बिजनेस स्टैंडर्ड - फसल अवशेष जलाने की समस्या का निदान
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Sunday, December 15, 2019 04:08 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

फसल अवशेष जलाने की समस्या का निदान

रमेश चंद /  November 26, 2019

फसल अवशेष जलाने से पर्यावरण को होने वाले नुकसान से बचाने के लिए वैज्ञानिक तरीके अपनाने तथा पंजाब और हरियाणा के किसानों को धान की खेती के प्रति हतोत्साहित करना होगा। बता रहे हैं रमेश चंद

 
कई वर्षों से दिल्ली तथा पश्चिमोत्तर भारत के अनेक हिस्सों में अक्टूबर और नवंबर में भारी प्रदूषण देखने को मिल रहा है। इसके पीछे कई कारक हैं लेकिन प्रदूषण के इतने खतरनाक स्तर पर पहुंचने के लिए पड़ोसी राज्यों में धान की फसल के अवशेष जलाए जाने को वजह बताया जाता है। इस समस्या का स्थायी हल तलाशने के लिए हमें ऐसे विकल्प तलाशने होंगे जो किसानों को ऐसा करने से रोक सकें। पारंपरिक तौर पर फसल अवशेष का इस्तेमाल पालतू पशुओं के चारे या घरेलू ईंधन के रूप में किया जाता था। इसके एक हिस्से से कंपोस्ट खाद बनाई जाती थी। समय के साथ फसल अवशेष की आपूर्ति बढ़ती गई और ईंधन तथा चारे के नए विकल्प आने से इसकी मांग कम होती गई। सूखे चारे की जगह हरे चारे ने ले ली और ईंधन में एलपीजी तथा अन्य स्रोत आ गए। इस क्षेत्र में एक दिक्कत यह भी है कि गैर बासमती धान के सूखे डंठल, गेहूं के डंठल की तुलना में बेहद खराब चारा माने जाते हैं। किसानों के पास इस अवशेष को जलाने या धरती में निपटाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। यही कारण है कि देश भर में यह समस्या आम हो चली है। दिल्ली और उसके आसपास यह ज्यादा गंभीर है क्योंकि यहां हवा की गुणवत्ता पहले से खराब है।
 
पंजाब और हरियाणा के किसानों का गेहूं के फसल अवशेष जलाना आम है। लेकिन उसका नुकसान इतना अधिक महसूस नहीं होता है क्योंकि गर्मियों के दिन में तेज हवाएं धुएं को जल्दी ही फैला देती हैं। परंतु एक एकड़ भूभाग की गेहूं उपज के अवशेष जलाने का भी पर्यावरण को उतना ही नुकसान होता है जितना कि एक एकड़ धान से। दुख की बात है कि इस तरफ बढ़ते रुझान को गंभीरता से नहीं लिया गया। यदि प्रभावी उपाय नहीं अपनाए गए तो आने वाले वर्षों में इसके गंभीर परिणाम होंगे।
 
धान की खेती की बात करें तो अभी कुछ वर्ष पहले तक इसमें हार्वेस्टर का प्रयोग कम होता था और अधिकांश खेती हाथ से होती थी। हाथ से की जाने वाली खेती में धान की कटाई सतह से 6 से 10 सेमी ऊपर से होती थी। इससे अवशेष बहुत कम बचता और जुताई के बाद आसानी से निकल जाता। इसे एक कोने में इकट्ठा कर दिया जाता जहां यह समय के साथ अपघटित हो जाता। अब पंजाब में 94 फीसदी इलाके में हार्वेस्टर से खेती होती है। मशीन केवल ऊपर से 20 सेमी फसल काटती है और बाकी पौधा जस का तस छोड़ देती है। बचा हुआ अवशेष अगली फसल की तैयारी में मुश्किल पैदा करता है। धान कटाई के चार से छह सप्ताह बाद गेहूं की बुआई होती है। ऐसे में खेत को जल्दी साफ करना एक समस्या होती है। अधिकांश किसान आग लगाने का विकल्प चुनते हैं जो जल्दी भी होता है और इसकी लागत भी कुछ नहीं होती। परंतु यह पर्यावरण के लिए घातक है। पंजाब में जहां 75 फीसदी खरीफ रकबा धान है और इसका भी 78 फीसदी हिस्सा जलाया जाता है, वहां यह समस्या ज्यादा गंभीर है।
 
