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संप्रग, राजग और बुरी खबर का दौर

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  November 25, 2019

जरा इस बारे में विचार कीजिए। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) को अपने दूसरे कार्यकाल में वैसी ही समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है जैसी कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) को 2009 में दोबारा चुनाव जीतने के बाद करनी पड़ी थीं। कोई सप्ताह ऐसा नहीं बीतता जब कोई बुरी खबर नहीं मिलती हो। अंतर केवल यह है कि मनमोहन सिंह की सरकार के समय व्यापक भ्रष्टाचार ने समस्या पैदा की थी जबकि मोदी सरकार के दौर में अर्थव्यवस्था इसकी वजह है। एक के बाद एक बुरी खबरों के आने का सिलसिला जारी है। उस वक्त डॉ. सिंह असहाय प्रतीत हो रहे थे और लगभग लडख़ड़ा रहे थे। निजी तौर पर वह भ्रष्ट नहीं थे बल्कि वह तो इससे कोसों दूर थे। परंतु उनके साथ काम करने वालों ने उन्हें नीचा दिखाया।

 
मोदी के साथ भी ठीक यही बात है। छह वर्षों से सत्ता में रहने के बावजूद उन्हें अब तक इस बात का अंदाजा नहीं हो सका है कि आखिर कहां क्या गड़बड़ी है। सन 2013 तक यानी मनमोहन सिंह की सरकार के अंतिम पूर्ण वर्ष के दौरान आर्थिक मोर्चे पर बुरी खबरों के आगमन का सिलसिला शुरू हो गया था। इसका सबसे अधिक राजनीतिक फायदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उठाया। मतदाताओं ने उनके हर वादे पर यकीन किया। वर्ष 2012 में मुद्रास्फीति की जो भूमिका संप्रग के लिए थी यदि 2022 में भ्रष्टाचार राजग के लिए उसी भूमिका में आ जाता है तो यह देखना काफी दिलचस्प होगा।
 
संप्रग की छवि साफ-सुथरी करने की कोशिश में डॉ. मनमोहन सिंह ने कई जांच और दंडात्मक कार्रवाइयों की घोषणा की। परंतु इनसे कोई मदद नहीं मिली। मोदी ने भी अर्थव्यवस्था को लेकर जल्दबाजी में ऐसी ही  घोषणाएं की हैं और आगे भी करेंगे। यह तो समय ही बताएगा कि इससे कोई मदद मिलती है या नहीं। वर्ष 2012 के आखिर तक संप्रग के गैर कांग्रेसी सदस्यों ने लगभग समर्पण कर दिया। उनमें से कई ने मुझसे कहा कि वे अब आराम करना चाहते हैं और अपने नाती-पोतों के साथ खेलना चाहते हैं। राजग के साझेदारों को भी भाजपा के साथ वही समस्या है। एकता की जगह विविधता ले रही है। स्पष्ट है कि राजनीतिक आवश्यकताएं किसी की प्रतीक्षा नहीं करतीं। यह याद करना भी उचित होगा कि सन 2010 में भाजपा पूरी तरह निराश थी और कांग्रेस को साफ बढ़त नजर आ रही थी। परंतु 2014 आते-आते हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।
 
कांग्रेस की स्थिति इसलिए खराब हो गई क्योंकि उसकी छवि के साथ अक्षमता और कुटिलता जैसी बातें जुड़ गईं। अवधारणाएं इसी प्रकार बनती हैं। उनमें तथ्यों के लिए कोई स्थान नहीं होता।  मोदी सरकार फिलहाल इसी समस्या से जूझ रही है। आम धारणा यह है कि सरकार को इस बात का कोई अंदाजा नहीं है कि देश की अर्थव्यवस्था के औद्योगिक उत्पादन में अचानक आ रही भारी गिरावट की समस्या से कैसे निपटा जाए। जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी 15 फीसदी है। यहां तक कि जब सरकार सही कदम उठाती है तब भी सरकार की आलोचना की जाती है। निश्चित रूप से सच यह है कि सरकार ने वही कदम उठाए हैं जो अर्थशास्त्रियों तथा वृहद, सूक्ष्म, कराधान तथा प्रशासनिक मामलों से जुड़े अन्य विशेषज्ञों ने सुझाए।
 
सरकार की कदम उठाने की गति भले ही निराश करने वाली हो, लेकिन उसकी दिशा गलत नहीं है। परंतु जनता का मिजाज ऐसा हो चुका है कि वह क्षमा करने के मूड में नहीं है। एक बार अगर जनता की धारणा बन गई तो सरकार जिन सीमाओं के भीतर काम कर रही है, वे केवल एक बचाव की तरह नजर आएंगी। एक बड़ी पहेली जिसके बारे में मैं पहले भी लिख चुका हूं, वह है सरकार की राजनीतिक नीतियों और आर्थिक नीतियों के बीच कोई तालमेल न होना। राजनीति में बड़ी चीजों के बारे में बातें और उससे जुड़ी अवधारणाएं चुनाव जीतने में मददगार साबित हो सकती हैं।
 
यह संप्रग से उलट है। उसके कार्यकाल में अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत सही दिशा में थी। कम से कम तब तक जब तक प्रणव मुखर्जी वित्त मंत्री नहीं बन गए। उनके वित्त मंत्री बनने के बाद उन्होंने क्या कुछ किया यह वही बता सकते हैं। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार की तरह मोदी सरकार को भी ऐसी परिस्थितियों से गुजरना पड़ रहा है जहां सारी गड़बडिय़ां एक साथ घटित होती हैं। यह एक ऐसी नाव की तरह हो चुकी है जिसमें सैकड़ों छेद हो चुके हैं। नौका चालक दल को यह पता नहीं है कि नाव से पानी बाहर निकालना है या छेद भरने हैं। 
 
औद्योगिक वस्तुओं की मांग में फिलहाल जो कमी आई है वह काफी हद तक ऐसी ही है। सरकार उपभोक्ताओं की मांग और निवेश पर व्यय बढ़ाने की दिशा में खूब प्रयास कर रही है लेकिन सबकुछ सही नहीं हो पा रहा है। ऐसे में सरकार को क्या करना चाहिए? सरकार के पास केवल एक  ऐसा उपाय है जो आर्थिक रूप से समझदारी भरा माना जा सकता है: वह है व्यय में कटौती करना। ऐसा इसलिए क्योंकि सरकार के पास धन की कमी है। परंतु ऐसा करते हुए भी उसे संप्रग सरकार में वित्त मंत्री रहे पी चिदंबरम का तरीका नहीं अपनाना चाहिए। चिदंबरम ने व्यय को छिपाने और लंबित करने का तरीका अपनाया था।
 
निश्चित तौर पर उपभोक्ताओं और निवेशकों के रुझान में आई भारी कमी के लिए सरकार का बहुत अधिक खर्च करना भी उत्तरदायी है। इसके अलावा सरकार कर राजस्व भी चाहती है। सरकार को थोड़ा सहज रहने की आवश्यकता है। अर्थशास्त्री कींस की बातों को याद करें तो इस समय अर्थव्यवस्था में जो कुछ हो रहा है वह उनके द्वारा सोचे गए तौर तरीकों से एकदम उलट है। जब चीजें उस तरह नहीं घटित होतीं जैसे उन्हें होना चाहिए तब वैसी स्थिति बनती है जैसी अभी बनी हुई है। उस स्थिति में गति को धीमा करना होता है। 
Keyword: NDA, BJP, UPA, congress,,
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