बिजनेस स्टैंडर्ड - वीआरएस में मिली रकम का कैसे करें इस्तेमाल
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वीआरएस में मिली रकम का कैसे करें इस्तेमाल

विंदिशा सारंग और संजय कुमार सिंह /  November 24, 2019

देश में आर्थिक सुस्ती छाने के बाद लोगों की नौकरियां भी खतरे में पड़ गई हैं। कॉग्निजेंट, इन्फोसिस और कैपजेमिनाई जैसी दिग्गज सूचना-प्रौद्योगिकी (आईटी) कंपनियां अपने कर्मचारियों की संख्या में कटौती का ऐलान कर चुकी हैं। वाहन क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में लोग नौकरी से निकाले गए हैं। इस बीच खबरें आई हैं कि सरकारी दूरसंचार कंपनी भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) और महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड (एमटीएनएल) ने अपने 80,000 से अधिक कर्मचारियों के सामने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना (वीआरएस) पेश की है। अगर आप भी उन्हीं कर्मचारियों में शामिल हैं या अपनी कंपनी से वीआरएस लेना चाहते हैं तो कुछ खास बातों का ध्यान जरूर रखें। आपको समझ लेना चाहिए कि आपको कंपनी से कुल कितनी रकम मिलेगी और उसमें से मोटी रकम आपको कहां लगानी है।

 
सेवा की अवधि से तय होगा मुआवजा
 
जब कोई नियोक्ता अपने कर्मचारियों की छंटनी करता है और उसके कर्मचारी यदि कर्मचारी औद्योगिक विवाद (आईडी) अधिनियम, 1947 के तहत आते हैं तो नियोक्ता को उन्हें बतौर मुआवजा एकमुश्त रकम देनी ही पड़ती है। मुंबई में मान्यता प्राप्त वित्तीय योजनाकार अनुज शाह कहते हैं, 'औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत कोई भी कर्मचारी छंटनी के एवज में प्रत्येक वर्ष की सेवा के बदले 15 दिनों का वेतन (अंतिम प्राप्त वेतन के हिसाब से) पाने का हकदार है।' जिन कर्मचारियों ने एक वर्ष से अधिक समय के लिए काम किया है, उन्हें एक महीने का अग्रिम नोटिस या एक महीने का वेतन दिया जाना चाहिए। कानून में यह नहीं कहा गया है कि वीआरएस में कितनी रकम दी जानी चाहिए। आम तौर पर कंपनियां मुआवजा तय करते समय देखती हैं कि कर्मचारी ने कुल कितने साल तक काम किया है और उसके सेवानिवृत्त होने में कितना समय रह गया है।
 
कौन है वीआरएस का पात्र
 
कोई भी व्यक्ति चाहे कौशल भरा काम करता है, तकनीकी काम करता है, अकुशल कामगार है या हाथ का काम करता है, उसे औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत कामगार के तौर पर परिभाषित किया गया है। उन्हें आम तौर पर रोजाना एक ही तरह का काम करते रहना पड़ता है। डीएसके लीगल में वकील नंद किशोर कहते हैं, 'प्रशासनिक एवं प्रबंधन से जुड़े काम करने वाले इस दायरे में नहीं आते हैं।' जिन कार्यों में रचनात्मकता या नवाचार की जरूरत पड़ती है, उनमें लगे लोग कामगार की श्रेणी में नहीं आते हैं, इसलिए आईडी अधिनियम से बाहर रखे गए हैं। वैसे आईटी एवं आईटी से संबद्घ सेवाओं के उद्योग इसके दिलचस्प उदाहरण हैं। कुछ लोग मानते हैं कि उच्च शिक्षा प्राप्त सॉफ्टवेयर पेशेवरों को कामगार की श्रेणी में नहीं रखना चाहिए और आम तौर पर रोजाना एक जैसा काम करने वाले बीपीओ कर्मचारियों को इसी श्रेणी में रखा जाना चाहिए। लेकिन इस परिभाषा को लेकर थोड़ी उलझन भी है। हाल में ही चेन्नई में एक श्रम न्यायालय ने कहा कि आईटी कंपनी के कर्मचारी कामगार की परिभाषा में आते हैं और उनके नियोक्ता औद्योगिक विवाद अधिनियम का पालन किए बिना उन्हें नौकरी से नहीं हटा सकते हैं। इस कानून में अनिश्चितता के कारण विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक काम की प्रकृति कौशल पूर्ण, अकुशल, तकनीकी है तब तक कर्मचारी कामगार माने जाएंगे, इसलिए उन्हें औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत सभी लाभ मिलेंगे।
 
