बिजनेस स्टैंडर्ड - वित्तीय क्षेत्र को फिर भरोसा बहाल करने की जरूरत
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वित्तीय क्षेत्र को फिर भरोसा बहाल करने की जरूरत

बीएस संवाददाता /  November 24, 2019

क्या आन्ध्रा बैंक और कॉरपोरेशन बैंक का यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में विलय होने से कारोबार प्रभावित होगा?

 
राजकिरण राय जी : हमने कारोबार विभाग को अलग किया है ताकि यह प्रभावित नहीं हो। शाखाएं सामान्य रूप से काम कर रही हैं क्योंकि उनका विलय से सीधा कोई लेना-देना नहीं है। केवल कॉरपोरेट कार्यालय में चल रहे कारोबार विभाग प्रभावित हो सकते हैं। लेकिन उन्हें अलग रखा गया है ताकि कारोबार सामान्य रूप से चलता रहे। 
 
केवल एक सीईओ होने पर 
 
राय : सार्वजनिक क्षेत्र में हम ऐसे मुद्दों को लेकर पर्याप्त स्पष्टता रखते हैं। हम किसी भी सीईओ के साथ काम कर सकते हैं। आम तौर पर हमें सीईओ के बारे में एक दिन पहले या उसी दिन पता चलता है। हम पूरी तरह सहज हैं और हमारे लिए यह कोई मुद्दा नहीं है। 
 
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक बाहर के एकसमान दिखते हैं, लेकिन जब आप हमारे सिस्टम, सेवाओं और प्रक्रियाओं को देखते हैं तो बहुत से अंतर दिखाई देते हैं। हमारे बैंक में तकनीकी प्लेटफॉर्म फिनैकल 10 का उपयोग सेवाओं और प्रक्रियाओं के आधार पर दूसरे बैंकों से अलग है। तीनों बैंकों से करीब 30 टीम बनाई गई हैं। ये प्रत्येक विभाग, प्रत्येक सेवा और प्रत्येक प्रक्रिया को देख रही है। यह पहल  अपने अंतिम चरण में है। 
 
चालू और बचत खातों (कासा) की अहमियत पर 
 
वी वैद्यनाथन : कासा अब भी बहुुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इससे धन में स्थिरता आती है। पिछली तीन तिमाहियों से ऋण बुक (आईडीएफसी फस्र्ट बैंक) नहीं बढ़ी है। केवल कासा का अनुपात दोगुना हुआ है। इसलिए मेरी रणनीति यह है कि एक साल बाद ऋण बुक संभवतया 4-5 फीसदी बढ़ जाएगी और लेकिन कासा फिर दोगुना हो जाएगा। भारत में कासा 30 से 40 फीसदी होने पर आप ऋण बुक में लगातार बढ़ोतरी हासिल कर सकते हैं। आखिरकार यह बैंक है। हमने ऐसा अन्य निजी क्षेत्र के बैंकों में भी देखा है। मेरी योजना कासा को एक निश्चित स्तर पर लाना, देनदारी तय करना और तीन चार वर्षों में स्थिरता लाना है। 
 
कारोबार में खुदरा हिस्सेदारी बढऩे पर 
 
वैद्यनाथन : कैपिटल फस्र्ट (वित्तीय कंपनी, जिसके आईडीएफसी बैंक में विलय से आईडीएफसी फस्र्ट बैंक बना है) के लिए ऋण प्रतिफल 16.5 से 17 फीसदी था। उधारी की लागत करीब 8.8 फीसदी थी। आईडीएफसी बैंक की उधारी लागत 7.5 फीसदी थी और ऋण की दर 9.3 फीसदी थी। कैपिटल फस्र्ट की उधारी की जगह आईडीएफसी बैंक की उधारी लागत 7.5 फीसदी ले लेती है। आप आईडीएफसी के बुनियादी ढांचा ऋणों की जगह 16.5 फीसदी के खुदरा ऋणों को अपनाते हैं। इससे आपको ऐसा बैंक मिल जाता है, जिसकी उधारी लागत 7.5 फीसदी है, जबकि ऋण प्रतिफल 16.5 फीसदी है। जो लोग आज इस मॉडल को नहीं देख रहे हैं, वे इसे अगली कुछ तिमाहियों में देखेंगे। 
 
भारतीय बैंकिंग की मौजूदा दिक्कतें 
 
आशु खुल्लर : हमारे लिए खुद को उन चीजों से थोड़ा दूर रखने की जरूरत हैं, जो पिछले चार पांच महीनों में अर्थव्यवस्था घटित हुई हैं या गैर-बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र में घटित हुई हैं और जिनका पिछले 12 महीनों में अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है। एक रोचक चीज यह है कि जब आप एक लंबे समय बाद देश में आते हैं, जो आप बाहरी नजरिया अपनाते हैं। यह देश में मौजूदा मध्यम अवधि के स्थायी मौकों पर केंद्रित होता है और मेरे लिए इस पैमाने पर कुछ नहीं बदला है। बीस साल पहले गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों की बेहतर पहचान थी। भारत में डिजिटल बुनियादी ढांचा संभवतया चीन को छोड़कर अन्य बड़े उभरते बाजारों में सबसे बेहतर है। 
 
