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आरसेप से दूर रहकर गंवा दिया बड़ा मौका

अमिता बत्रा /  November 25, 2019

तुलनात्मक बढ़त बनाने की प्रक्रिया में कुछ क्षेत्र पीछे छूट जाएंगे। हालांकि यह एफटीए ही नहीं बल्कि सभी तरह के व्यापार में होता है। आरसेप के बहाने एफटीए पर रोशनी डाल रही हैं अमिता बत्रा

 
भारत ने 16 देशों वाले क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसेप) समझौते का हिस्सा न बनने का फैसला किया है। अर्थव्यवस्था के संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर जुड़ी चिंताओं, सेवा क्षेत्र के उदारीकरण, पेशेवरों की आवाजाही से संबंधित मोड-4 और चीन एवं आसियान देशों के साथ व्यापार घाटा बढऩे की आशंका ने भारत को इस प्रस्तावित समझौते से दूर रखा है। अब हम दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) की समीक्षा के अलावा अन्य देशों के साथ एफटीए पर नए सिरे से विचार करने की भी सोच रहे हैं। मौजूदा समय एफटीए, खासकर आरसेप के कुछ पहलुओं पर रोशनी डालने के लिए मुफीद हो सकता है।
 
पहली और सबसे खास बात, हमें यह स्वीकार करने की जरूरत है कि एशिया में बहुत बड़े क्षेत्रीय व्यापार समझौते होना अपरिहार्य है। समान सोच वाले देश इन समझौतों का इस्तेमाल साझा हितों को साधने और मध्यवर्ती एवं अंतिम उत्पादों की आवाजाही को संभव बनाने के लिए नियम एवं अनुशासन विकसित करने के लिए करते हैं। यह वैश्विक मूल्य शृंखला (जीवीसी) के लिए अनिवार्य है। आरसेप ऐसा ही एक विशाल क्षेत्रीय व्यापार समझौता है और इसका हिस्सा बनने से भारत क्षेत्रीय एवं वैश्विक मूल्य शृंखला का अंग बन सकता था। पूर्व एशिया वैश्विक वित्तीय संकट खत्म होने के बाद जीवीसी गतिविधियों का सबसे गतिशील केंद्र रहा है और इस अवधि में पूर्वी एशिया के साथ यूरोप एवं उत्तर अमेरिका दोनों की ही जीवीसी गतिविधियां बढ़ी हैं।
 
दूसरी, व्यापार समझौते आपसी लेन-देन के सिद्धांत पर काम करते हैं। जहां यह सच है कि समझौते के सदस्य देशों को स्वाभाविक तौर पर बाजार तक पहुंच मिलती है, वहीं यह बात सभी सदस्यों पर लागू होती है। अगर हम कुछ वरीयता देते हैं तो हमें कुछ वरीयता मिलती भी है। जहां मौजूदा (स्थिर) तुलनात्मक बढ़त तरजीही पहुंच के लिए होने वाली एफटीए चर्चा का आधार है, वहीं हमें गतिशील तुलनात्मक बढ़त के लिए भी तैयार होना चाहिए। जीवीसी में शामिल होने से उत्पादों की तुलना में छोटे मध्यवर्ती कार्यों में तुलनात्मक बढ़त बना पाने की गुंजाइश बढ़ जाती है। इस तरह, इस प्रक्रिया में विनिर्माण एवं संबद्ध सेवा गतिविधियों में नई तुलनात्मक बढ़त विकसित एवं पल्लवित हो सकती है। लिहाजा यह जरूरी है कि एफटीए पर चर्चा महज स्थिर धारणाओं के बजाय गतिशील तुलनात्मक बढ़त अनुमानों पर आधारित होनी चाहिए।
 
तुलनात्मक लाभ की स्थिति पैदा करने के क्रम में कुछ क्षेत्रों को नुकसान उठाना होगा। वैसे यह बात केवल एफटीए पर ही नहीं लागू होती है, सभी तरह के व्यापार में ऐसा होता है। एफटीए समझौतों में व्यापार उदारीकरण और खासकर तरजीही उदारीकरण के साथ श्रम क्षेत्र के लिए मददगार नीतियों एवं कार्यक्रमों की भी जरूरत होती है ताकि नुकसान उठाने वाले क्षेत्रों में व्यापार-जनित विस्थापन को समायोजित किया जा सके। जापान, दक्षिण कोरिया एवं वियतनाम जैसे देशों ने व्यापार सहयोग के लिए विशिष्ट कार्यक्रम चलाए हुए हैं। पुनप्र्रशिक्षण, स्थानांतरण भत्ता, शिक्षा और वित्तीय सहायता के साथ छोटी एवं मझोली इकाइयों और उनके कामगारों को समर्थन देकर मुक्त व्यापार समझौतों और आर्थिक सुधार के दुष्प्रभावों से निपटने की कोशिश की गई है।
 