कराधान
 
इस मोर्चे पर कुछ अच्छी खबर है। औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 या किसी अन्य कानून के तहत छंटनी होने पर मिलने वाला मुआवजा आयकर अधिनियम की धारा 10 (10बी) के प्रावधान के तहत कर मुक्त है। लेकिन मुआवजे के तौर पर कर्मचारी को मिली वास्तविक राशि, हरेक साल की सेवा के बदले मिले 15 दिन के औसत वेतन अथवा अधूरे साल में छह महीने से अधिक सेवाकाल होने पर मिली रकम या 5 लाख रुपये में से जो भी रकम कम होगी, उसे ही करमुक्त माना जाएगा। इसलिए यदि किसी कर्मचारी को 10 लाख रुपये का मुआवजा मिलता है तो उसे 5 लाख रुपये पर कोई कर नहीं देना होगा और बाकी रकम पर कर वसूला जाएगा। 
 
प्रबंधन या निगरानी वाले पदों पर काम करने वाले लोगों को मिला मुआवजा आयकर अधिनियम की धारा 17 (3) के तहत वेतन माना जाता है और उस पर कर भी वसूला जाता है। आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 10 (10सी) के तहत 5 लाख रुपये तक का वीआरएस मुआवजा भी कर मुक्त है। अच्छी बात यह है कि अगर आपको मुआवजे के रूप में इतनी रकम मिलती है कि आप ऊंचे कर दायरे में आ जाते हैं तो भी आपको अतिरिक्त कर की चिंता करने की जरूरत नहीं है। मुंबई में चार्टर्ड अकाउंटेंट एन ए शाह कहते हैं, 'अगर छंटनी से पहले कर्मचारी ने 3 साल तक सेवा दी है और छंटनी की तारीख से लेकर सेवानिवृत्ति की तारीख के बीच 3 साल का समय बचा है तो वह कर्मचारी धारा 89 (1) के तहत छंटनी के कारण मिला मुआवजा कुल आय में जोड़े जाने के बाद नए प्रभावी कर दायरे के संबंध में राहत का दावा कर सकता है।' धारा 89 (1) कर्मचारियों को बकाया रकम पर पर कर में राहत देती है। इस अनुच्छेद के तहत राहत का दावा करने के लिए कर्मचारी को फॉर्म 10 (ई) भरना होता है और इसे डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट इनकम टैक्स इंडिया ईफाइलिंग डॉट गॉव डॉट इन पर जमा करना होता है।
 
मुआवजे की रकम का सही इस्तेमाल
 
रकम का एक हिस्सा आपातकालीन कोष में रखा जाना चाहिए, जो कम से कम 12 महीनों के खर्च (ईएमआई, बीमा प्रीमियम और बच्चों की स्कूल फीस सहित) के बराबर हो। इसकी वजह यह है कि मंदी के समय में यह बताना बहुत मुश्किल होता है कि नई नौकरी मिलने में अभी कितना समय लग जाएगा। मुंबई में वित्तीय सलाहकार एम बर्वे कहते हैं, 'जिन युवाओं की कई साल की नौकरी बची है, वे इस रकम का इस्तेमाल नए कौशल सीखने में कर सकते हैं। कुछ हिस्सा महंगे कर्ज को चुकाने में भी खर्च किया जा सकता है।' यह सब काम करने के बाद भी रकम बच जाती है तो इसका निवेश दीर्घ अवधि की योजनाओं की पूर्ति के लिए इक्विटी फंडों में करें। इसके लिए एकमुश्त निवेश के बजाय सिस्टैमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसटीपी) का सहारा ले सकते हैं। जो लोग सेवानिवृत्ति के करीब हैं और दोबारा पूर्णकालिक काम पर नहीं लौटना चाहते हैं उन्हें वीआएस रकम का कुछ हिस्सा शेयरों में डालना चाहिए। इससे रकम तेजी से बढ़ेगी और महंगाई से निपटने में भी मदद मिलेगी। शेष रकम विभिन्न डेट योजनाओं में निवेश की जानी चाहिए ताकि मासिक खर्चों के लिए नियमित आय मिलती रहे। डेट योजना का एक हिस्सा सेवानिवृत्ति में नियमित आय के लिए एन्युटी खरीदने में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। डेट का बाकी हिस्सा वरिष्ठï नागरिक बचत योजना, प्रधानमंत्री वय वंदन योजना (पीएमवीवीआई) आदि में डाला जा सकता है। लोगों को अपने निवेश से प्राप्त आय के अलावा अंशकालिक काम कर कुछ आय अर्जित करने की भी कोशिश करनी चाहिए। आजकल सेवानिवृत्ति के बाद 25 साल तक जीवित रहना आम हो गया है और लोगों को उतने समय तक खर्च के लिए रकम की जरूरत भी पड़ती है। इसीलिए उन्हें अलग से काम करना चाहिए ताकि उनके हाथ में कुछ और रकम आ सके।
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