बिजनेस स्टैंडर्ड - एनबीएफसी को सख्त नियमन एवं वजूद बनाए रखने की जरूरत
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एनबीएफसी को सख्त नियमन एवं वजूद बनाए रखने की जरूरत

बीएस संवाददाता /  November 24, 2019

आप विलय के जरिये एक बैंक बनना चाहते थे लेकिन बैंकिंग नियामक को इस दावे में दम नहीं दिखा। आपने अपनी प्रस्तुति में कहा है कि इसे एक फीनिक्स पक्षी की तरह दोबारा जीवित होते देख रहे हैं। इंडियाबुल्स की यह नई कहानी क्या है?

 
गगन बंगा: सबसे बड़ा सबक यह है कि एक निश्चित आकार के बाद परिसंपत्ति एवं देनदारी के मोर्चे पर प्रतिशतता अधिक प्रासंगिक नहीं रह जाती है। आप थोक में वित्तपोषित देनदारी रखते हुए थोक में कर्ज नहीं ले सकते हैं। हमने वितरण, बड़ा पूंजी आधार और तकनीक को अपनी ताकत के तौर पर चिह्निïत किया है। जब मैं कहता हूं कि हम राख से दोबारा खड़े हो रहे हैं तो यह मानव पूंजी एवं इक्विटी पूंजी के दम पर ही है। एनबीएफसी के लिए अलग तरह के नियम-कानून हैं। जब तक हम भारतीय वित्तीय प्रणाली में केवल चुनिंदा बैंकों एवं चार-पांच एनबीएफसी का ही वजूद बनाए रखने का फैसला नहीं करते हैं, तब तक हमें एनबीएफसी एवं बैंकों के लिए अलग-अलग नियम रखने ही होंगे। हालांकि हमारा मतलब इस समय जारी नियामकीय खरीद-बिक्री से नहीं है। लेकिन, हमें एक बेहद उन्नत नियमन प्रणाली अपनाने की जरूरत है जहां किसी को भी यह संदेह करने की जरूरत नहीं है कि परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा (एक्यूआर) की जरूरत है या नहीं। अगर एक्यूआर से वित्तीय प्रणाली को भरोसा मिलता है तो इसे तत्काल करें। लेकिन यह जरूर सुनिश्चित करें कि नियमन से विनियमित इकाइयों को बढिय़ा कवर मिलता है और आंकड़े को लेकर संशय की कोई गुंजाइश नहीं है। यह एक साधारण तरलता संकट है जिसे विश्वास के संकट की हद तक पहुंचा दिया गया है।
 
थोक में कर्ज देना आवासीय वित्त कंपनियों और एनबीएफसी के लिए भी बड़ी समस्या नजर आता है?
 
खुशरू जिजिना: हमने वर्ष 2012-13 में कारोबार शुरू किया था और रियल एस्टेट क्षेत्र में समूह की विशेषज्ञता की वजह से हमने थोक में कर्ज बांटना और आवासीय ऋण देना शुरू किया था और फिर वाणिज्यिक एवं गैर-आवासीय कर्ज की तरफ बढ़े। हमने खुदरा क्षेत्र में भी कदम रखने की घोषणा की थी। लेकिन जब एनबीएफसी क्षेत्र में लीमन दौर आया तब हमारे पास खुदरा कर्ज का केवल एक फीसदी हिस्सा ही था। असल में हमने गलत समय चुन लिया था। इस घटना का सबसे बड़ा सबक यह है कि आपका लोनबुक खुरदरा होने की जरूरत है। अकेले पिछले साल में ही हम 18,000 करोड़ रुपये के अपने समूचे वाणिज्यिक पत्रों (सीपी) को 600 करोड़ रुपये से तब्दील कर सकते थे और नवंबर अंत तक इसे शून्य पर भी ला सकते थे। इससे स्पष्ट है कि हम खुरदुरी देनदारियों की तरफ बढ़ रहे हैं।
 
क्या बैंक एनबीएफसी को कर्ज दे रहे हैं?
 
जिजिना: हां, लेकिन वृद्धि के लिए पैसे ही नहीं है। हमें बस तरलता मिल रही है। इस संकट के अब तरलता से बढ़कर विश्वास की कमी तक पहुंच जाने से हमारे लिए केवल वजूद बचाए रखने लायक तरलता ही बची है ताकि हम अपनी मौजूदा परियोजनाओं को रकम दे सकें।
 
ऐसे में असली खलनायक रियल एस्टेट ही बनता नजर आ रहा है?
 
श्रीधर वेगेसना: यह इकलौता नहीं है लेकिन ऐसा है। हमें बाजार में एक विकास यह देखना होगा कि आप एनबीएफसी को परिसंपत्तियों के समूह से देनदारी हटाने और दो-तीन साल बाद उसे फिर से बैंक की तरफ लाने की इजाजत कैसे देते हैं? हमारे पास कर्ज लेने और उसे इधर-उधर ले जाने की क्षमता नहीं है जबकि सीमित अवधि की उधारी के साथ कम अवधि के कर्ज वितरण की क्षमता वाले अन्य बाजारों में मामला अलग है। हमें इसे कर्ज वितरण में अधिक एक्सपोजर की मंशा रखने वाले लोगों की तरफ ले जाना होगा। अपने बाजार में ऐसे उत्पाद लाने ही होंगे।
 
जसपाल, आप अलग नजर आ रहे हैं क्योंकि आप आवासीय वित्त कारोबार में ज्यादा सक्रिय नहीं हैं?
 