घरेलू संस्थानों को प्रभावित करने वाले मौजूदा मुद्दों से विदेशी बैंकों के लाभ उठाने पर खुल्लर: महा वित्तीय संकट का एक सबक यह है कि एक बैंक के रूप में आपको अपनी मुख्य क्षमताओं और ताकतों पर दांव लगाना चाहिए। हम इस देश में 1902 से हैं, इसलिए हम इससे बहुत से तरीकों से जुड़े हुए हैं। हम हमेशा एक संस्थागत बैंक थे। लेकिन अगर आप 1980 के दशक के आखिर वर्षों को याद करेंगे तो पाएंगे कि सिटी ने कई तरीकों से मौजूदा उपभोक्ता बैंकिंग को आकार देने में अपना योगदान दिया। सिटी ने पहला एटीएम, पहला क्रेडिट कार्ड आदि शुरू किए। हम अपनी ताकतों पर ही दांव लगाएंगे। हमारा मानना है कि भारत में स्थायी, मध्य अवधि के अवसर हैं, जो आगे भी बने रहेंगे। उनमें से एक देश में वैश्विक निवेशकों को आने में मदद देना है। अन्य मौकों में डिजिटाइजेशन, शहरीकरण और उपभोक्तावाद शामिल हैं। भारत युवा देश है, इसलिए मेरा मानना है कि उपभोक्ताओं की ये आकांक्षाएं बनी रहेंगी। 
 
आईडीबीआई बैंक के मुनाफे में आने के समय पर 
 
राकेश शर्मा :हालांकि यह कीमत-संवेदनशील सूचना हो सकती है। लेकिन मैं यह कहना चाहूंगा कि एस्सार स्टील के फैसले से हमारे राजस्व में इजाफा होगा। इसके साथ ही कुछ अन्य बकाये की भी वसूली शुरू हो जाएगी। इसलिए चालू वित्त वर्ष में, संभवतया तीसरी या चौथी तिमाही में बैंक के मुनाफे में आने के आसार हैं। 
 
आईडीबीआई बैंक को खुदरा बैंक बनाने के उद्देश्य पर 
 
शर्मा : आईडीबीआई बैंक ने कॉरपोरेट फाइनैंस बैंक के रूप में काम करना शुरू किया था। आज हमारे 53 फीसदी अग्रिम खुदरा क्षेत्र में और शेष कॉरपोरेट क्षेत्र में हैं। हमने चालू वित्त वर्ष के अंत तक अग्रिमों में खुदरा क्षेत्र का हिस्सा 55 फीसदी करने का लक्ष्य तय किया है। मैं इसे 60-40 पर लाना चाहता हूं क्योंकि हमें इसमें पर्याप्त विशेषज्ञता हासिल है। हमें अतीत की सीख आगे बढऩे में मदद देंगी। सभी कॉरपोरेट ऋण फंसे हुए नहीं हैं। ऐसे क्षेत्रों में भी कुछ कंपनियां अच्छी हैं, जो अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं। लेकिन इस क्षेत्र में ऋण देने के लिए सही कंपनियों का चयन करने की जरूरत है। 
 
सभी बैंकों के खुदरा कारोबार में उतरने के जोखिम पर 
 
शर्मा : भले ही यह कॉरपोरेट ऋण हो या खुदरा ऋण क्षेत्र, अगर आप इस क्षेत्र की बारीकियों को नहीं समझते हैं तो आपको घाटा उठाना पड़ेगा। इसलिए व्यक्ति को विशेषज्ञता विकसित करने की जरूरत है। भारत की आबादी और मांग को देखते हुए लगता है कि यहां भरपूर मौके और मांग हैं। 
 
येस बैंक में धन जुटाने के समय कड़ी सौदेबाजी पर 
 
रवनीत गिल : मैंने कभी यह नहीं कहा कि मैं एक निश्चित कीमत से नीचे इक्विटी नहीं जुटाऊंगा। आपको यह समझना होगा कि हमारे लिए सबसे प्रमुख काम बैंक को स्थिरता देना था। हमें हिस्सेदारों और कर्मचारियों आदि की बहुत सी उम्मीदों में संतुलन कायम करना था। इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि हम एक बड़े बैंक हैं। हमने पहली तिमाही के अंत में हमारी कॉमन इक्विटी टियर 1 पूंजी आठ फीसदी पर स्थिर की है, जिसे हम अगली तिमाही में बढ़ाकर 8.7 फीसदी पर पहुंचा सकते थे। हालांकि हमने उसके बीच छोटा क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट (क्यूआईपी) लेकर आए। 
 
कुल मिलाकर आप केवल वृद्धि पूंजी ही नहीं बल्कि बदलावकारी पूंजी के बारे में विचार कर रहे हैं। हम कैसे आंतरिक और बाहरी भागीदारों और संभावित निवेशकों से निपटे हैं, वह अपने आप में एक यात्रा रही है। मैं कहना चाहूंगा कि हम इस यात्रा के आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुके हैं और हम जल्द ही इस बाधा को पार कर जाएंगे।
 
वित्तीय क्षेत्र में भरोसे की कमी पर 
 
गिल : इस समय वित्तीय क्षेत्र के लिए बड़ी समस्या भरोसे की कमी है। यह भरोसे की कमी केवल जमाकर्ता और बैंक के बीच ही नहीं है बल्कि वित्तीय संस्थानों के बीच भी है। अगर कोई संस्थान कहता है कि उसकी समस्या एक है तो अन्य यह महसूस कर सकते हैं कि यह वास्तव में डेढ़ है। इसका कई स्तरों पर समाधान जरूरी है। आखिरकार वित्तीय सेवाएं ऐसा कारोबार है, जो भरोसे पर खड़ा होता है। अगर आप भरोसा बहाल नहीं कर सकते तो यह उद्योग बढ़ोतरी नहीं कर सकता। वहीं इस उद्योग का बढऩा जरूरी है क्योंकि यह ऋण के लिहाज से पर्याप्त सेवाओं वाली अर्थव्यवस्था नहीं है। 
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