कुछ किसानों को इससे होने वाले नुकसान का अंदाजा है और वे इस अवशेष को मिट्टी में दबाते हैं। इसके लिए इस अवशेष को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटना होता है ताकि उनको जुताई के दौरान मिट्टी में मिलाया जा सके। इससे उर्वरता बढ़ती है और अवशेष का अपघटन हो जाता है। यह अपघटन बहुत धीमी गति से ही सही लेकिन वातावरण में मीथेन उत्सर्जित करता है। इसमें किसान को पैसे भी खर्च करने पड़ते हैं। इसमें कई मशीन प्रयोग की जाती हैं और इसकी लागत करीब 3,000 रुपये प्रति एकड़ आती है। इसका बड़ा हिस्सा अगली फसल की लागत में जुड़ जाता है। 
 
केंद्र सरकार ने संबंधित मशीनरी की खरीद पर भारी सब्सिडी की व्यवस्था की है ताकि फसल अवशेष को मिट्टी में मिलाया जा सके। बहरहाल, लागत के चलते ऐसा हो नहीं पा रहा। इसके अलावा सब्सिडी भी चुनिंदा कंपनियों के उपकरणों पर है।  आवश्यकता इस बात की है कि देश के इस हिस्से में फसल अवशेष जलाने का दीर्घकालिक हल निकाला जाए। इससे निपटने के लिए तीन तरीके अपनाए जा सकते हैं। पहला, फसल अवशेष से बायो-सीएनजी का उत्पादन। इस प्रक्रिया में उत्सर्जन भी न के बराबर होगा। बायोगैस निकालने के बार शेष बचा अवशेष खाद के काम आएगा। विशेषज्ञों से बातचीत से पता चलता है कि धान के डंठलों का सीएनजी के लिए इस्तेमाल किफायती है। इसकी प्रक्रिया भी पर्यावरण के अनुकूल है और इसमें ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन भी नहीं होता। ऐसे निवेश के लिए रियायती दर पर ऋण की व्यवस्था की जानी चाहिए। 
 
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय तथा पंजाब सरकार ने बायो-सीएनजी संयंत्र स्थापित करने की घोषणा की थी लेकिन इस दिशा में कुछ खास प्रगति नहीं हुई है। पंजाब के संगरूर जिले में जर्मनी के निवेश से एक संयंत्र लगा है जबकि दूसरा हरियाणा के करनाल जिले में लग रहा है। केंद्र और राज्यों को बायो-सीएनजी संयंत्रों को बढ़ावा देना चाहिए और संयंत्र लगाने के इच्छुक पक्षकारों को जल्द और रियायती ऋण देना चाहिए।  दूसरा विकल्प है बायोमास के परिवर्तित स्वरूप को ताप बिजली घरों में कोयले के स्थान पर प्रयोग करना या औद्योगिक संयंत्रों में ईंधन के रूप में आजमाना। धान के प्रचुर उत्पादन वाले इलाकों में यह तरीका भी कारगर हो सकता है। 
 
तीसरा विकल्प है बायोमास का शीघ्र अपघटन कर उसे जमीन में मिला देना। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने एक माइक्रोबायल फॉर्मूला बनाया है जो धान के बायोमास को 20-25 दिन में अपघटित कर देता है। अब वे इस तकनीक को खेतों में प्रयोग करने लायक बना रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह तकनीक जल्दी ही खेतों में प्रयोग के लिए तैयार होगी।  इन विकल्पों के सहारे कचरे को संपत्ति में बदला जा सकता है और इसके साथ ही यह धान के अवशेष जलाने से भी देश भर में छुटकारा दिला सकते हैं। बीते तीन दशक के दौरान हमारी खेती के तरीके में भी बदलाव आया है। इसके लिए कच्चे माल पर सब्सिडी और उत्पादन मूल्य नीति जिम्मेदार है। आज हम मांग से 10 फीसदी अधिक चावल उगा रहे हैं। जाहिर है ऐसा नीतियों के चावल उत्पादन के पक्ष में झुके होने से हो रहा है। इसका असर भूजल पर पड़ रहा है। इससे पर्यावरण खराब हो रहा है और राजकोषीय संसाधनों पर भारी दबाव पड़ रहा है। हमें अपनी नीतियों में संशोधन कर पंजाब और हरियाणा को धान की खेती से विमुख करना होगा। सिंचाई के लिए मुफ्त बिजली देना बंद करने और उस सब्सिडी को भिन्न स्वरूप में किसानों को देने से भी फर्क पड़ेगा। 
 
(लेखक नीति आयोग के सदस्य हैं। लेख में उनके निजी विचार हैं)
Keyword: delhi, pollution, parali, court, punjab, haryana, uttar pradesh,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या बैंकों की तरह सख्त नियम से एनबीएफसी में बढ़ेगी जवाबदेही?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.