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सार्वजनिक संस्थाओं में एनसीएलटी के पास सीमित अधिकार

अदालत से
एम जे एंटनी /  November 24, 2019

ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) की धारा 238 के मुताबिक यह संहिता दूसरे नियमों पर भारी पड़ेगी लेकिन मामला सार्वजनिक संस्थाओं की संपत्ति से जुड़ा होगा तो राष्ट्रीय कंपनी कानून पंचाट (एनसीएलटी) उनकी आपत्तियों को नजरअंदाज नहीं कर सकता है और उन पर नए सिरे से दिलचस्पी पैदा कर सकता है। पंचाट के समक्ष सार्वजनिक संस्थाएं दूसरे पक्षों से अलग है। उनके पास न केवल अधिकार है बल्कि अपनी संपत्तियों और परिसंपत्तियों के नियंत्रण और नियमन का सार्वजनिक कर्तव्य भी है। उच्चतम न्यायालय ने ग्रेटर नोएडा नगर निगम बनाम अभिलाष लाल वाद में अपनेे फैसले में यह व्यवस्था दी। न्यायालय ने कहा कि जब तक निगम अपनेे कानूनों के तहत लेनदेन को मंजूरी नहीं देता है, पंचाट स्थानीय निकाय की आपत्तियों को दरकिनार नहीं कर सकता है। न्यायालय ने पंचाट की समाधान योजना को खारिज कर दिया जिसने निगम की आपत्तियों को नजरअंदाज किया था। यह मामला उस समय उठा जब निगम ने अस्पताल बनाने के लिए एक भूखंड दिया और इसे बनाने वाली कंपनी वित्तीय संकट में फंस गई। इससे ऐक्सिस बैंक की पहल पर दिवालिया कार्यवाही हुई। पंचाट ने एक समाधान योजना का मसौदा बनाया जिसका निगम ने विरोध किया था। अपील पंचाट ने उसकी अपील को खारिज कर दिया। लेकिन उच्चतम न्यायालय में उसे सफलता मिल गई। न्यायालय ने कहा कि निगम के पास सार्वजनिक संपत्तियों के प्रबंधन के लिए कानून के मुताबिक जो अधिकार हैं, वे आईबीसी के तहत नहीं हो सकते हैं। निगम के पास अपने हिसाब से सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं को विकसित करने के लिए स्वतंत्र योजनाएं हैं लेकिन पंचाट की समाधान योजना इसकी राहत में गंभीर बाधा होगी। 

 
उपभोक्ता फोरम में जा सकता है ट्रस्ट
 
उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि अगर कोई अस्पताल ट्रस्ट नर्सों के रहने के लिए फ्लैट खरीद रही है तो उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत उसे उपभोक्ता कहा जा सकता है। लीलावती कीर्तिलाल मेहता मेडिकल ट्रस्ट बनाम यूनीक शांति डेवलपर्स मामले में ट्रस्ट ने डेवलपर से फ्लैट खरीदे। लेकिन ये फ्लैट इतनी जर्जर हालत में थे कि उनकी मरम्मत नहीं जा सकती थी। ट्रस्ट ने राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में इसकी शिकायत की लेकिन आयोग ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि कानून में ऐसे लोगों को उपभोक्ता के तौर पर परिभाषित नहीं किया गया है जो व्यावसायिक उद्देश्य के लिए सेवा लेते हैं। नर्सों को छात्रावास की सुविधा मुहैया कराना सीधे तौर परा अस्पताल चलाने के व्यावसायिक उद्देश्य से जुड़ा है। नर्सें अस्पताल में जो काम करती हैं, उसे देखते हुए कानून की परिभाषा के तहत ट्रस्ट उपभोक्ता नहीं होगा। ट्रस्ट ने इसके खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील की जिसने आयोग के फैसले को खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि व्यावसायिक संस्था भी उपभोक्ता हो सकती है और यह मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है। न्यायालय ने कहा कि व्यक्ति की पहचान नहीं बल्कि जिस उद्देश्य के लिए लेनदेन किया जाता है वह प्रासंगिक है। अगर आयोग की राय को मंजूर किया गया तो इससे कई जटिल समस्याएं पैदा होगी जहां नियोक्ता के साथ-साथ कर्मचारियों के पास भी कोई उपाय नहीं होगा। इससे उपभोक्ताओं को तुरंत न्याय दिलाने का उद्देश्य पूरा नहीं होगा। साथ ही इस तरह की नजीर स्थापित करने से नियोक्ता अपने कर्मचारियों को कोई भी सुविधा देने से हतोत्साहित हो सकते हैं।
 