जसपाल बिंद्रा: अब भी पर्याप्त एनबीएफसी हैं जो आज विशुद्ध रूप से खुरदुरे खुदरा क्षेत्र में है जिसमें बहुत कम लाभ होता है। लेकिन मैं उन लोगों की तरफ से बोल रहा हूं जिनका सीमित अवधि की कोई उधारी नहीं है और न ही कंपनी परिचालन या नियंत्रण का ही कोई मसला है। इसके बावजूद उन्हें भी तरलता के मोर्चे पर वैसे ही हालात का सामना करना पड़ रहा है। मुझे लगता है कि तरलता का मुद्दा पूरे एनबीएफसी क्षेत्र में व्याप्त विश्वास खत्म होने से जुड़ा है। केवल इसलिए कि कुछ अपना मॉडल बदल लेंगे, मुझे नहीं लगता है कि वे इससे अधिक आकर्षक कैसे बन पाएंगे ताकि फिर से भरोसा बहाल हो सके।
 
एनबीएफसी संकट के लिए एक बुनियादी वजह नियमन की कमजोरी भी है...
 
वी श्रीनिवास रंगन: बहीखाते में आवासीय ऋण का एक खास हिस्सा होने की जरूरत होती है और खुदरा कर्ज होने से पिछले कुछ वर्षों में इसकी मौजूदगी रही भी है। इसकी शुरुआत परिसंपत्ति एवं देनदारी प्रबंधन (एएलएम) की समस्या से जूझ रहे आईएलऐंडएफएस से हुई थी। जोखिम विमुखता शुरू होने की एक वजह यह भी थी कि पैसे के वितरण पर कोई भी स्पष्टता नहीं थी। परिसंपत्ति एवं नकद प्रवाह सब पर रोक लगा दी गई। एएलएम इस लिहाज से काफी अहम है कि सीमित अवधि की परिसंपत्ति या देनदारी बैलेंसशीट के दूसरे हिस्से को किस हद तक वित्त मुहैया करा पाती है? परिसंपत्ति पक्ष हमेशा ही तरलता की सख्त कमी वाला एक उत्पाद है, आप कभी भी देनदारियों पर उस तरह की तरलता नहीं जुटा पाते हैं कि सही तरह से परिसंपत्ति के बराबर हो। आपको अपनी देनदारियां पूरी करने के लिए परिसंपत्ति पक्ष से उसी तरह का नकद प्रवाह नहीं मिलेगा। विविधता भी काफी अहम है। इस पूरे घटनाक्रम में हम अधिक प्रभावित नहीं हुए हैं जिसकी बड़ी वजह यह है कि हमारी देनदारियां काफी विविध हैं। एचडीएफसी में हमने नब्बे के दशक के अंतिम वर्षों से जमाएं लेना शुरू किया था और अब यह कुल दायित्वों के तर्कसंगत अनुपात तक पहुंच चुका है।
 
क्या आप इस बात से सहमत हैं कि स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाने में भारतीय रिजर्व बैंक और सरकार सुस्त रहे हैं? उन्होंने हालात को यहां तक पहुंचने दिया।
 
रंगन: इसे मोटे तौर पर एक संस्था की समस्या ही समझा जाता रहा है और फिर इसे ऋण देने से बचा जाने लगा। हालात की गंभीरता का अंदाजा लगाने या उसे स्वीकार करने में काफी विलंब हुआ। मुझे नहीं पता कि वित्तीय प्रणाली में तरलता उपलब्ध है और क्या सभी समूहों एवं पक्षों के लिए यह उपलब्ध है?
 
आरबीआई ने नकदी कवरेज अनुपात (एलसीआर) की शुरुआत की है जिसे चरणों में कायम रखा जाएगा। क्या उससे क्षेत्र को मिल रहे कुछ लाभ चले जाएंगे?
 
रंगन: एलसीआर की व्यवस्था एएलएम की जरूरत से निकली है जहां अगले 30 दिनों का शुद्ध बहिप्र्रवाह उच्च-गुणवत्ता वाली तरल परिसंपत्तियों के रूप में रखना होगा। हमें अपनी एलसीआर जरूरत के लिए जो प्रावधान करना पड़ा वह पुरानी व्यवस्था से काफी अलग है।
 
एनबीएफसी के लिए आगे की क्या राह दिख रही है?
 
बिंद्रा: इतना सब होने के बावजूद कर्ज की मांग नहीं घटी है। अगर एमएसएमई को ही देखें तो वहां कर्ज की मांग पूरी नहीं हो पा रही है। केवल 10 फीसदी एमएसएमई की ही पहुंच औपचारिक ऋण तक है। अगर मैं सभी तरह के औपचारिक ऋण के साथ अनौपचारिक महंगे ऋण को भी जोड़ लूं तो अब भी 25 लाख करोड़ रुपये का फासला बना हुआ है। 
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