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यह कहना जल्दबाजी कि वित्तीय क्षेत्र में मंदी समाप्त हो गई है

पुनीत वाधवा /  November 24, 2019

सितंबर में सरकार द्वारा कॉरपोरेट कर में कटौती के बाद से वैश्विक और घरेलू चिंताओं के बावजूद सूचकांकों में तेजी आई है। बीएनपी पारिबा के इक्विटी शोध प्रमुख (एशिया प्रशांत) मनीषी रॉयचौधरी ने पुनीत वाधवा के साथ बातचीत में कहा कि मौजूदा नकदी-केंद्रित तेजी से बाजार के बारे में चिंताएं भी पैदा हुई हैं। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश:

 
क्या सितंबर से आई तेजी ने बाजारों को बुनियादी बातों से काफी आगे रखा है?
 
लगातार वृहद आर्थिक मंदी और घटते कॉरपोरेट आय अनुमानों के संदर्भ में मौजूदा नकदी-केंद्रित तेजी ने बाजार में तेज सुधार को लेकर कुछ चिंताएं भी पैदा की हैं। न सिर्फ भारत बल्कि सभी उभरते बाजारों में इक्विटी बाजार पिछले 6 सप्ताहों के दौरान मजबूत हुए हैं। यह तेजी उभरते बाजारों में मजबूत पूंजी प्रवाह से जुड़ी हुई है। 
 
क्या मिड- और स्मॉल-कैप सेगमेंट अगले एक साल में अपने लार्ज-कैप प्रतिस्पर्धियों को मात दे पाएंगे?
 
हमने 2019 के अंत तक सेंसेक्स के लिए 40,500 का लक्ष्य रखा है। हालांकि एक साथ पूरे मिड-/स्मॉल-कैप सेगमेंट के बारे में भविष्यवाणी करना कठिन है, लेकिन हमारा मानना है कि चुनिंदा मिड-कैप शेयर बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं क्योंकि उन्हें मूल्यांकन समर्थन मिला है। हम मुक्त नकदी प्रवाह, मजबूत आरओई (पूंजी पर प्रतिफल) और अच्छी प्रबंधन गुणवत्ता तथा कॉरपोरेट घोषणाओं की संभावना देख रहे हैं। 
 
क्या बाजार में भविष्य में बढ़ते राजकोषीय घाटे की आशंका का असर दिख रहा है?
 
725 अरब डॉलर का सरकार का विनिवेश लक्ष्य पूरा होता दिख रहा है। हालांकि कॉरपोरेट कर कटौती से राजस्व में कमी को कुछ हद तक पूरा करने और खपत बढ़ाने के लिए अन्य राजकोषीय प्रोत्साहनों के लिए वृहद स्तर पर विनिवेश जरूरी हो सकता है। बाजार इस पर नजर रख रहा है कि क्या इस तरह का परिणाम संभव है। 
 
सितंबर तिमाही के नतीजों के बारे में आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
 
फिलहाल सितंबर तिमाही पिछली तीन-चार तिमाहियों की तुलना में भारत के लिए बेहतर दिख रही है। शेष एशिया में भी हालात समान हैं। भारत में, जुलाई-सितंबर तिमाही में कुल राजस्व उम्मीद के अनुरूप रहा है, जबकि समग्र स्तर पर आय 4 से 5 प्रतिशत बढ़ी है। सकारात्मक बदलाव उपभोक्ता खर्च, कंज्यूमर स्टैपल्स, धातु तथा चुनिंदा हेल्थकेयर कंपनियों द्वारा दर्ज किए गए हैं। 
 
आपके ओवरवेट और अंडरवेट सेक्टर कौन से हैं?
 
प्रमुख भारतीय सूचकांकों के लिए प्रति शेयर आय (ईपीएस) वित्त वर्ष 2020 में निचले एक अंक में और वित्त वर्ष 2021 में दो अंक में रहने का अनुमान है। वित्त वर्ष 2021 के लिए मौजूदा आय अनुमानों से ईपीएस वृद्घि मजबूत रहने का अनुमान है, लेकिन हमें कुछ क्षेत्रों में आय अनुमानों में कमी आने की भी आशंका है। हम भारत में कंज्यूमर स्टैपल्स, निजी बैंकों, बीमा, और ऊर्जा पर ओवरवेट यानी उत्साहित हैं और सूचना प्रौद्योगिकी पर तटस्थ रुख अपनाए हुए हैं। 
 
क्या वित्तीय क्षेत्र चिंताओं से उबर चुका है?
 
यह कहना जल्दबाजी है कि वित्तीय क्षेत्र चिंताओं से उबर चुका है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (पीएसबी) फंसे कर्ज की समस्या से ग्रसित थे और यह समस्या अब खासकर गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) को शिकार बना रही है जिन्होंने रियल एस्टेट और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों को ज्यादा ऋण दिया है। अधूरी संपत्तियों की समस्या से न सिर्फ एनबीएफसी के लिए कर्ज फंसने की आशंका बढ़ा रही है बल्कि इससे उपभोक्ता धारणा भी व्यापक तौर पर प्रभावित हो रही है। निवेशकों को रियल्टी क्षेत्र में कुछ अधूरी परियोजनाओं के समाधान और धातु तथा खनन क्षेत्र में कुछ संपत्तियों के संबंध में अदालती फैसलों के जरिये प्रस्तावित समाधानों का इंतजार करना चाहिए।
 
खपत सेगमेंट पर आपका क्या नजरिया है?
 
कंज्यूमर स्टैपल्स सेक्टर में निवेशकों को मूल्यांकन को लेकर सतर्क रहना होगा क्योंकि कई प्रमुख शेयरों का मूल्यांकन में बदलाव की ज्यादा गुंजाइश नहीं है। यह ऐसा एकमात्र क्षेत्र है जिसमें मार्जिन वृद्घि की मदद से ईपीएस अनुमानों में संशोधन देखा गया है। इसमें मार्जिन वृद्घि बरकरार रह सकती है क्योंकि जिंस कीमतें नरम बनी हुई हैं। 
 
मंदी की चिंताओं के बीच विदेशी निवेशक भारत को निवेश स्थान के रूप में कैसे देख रहे हैं?
 
जहां विदेशी निवेशक दीर्घावधि के संदर्भ में भारत पर सकारात्मक हैं, वहीं अल्पावधि में वे आर्थिक मंदी तथा मूल्यांकन चिंताओं की वजह से सतर्क बने हुए हैं। कई निवेशक उन खपत-अनुकूल उपायों की संभावना तलाश रहे हैं जो सरकार मुहैया करा सकती है। साथ ही निवेशकों की नजर वित्त क्षेत्र में फंसे कर्ज की समस्या के समाधान के लिए सरकार तथा केंद्रीय बैंक के प्रयासों पर भी लगी रहेगी। 
 
वैश्विक घटनाक्रम पर आपका नजरिया?
 
निवेशक जहां लगभग एक महीने पहले भू-राजनीतिक समस्याओं (ब्रेक्सिट, अमेरिका-चीन व्यापारिक टकराव, अमेरिका में मंदी की आशंका) को लेकर काफी चिंतित दिख रहे थे, वहीं अब उनकी चिंता कुछ घटी है क्योंकि अमेरिका और चीन के बीच 'फेज-1' सौदे की संभावना स्पष्ट दिख रही है। 
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