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अपील के दरवाजे खुले रहने से कोर्ट में बढ़े बकाया मामले
अदालती आईना
एम. जे. एंटनी /  March 26, 2009

यह कानून की कचहरी है न कि न्याय की कचहरी। यह बात एक वरिष्ठ वकील ने एक नौसिखिए वकील से उस समय कही जब वह मुकदमा हार गया।

वादी न्यायालय से न्याय की उम्मीद करते हैं, लेकिन कानून के मुताबिक ऐसे मौके बहुत कम आते हैं जब उन्हें न्याय मिल पाता है, जो कभी-कभी कष्टकारी होता है। अगर कोई मुकदमा हार जाता है तो वह ऊपरी अदालत में अपील कर सकता है, लेकिन एक बार फिर दांव लगाने जैसा ही है।

सही न्याय की तलाश कहीं पर अवश्य समाप्त होनी चाहिए। 1976 में दीवानी प्रक्रिया संहिता में संशोधन इसी उद्देश्य से किया गया था। इस संहिता के मुताबिक, दूसरी अपील की अनुमति तभी मिलती है जब मामला वास्तविक कानूनी सवाल खड़े करता है। सच्चाई और सबूत के नतीजे इससे पहले के चरण में आवश्यक रूप से रुक जाने चाहिए।

हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने कई मामलों में पाया है कि देश के उच्च न्यायालय दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 100 के तहत इस नियम का गंभीरता से पालन नहीं करते। इसलिए एक मामले (कोप्पिसेट्टी वेंकट बनाम पमारती वेंकटयम्मा) में सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा है कि निचली अदालतों को इस नियम के आधार पर काम करना इसलिए जरूरी है क्योंकि इससे न सिर्फ न्यायालय के बकाया मामलों की संख्या में कमी आएगी बल्कि यह वादियों के लिए भी फायदेमंद होगा।

फैसले में कहा गया है कि धारा 100 के तहतन्यायालय द्वारा दिए गए कई फैसलों में सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करने के लिए बाध्य किया गया। फलत: इस अदालत को उच्च न्यायालय के ऐसे फैसलों को दरकिनार करना पड़ा और वास्तविक कानूनी सवाल की व्यवस्था के बाद मामलों को नए सिरे से विचार के लिए वापस उसी उच्च न्यायालय को भेज दिया गया।

दुर्भाग्य से इस प्रक्रिया में कई साल बर्बाद हो गए। वादियों ने इसे ज्यादा समय लेने वाला और काफी खर्चीला पाया। दीवानी मामलों के न्याय की प्रशासनिक कवायद में देरी की विभिन्न वजहों में से एक यह भी है। बार-बार होने वाली अपील की इस समस्या का अध्ययन विधि आयोग ने अपनी 54वीं रिपोर्ट में किया है, जिसे 1973 में सरकार को सौंपी गई थी।

रिपोर्ट के मुताबिक, दीवानी कानून के प्रशासन की उचित व्यवस्था को इस बात की पहचान होनी चाहिए कि मुकदमे की दो सुनवाई सच्चाई पर आधारित हो, पहली निचली अदालत द्वारा जबकि दूसरी अपीलीय अदालत के द्वारा। पूर्णत: सच्चाई की खोज हालांकि प्रशंसनीय है, पर इसका प्राकृतिक होना जरूरी है, पर इसे उचित नियंत्रण में रखा जाना चाहिए।

सच्चाई की तलाश पूर्णता के सिध्दांत से मेल खाना चाहिए। इससे कानून को निश्चितता मिलती है। हालांकि यह वादियों के लिए कठोर हो सकता है, पर यह व्यावहारिक है। सर्वोच्च न्यायालय ने विधि आयोग के विचार का समर्थन किया है। इसमें कहा गया है - यहां तक कि वादियों की सुरक्षा संतोषप्रद न्याय के सतत लक्ष्य की बाबत की जानी चाहिए। हार गए किसी वादी की संतुष्टि के लिए बगैर शर्त पहली अपील का अधिकार आवश्यक है, लेकिन दूसरी अपील के व्यापक अधिकार की प्रकृति ज्यादातर विलासिता की होती है।

सर्वोच्च न्यायालय के मुताबिक, दूसरी अपील के तौर पर दायर बकाया मामलों का जमावड़ा उन शिथिलताओं की वजह से है जिनमें दूसरी अपील बिना जांच (छंटाई) के स्वीकार कर ली जाती है। संसद ने कभी नहीं चाहा कि सच्चाई के आधार पर दूसरी अपील तीसरा ट्रायल बन जाए।

उच्च न्यायालय के कुछ न्यायाधीश सोच सकते हैं कि किसी खास मामले में सबूतों को सही तरीके से पेश नहीं किया गया, लिहाजा निचली अदालत में न्याय की हत्या हो गई। इसके बाद भी सर्वोच्च न्यायालय एक और अपील के तब तक खिलाफ है जब तक कि वास्तविक कानून की बाबत सवाल नहीं खड़े हो जाते। यह कौन दोहराना चाहेगा कि न्याय कानून के आधार पर मिलना चाहिए।

यह पहला ऐसा मौका नहीं है जब सर्वोच्च न्यायालय ने कानूनी सवाल की व्यवस्था किए बिना दूसरी अपील की सुनवाई की बाबत उच्च न्यायालय को आगाह किया हो। हाल के कई फैसलों में इसने उच्च न्यायालय को इस आधार पर लताड़ लगाई थी कि वह कानूनी मसलों के महत्त्व को देखे बिना निर्णय ले रहा है।

सवाल निश्चित रूप से वास्तविक होना चाहिए, मतलब आवश्यक होना चाहिए, जैसा कि संतोष हजारी बनाम पुरुषोत्तम तिवारी (2001) के फैसले में कहा गया है। सवाल न तो तकनीकी होनी चाहिए और न ही अकादमिक, जिसका कोई निष्कर्ष न निकल पाए। हालांकि जरूरी नहीं है कि यह आम महत्त्व का सवाल हो जैसा कि कुछ अन्य मिलते-जुलते कानूनी प्रावधान में है।

अपील की बाबत दिए गए ज्ञापन में स्पष्ट रूप से कानूनी सवाल की प्रकृति का उल्लेख होना चाहिए और उच्च न्यायालय को कर्मठतापूर्वक इसका परीक्षण करना चाहिए। ऐसे साफ और स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद मुकदमा हारने वाले वकील अपने मुवक्किल को अपील दायर करने की लगातार सलाह देते हैं क्योंकि उनके धंधे की खातिर यह अच्छा होता है।

अब यह मुवक्किल पर है कि वह न सिर्फ अपने आपको इससे बचाए रखे बल्कि रकम भी बचाए। साथ ही ज्यादा कानूनी उत्पीड़न से भी बचे। न्यायालय को भी ऐसे मामलों को कानूनी रणनीति के लिहाज से देखना चाहिए, जो कि सिस्टम में अडंग़ा डालते हैं।

Keyword: doors of appeal open so that pending cases increased in court,
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