछ साल ऐसे रहे जब टैक्स बॉयंसी पर आर्थिक घटनाक्रम के कारण असर देखा गया। 
 
सिन्हा ने कर सुधार, खासकर अप्रत्यक्ष कर प्रणाली में, के जो उपाय किए थे उनसे चिदंबरम के कार्यकाल के दौरान टैक्स बॉयंसी में मजबूती लाने में मदद मिली। सिन्हा के बाद चिदंबरम ने वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली थी। 2009-10 और 2011-12 की चार वर्षों की अवधि में जब प्रणव मुखर्जी दोबारा वित्त मंत्रालय लौटे तो टैक्स बॉयंसी कमजोर रही और दो वर्षों में यह 1 से कम रही और शेष दो अवधि में 1 से अधिक दर्ज की गई। जब अरुण जेटली देश के वित्त मंत्री बने तो उनके पांच वर्षों के कार्यकाल में भी टैक्स बॉयंसी मजबूत रही। उनके कार्यकाल के पहले वर्ष टैक्स बॉयंसी 1 से नीचे जरूर रही, लेकिन तीन लगातार वर्षों में इसमें खासा सुधार हुआ और यह 1.0 से 1.6 के बीच रही। हालांकि अंतिम वर्ष यानी 2018-19 में यह कम होकर 0.7 रह गई। 2019-20 की पहली छमाही में जब केंद्र का सकल कर राजस्व 2018-19 की समान अवधि के मुकाबले महज 1.5 प्रतिशत दर से बढ़ा तो टैक्स बॉयंसी कम होकर करीब 0.15 रह गई। यह इस धारणा पर आधारित था कि नॉमिनल जीडीपी वृद्धि दर पहली छमाही में 10 प्रतिशत थी। 
 
टैक्स बॉयंसी में आने वाली यह गिरावट केंद्र सरकार के खजाने के लिए चिंता का विषय है। इससे राजकोषीय मजबूती लाने की सरकार की योजना खटाई में पड़ सकती है और केंद्र एवं राज्यों के बीच राजस्व साझा करने की 15वें वित्त आयोग की गणना का आधार कमजोर हो सकता है। अगर मौजूदा टैक्स बॉयंसी का इस्तेमाल अगले 15 वर्षों के दौरान राजस्व वृद्धि के आंकड़े दर्शाने के लिए होता है तो केंद्र एवं राज्य दोनों के लिए राजस्व संबंधी चुनौतियां अधिक विकट हो सकती हैं। 15वें वित्त आयोग के लिए एक यक्ष प्रश्न यह है कि वह आने वाले वर्षों में टैक्स बॉयंसी की गणना के लिए अधिक विश्वसनीय आधार पर कैसे पहुंचेगा। अगर यह त्रुटिपूर्ण आकलन करता है तो कर संग्रह की बुनियाद बेजा साबित हो सकती है, जिससे कर बंटवारे की नई विधि पर प्रतिकूल असर होगा। केंद्र एवं राज्यों के बीच कर साझा करने के लिए आवश्यक सिफारिश करने से पहले 15वें वित्त आयोग को टैक्स बॉयंसी के विश्वसनीय रुझान का आकलन करना होगा। 
Keyword: GDP, economy, growth, income tax,,
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