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पुरानी पॉलिसी शुरू कराएं या नई पॉलिसी के साथ जाएं?

संजय कुमार सिंह /  November 24, 2019

कई पॉलिसीधारक जान-बूझकर अपनी पॉलिसी की वैधता समाप्त होने देते हैं। बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीए) के अनुसार भारत में पांच वर्ष के बाद केवल 25 प्रतिशत पॉलिसियां ही सक्रिय (प्रभाव में) रहती हैं। बीमा कंपनियां कभी-कभी ये पॉलिसियां दोबारा शुरू करने के लिए विशेष अभियान चलाती हैं। फिलहाल भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) ने ऐसा ही एक विशेष अभियान चलाया है, जिसके तहत यह ऐसी पॉलिसियां दोबारा शुरू करने का मौका दे रही है, जिनके प्रीमियम का भुगतान पिछले दो वर्षों से नहीं हुआ है। 

 
प्रीमियम भुगतान की निर्धारित तिथि के बाद पॉलिसीधारकों को 15 से 30 दिनों का अतिरिक्त समय दिया जाता है। इस अवधि में भी भुगतान नहीं होने पर पॉलिसी निष्क्रिय हो जाती है। संशोधित नियमों के अनुसार नॉन-लिंक्ड जीवन बीमा पॉलिसियां प्रीमियम भुगतान बंद होने के पांच वर्र्षों तक (पहले दो वर्ष) तक दोबारा सक्रिय की जा सकती हैं। यूनिट-लिंक्ड बीमा पॉलिसियां (यूलिप) तीन वर्षों के भीतर दोबारा शुरू की जा सकती हैं। पॉलिसीधारक को बकाया प्रीमियम के साथ कुछ जुर्माना भी देना पड़ता है। 
 
पॉलिसीएक्स डॉट कॉम के मुख्य कार्र्याधिकारी एवं संस्थपापक नवीन गोयल कहते हैं, 'किसी बीमा कंपनी की पॉलिसी के बकाया प्रीमियम पर 8-9 से प्रतिशत जुर्माना देना पड़ सकता है। अमूमन ऐसी पॉलिसियां 5-6 प्रतिशत प्रतिफल देती हैं।' विशेष अभियान के तहत बीमा कंपनियां जुर्माने पर कुछ छूट की पेशकश भी करती हैं। परंपरागत पॉलिसियों के मामले में अब दो साल के बाद एक निश्चित सरेंडर वैल्यू का भुगतान होगा। पहले इसके लिए तीन साल तक प्रीमियम भुगतान करना जरूरी होता था। अगर कोई पॉलिसीधारक दो साल के बाद प्रीमियम का भुगतान नहीं करता है या ऐसा करने में सक्षम नहीं रहता है तो उसकी रकम नहीं डूबेगी। यूलिप के मामले में दूसरे नियम लागू होते हैं। उदाहरण के लिए कोई पॉलिसीधारक एक या दो प्रीमियम के भुगतान के बाद प्रीमियम रोक देता है तो ऐसे में उसका फंड वैल्यू एक डिस्कंटीन्यूअंस फंड में चला जाता है, जहां इस पर 4 प्रतिशत प्रतिफल मिलता है। संचयी मूल्य का भुगतान पॉलिसी के 5 वर्ष साल पूरा करने के बाद होता है। 
 
नई पॉलिसी बेहतर?
 
अगर पहले प्रीमियम के भुगतान के बाद किसी पॉलिसीधारक को लगता है कि उसे अमुक पॉलिसी जारी नहीं रखनी चाहिए तो उसे पॉलिसी बंद कर देनी चाहिए। पर्सनलफाइनैंसप्लान के संस्थापक दीपेश राघव कहते हैं, 'पहले प्रीमियम का नुकसान सहकर पॉलिसी बंद कर दें।' इसके पीछे तर्क यह है कि मान लें कि पहले वर्ष का प्रीमियम 1 लाख रुपये था और अगर पॉलिसीधारक दूसरे वर्र्ष के प्रीमियम का भुगतान करता है तो उसे 1 लाख रुपये और देने होंगे। ऐसे में पॉलिसी सरेंडर करने पर उसे मात्र 30 प्रतिशत रकम (60,000 रुपये) मिलेगी।
 
टर्म प्लान में भी एक पुरानी पॉलिसी दोबारा शुरू करने या नई खरीदने से पहले गहन विचार विमर्श करना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति अपनी पुरानी पॉलिसी निष्क्रिय होने देता है और एक दूसरी नई पॉलिसी खरीदता है तो उसे अधिक प्रीमियम देना होगा क्योंकि उस समय उसकी उम्र अधिक हो गई होगी। यहां भी एक झमेला है। बैंकबाजार में मुख्य कारोबारी अधिकारी नवीन चंदानी कहते हैं, 'ऑफलाइन के मुकबाले ऑनलाइन टर्म प्लान का प्रीमियम थोड़ा कम होता है। इतना ही नहीं, ऑनलाइन टर्म प्लान अधिकतम न्यूनतम बीमित रकम की पेशकश करते हैं।' पुरानी पॉलिसी दोबारा शुरू कराने पर आने वाले खर्च के मुकाबले नई ऑनलाइन बीमा पॉलिसी पर कुल खर्च कम आता है, खासकर जब बीमित रकम खासी अधिक हो। 
 
राघव का कहना है कि नई पॉलिसी लेने में तब समस्या आ सकती है जब कोई व्यक्ति किसी बीमारी का शिकार हो जाता है। उसे पॉलिसी नहीं मिल सकती है या उसे इसके लिए भारी प्रीमियम का भुगतान करना पड़ सकता है। पुरानी पॉलिसी शुरू करने के मामले में भी बीमा कंपनी पॉलिसीधारक को स्वास्थ्य जांच कराने के लिए कह सकती है। 
Keyword: insurance, company, health,,
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