तीसरी बात, व्यापार घाटे के संदर्भ में यह लाभप्रद हो सकता है कि जीवीसी के दौर में वस्तुओं के उत्पादन में तीसरे देश की सहभागिता को नहीं जोडऩे वाली आयात-निर्यात की साधारण गणना द्विपक्षीय व्यापार घाटों का सबसे सटीक अनुमान नहीं हो सकती है। यह देखते हुए कि चीन कई देशों के लिए असेंबलिंग एवं पुनर्निर्यात का एक केंद्र है, लिहाजा मूल्य वद्र्धन के आधार पर एक व्यापार संतुलन अनुमान एक उपयोगी कवायद हो सकती है। इससे हम चीन के साथ अपने व्यापार असंतुलन की अधिक सटीक तस्वीर तैयार कर सकते हैं। इसके अलावा निर्यात एवं व्यापार पुनर्संतुलन में वृद्धि वांछनीय उद्देश्य होते हुए भी प्रत्याशित सुनिश्चित परिणाम नहीं है। एफटीए का फायदा उठाने के लिए भारत को घरेलू उद्योग की प्रतिस्पद्र्धात्मकता बढ़ाना, बड़े बाजार सुधार करना और एक अनुकूल व्यापार एवं निवेश परिवेश बनाना जरूरी है। वियतनाम जैसे छोटे देशों ने ट्रांस-पैसिफिक साझेदारी समझौते में सदस्य बनने की मंशा जताई है ताकि उसे आरसेप की तुलना में कहीं अधिक एकीकरण का लाभ मिल सके और घरेलू आर्थिक सुधारों को अमलीजामा पहनाया जा सके।
 
चौथी बात, भारत के लिए सेवा क्षेत्र वार्ताओं में उदारीकरण के साधनों से परे जाकर सोचना उपयोगी हो सकता है। आसियान का सीमित आंतरिक सेवा क्षेत्र उदारीकरण और सेवाओं में भारत-आसियान एफटीए का लागू नहीं होना आसियान को राजी करने की राह में आने वाली मुश्किलों का संकेत होना चाहिए। व्यवसाय, वित्तीय, परिवहन एवं लॉजिस्टिक जैसे मूल्य-शृंखला उत्पादन के लिए जरूरी या उनके साथ-साथ चलने वाली सेवाएं या शोध एवं डिजाइन जैसी उच्च सेवाएं भी आरसेप में शामिल होने के बाद नए अवसर पैदा कर सकती हैं। इन क्षेत्रों में अपने संभावित तुलनात्मक लाभ को चिह्निïत करने से बातचीत की प्रक्रिया में कुछ लचीलापन आ सकेगा।
 
पांचवीं बात, आसियान के साथ भारत के एफटीए के मामले में एक निम्न उपयोगी दर एफटीए प्रभावहीनता या व्यापार पर असर डालने की सीमित क्षमता का अनिवार्य रूप से संकेतात्मक नहीं है। यह कारोबारी लोगों की एफटीए के बारे में सीमित समझ के आधार पर भी हो सकता था। तरजीही मार्जिन एवं स्रोत के नियम के साथ सरकारी प्रयासों एवं उद्योग खासकर एसएमई को सलाह देने से दक्षिण कोरिया जैसे देशों में एफटीए उपयोगी दरें बढ़ाने में मदद मिली है। भारत की ही तरह कोरिया भी एफटीए प्रक्रिया का हिस्सा बाद में ही बना है। एफटीए से व्यापार बढऩे एवं लाभ बढऩे को लेकर बने संदेहों को सरकारी कदमों ने गलत ठहराया है। कंपनियों के लिए शैक्षणिक पाठ्यक्रम चलाना, एफटीए पोर्टलों के जरिये सूचना का प्रसार, कार्यशालाओं का आयोजन एवं रोजमर्रा की सलाह के लिए व्यवस्था बनाना जैसे कदम सरकार उठाती है।
 
छठी बात, अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ एफटीए करना आरसेप का स्थानापन्न नहीं हैं क्योंकि फिलहाल ये दोनों क्षेत्र वृद्धि या जीवीसी गतिविधियों के मामले में दुनिया के सबसे गतिशील इलाके नहीं हैं। ट्रंप के राष्ट्रपति काल में अमेरिका की दूसरे देशों के साथ व्यापार वार्ताएं बेहद अप्रत्याशित राह पर रही हैं। भारत के साथ एफटीए को लेकर तो अभी बातचीत शुरू भी नहीं हुई है। वहीं यूरोपीय संघ के साथ एफटीए पर वार्ता 2007 में शुरू हो गई थी लेकिन 12 साल और कई दौर की बैठकों के बाद भी इस समझौते को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है। यूरोपीय संघ से वार्ता में सबसे जटिल मुद्दे आरसेप की ही तरह कृषि, सेवाओं का मोड-4, डेयरी क्षेत्र और बौद्धिक संपदा अधिकार के उदारीकरण के हैं। आखिरी और शायद सबसे अहम बात, आसियान-केंद्रित आरसेप समझौते में भागीदारी का मौका गंवा देना हिंद-प्रशांत की आसियान-केंद्रित संरचना में हमारी प्रासंगिकता को काफी मुश्किल बना सकता है। ऐसे में, आरसेप के बारे में थोड़े पुनर्विचार और अगले दो महीनों में व्यापार विशेषज्ञों की मदद से बहुपक्षीय रणनीति तैयार करने और आर्थिक सुधारों को लागू करना वक्त का तकाजा है। 
 
(लेखिका जवाहरलाल नेहरू के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान में प्रोफेसर हैं)
Keyword: RCEP, FTA, metal,,
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