संस्टेंड रिलीज दवाओं पर मूल्य नियंत्रण
 
उच्चतम न्यायालय ने दो दवा कंपनियों की इस दलील को खारिज कर दिया है कि 'सस्टेंड रिलीज' और 'कंटीन्यूअस रिलीज' तकनीकों पर आधारित उनकी दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे में नहीं लाया जाना चाहिए। टीसी हेल्थकेयर और मोदी मुंडीफार्मा को पहले मूल्य नियंत्रण से छूट मिली थी क्योंकि दवा (मूल्य नियंत्रण) आदेश के तहत उन्हें लघु इकाई की श्रेणी में रखा गया था। बाद में 2006 और 2009 में जारी अधिसूचना के तहत उन्हें मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाया गया। उन्हें इन अधिसूचनाओं को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उनकी दलील थी कि उनके उत्पाद मूल्य नियंत्रण नियमों के दायरे में नहीं आते हैं। उन्होंने साथ ही यह तर्क भी दिया कि सस्टेंड रिलीज तकनीक में इस्तेमाल होने वाले फॉर्मूले या कारगर खुराक आपूर्ति के लिए अंतिम उत्पाद में इस्तेमाल होने वाले तरीके के संबंध में मूल्य के कोई नियम नहीं हैं। उच्च न्यायालय ने उनके दावे को खारिज कर दिया। उच्चतम न्यायालय ने उनकी अपील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वे कीमत से जुड़े नियमों और अधिसूचना द्वारा तय मूल्य निर्धारण को मानने के लिए बाध्य हैं। 
 
दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले खारिज
 
मध्यस्थता के मामलों में दिल्ली उच्च न्यायालय के दो फैसलों को उच्चतम न्यायालय ने पिछले पखवाड़े खारिज कर दिया। वैपकोज लिमिटेड बनाम सलमा डैम जेवी वाद में उच्च न्यायालय ने अफगानिस्तान में सरकार द्वारा शुरू की गई एक बांध परियोजना में उपजे विवादों के समाधान के लिए एक मध्यस्थ नियुक्त किया। बढ़ती लागत से मतभेद पैदा हुए और समझौते को कई बार बदला गया। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि ठेकेदार ने अपनेे सभी दावे छोड़ दिए थे और एक नई व्यवस्था पर रजामंदी जताई थी। इसके तहत वह इस बात पर सहमत था कि कोई मध्यस्थता नहीं होगी। न्यायालय ने कहा कि जब ठेकेदार ने यह व्यवस्था चुनी थी तो अब मध्यस्थता प्रक्रिया का रास्ता उसके लिए नहीं खुला है और वह संशोधित समझौते में हल किए गए दावों को फिर से नहीं उठा सकता है। एक अन्य मामले भारत संघ बनाम प्रदीप कंस्ट्रशन कंपनी वाद में उच्चतम न्यायालय ने रेलवे को दो ठेकेदारों के साथ उसके विवाद में एक मध्यस्थ नियुक्त करने का आदेश दिया। न्यायालय ने कहा कि जब समझौते में स्पष्ट रूप से नामजद मध्यस्थों को नियुक्त करने की बात कही गई है तो इसका पालन होना चाहिए। उच्च न्यायालय को अपना स्वतंत्र मध्यस्थ नियुक्त नहीं करना चाहिए था।
 
दवा कंपनी के निदेशकों पर चलेगा मुकदमा
 
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह एक दवा कंपनी के दो निदेशकों की अपील को खारिज कर दिया जिनके खिलाफ दवा एवं सौंदर्य प्रसाधन कानून के तहत आपराधिक मामले चल रहे थे। उनकी दलील थी कि कंपनी में उनकी भूमिका के बारे में बताए बिना शिकायत में उन्हें नामजद किया गया था। दवा कानून की धारा 34 (1) के तहत अगर किसी कंपनी ने कोई अपराध किया है तो कंपनी का कामकाज देखने वाला हर व्यक्ति अपराध का दोषी माना जाएगा। कोई निदेशक यह साबित कर सकता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया और उसने उचित प्रक्रिया का पालन किया था। मार्क लैबोरेटरीज लिमिटेड बनाम भारत संघ वाद में उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी कि मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत में इंस्पेक्टर ने साफतौर पर निदेशकों की जवाबदेही का हवाला दिया था और वे मुकदमे के दौरान इससे इनकार कर सकते हैं। 
 
पूर्वग्रह पर एनसीएलटी को फटकार
 
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह कहा कि मैकील इस्पात बनाम एसबीआई वाद में राष्ट्रीय कंपनी कानून पंचाट (एनसीएलटी) ने कॉरपोरेट ऋणदाता के साथ सौतेला व्यवहार किया था। कॉरपोरेट ऋणदाता की शिकायत यह थी कि पंचाट ने वित्तीय लेनदार को दस्तावेज जमा करने के लिए एक महीने से अधिक की मोहलत दी थी जबकि समय बढ़ाने की उसकी मांग खारिज कर दी थी। न्यायालय ने कहा कि यह व्यवहार पूर्वग्रह और पक्षपातपूर्ण है जिसे हतोत्साहित किया जाना चाहिए। याचिका स्वीकार करते हुए न्यायालय ने पंचाट को कॉरपोरेट ऋणदाता द्वारा दायर हलफनामा स्वीकार करने और मामले को आगे बढ़ाने का आदेश दिया। 
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