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शुरू हो सामान्य कामकाज

संपादकीय /  November 26, 2019

कई दिन चले नाटकीय घटनाक्रम के बाद महाराष्ट्र में एक ऐसी सरकार बनने की पृष्ठभूमि तैयार हो गई है जिसमें भारतीय जनता पार्टी (शामिल) नहीं होगी। हालांकि जो कुछ घटा वह किसी भी लोकतंत्र के लिए गर्व का विषय तो नहीं हो सकता। यदि तीन अलग विचारधारा वाले दलों का साथ आना जनादेश का अपमान था तो भाजपा और अजित पवार ने रात के अंधेरे में जो कुछ किया वह लोकतांत्रिक मूल्यों और परंपरा का मखौल उड़ाना था। अब जबकि इसका अंत होता दिख रहा है, बड़ा सवाल यह है कि क्या नई सरकार चलेगी? या वह अपने ही विरोधाभासों और छोटी आंतरिक लड़ाइयों की शिकार हो जाएगी?

 
अतीत में शिवसेना ने कभी यह नहीं छिपाया कि वह स्वयं को विपक्षी दल मानती है, चाहे सत्ता में रहे या न रहे। वह प्रदेश का इकलौता दल है जिसने कोंकण तट पर जैतापुर परमाणु रिएक्टर के लिए भूमि अधिग्रहण का विरोध किया था क्योंकि इससे मत्स्यपालन को खतरा था। यह ऐसी परियोजना थी जिसे कांग्रेस ने 2008 में भारी राजनीतिक कीमत चुकाकर हासिल किया था। भाजपा सरकार भी निरंतर अपने साझेदार दल के विरोध के साये में काम करती रही। फ्रांस ने इस परियोजना में काफी निवेश किया है और अब वह इसके लिए सॉवरिन गारंटी चाहता है। अब तो आशंका यह है कि वह यहां और पैसा फंसाने के बजाय वापस भी जा सकता है। कांग्रेस ने परियोजना की शुरुआत के भी पहले घोषणा की थी कि वह अहमदाबाद और मुंबई के बीच उच्चगति वाली रेल सेवा के खिलाफ है क्योंकि यह रेल मार्ग आदिवासी वन क्षेत्र से गुजरता है और स्थानीय लोगों को इससे कुछ हासिल नहीं होगा। इस रेल मार्ग का विकास करने वाला जापान सांसे थामे प्रतीक्षा कर रहा है कि आखिर क्या होगा क्योंकि कांग्रेस सरकार का हिस्सा होने जा रही है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) दोनों ध्रुवों के बीच फंसी है। उसके पास शिवसेना से केवल दो विधायक कम हैं लेकिन मुख्यमंत्री शिवसेना का होगा।
 
देखना यह होगा कि महाराष्ट्र की नई सरकार गठन के बाद क्या वैसा ही कुछ करेगी जैसा कि अन्य दल विपक्ष से सत्ता में आने के बाद करते हैं। उदाहरण के लिए आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी ने शुरुआती छह महीनों में हर उस चीज को नष्ट करने का काम किया जो उनके पूर्ववर्ती द्वारा बनाई गई थी।  यही बात राजस्थान पर लागू होती है जहां कांग्रेस की सरकार ने पिछली सरकार के कई निर्णय बदल दिए। इनमें चुनाव लडऩे के लिए न्यूनतम शैक्षणिक अर्हता की बात भी शामिल थी। नई सरकार को तमिलनाडु से सबक लेना चाहिए जो देश के सर्वाधिक प्रगतिशील राज्यों में शामिल रहा? कारण नीतियों में निरंतरता। एम करुणानिधि और जे जयललिता राजनीतिक रूप से धुर विरोधी थे लेकिन यदि उन्हें लगता कि कोई नीति सही है तो वे उसे जारी रखते और प्राय: कमी होने में उसमें सुधार करते। मध्याह्न भोजन योजना इसका उदाहरण है। महाराष्ट्र के मतदाता, जो पिछले कुछ दिनों से सबसे अधिक परेशान थे, उनकी अपेक्षा है कि सरकार काम पर लग जाए।
 
सन 2015 में मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर तलेगांव के निकट आने वाला फॉक्सकॉन का 500 करोड़ डॉलर का निवेश, पेट्रोल और डीजल कीमतों में इजाफा करने वाले मूल्यवर्धित कर में कटौती और लेनदेन की लागत में उल्लेखनीय कमी आदि जरूरी कदम हैं। नई सरकार को यह भी ध्यान में रखना होगा कि भाजपा को भले ही राज्य में अच्छी खासी क्षति पहुंची हो लेकिन वह अपनी ओर से कामकाज प्रभावित करने में कोई कसर उठा नहीं रखेगी। 
Keyword: maharashtra, BJP, shivsena, congress, NCP, court,,
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