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कार्वी की गलतियों से डूब सकता है ब्रोकिंग कारोबार

बी दशरथ रेड्डी / हैदराबाद November 24, 2019

सोशल मीडिया पर कुछ हफ्ते पहले जब क्लाइंटों को भुगतान में देर का मामला सामने आया तो कार्वी समूह के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक सी पार्थसारथि ने हैदराबाद में स्टॉक ब्रोकिंग बिरादरी से कहा कि उनके ब्रोकिंग कारोबार के साथ सबकुछ ठीक-ठाक है। शुक्रवार को सेबी के आदेश के बाद भी वह गैर-अनुपालन को लेकर किसी तरह की कार्रवाई या किसी अन्य मसले से वह इनकार करते रहे, जो उनके ब्रोकरेज फर्म कार्वी स्टॉक ब्रोकिंग लिमिटेड (केएसबीएल) के साथ जुड़ा था। सेबी का आदेश प्राथमिक तथ्योंं के आधार पर जारी हुआ था कि केएसबीएल ने कथित तौर पर क्लाइंट की रकम व शेयर खुद के ट्रेड व गिरवी से लिए किया। 

 
कार्वी की तरफ से क्लाइंट की रकम के कथित दुरुपयोग की विस्तृत जांच के बाद ही पूरी तस्वीर सामने आएगी। हालांकि सेबी की तरफ से कुछ परिपत्र जारी हुए। 15 नवंबर को जारी पहला परिपत्र यूनिक क्लाइंट कोड की मैपिंग को लेकर था। दूसरा परिपत्र 19 नवंबर को जारी हुआ, जो ट्रेडिंग सदस्य की तरफ से मार्जिन की जानकारी से जुड़ा था। यह कदम बाजार नियामक की तरफ से क्षति पर तत्काल नियंत्रण के लिए उठाया गया था, जब उसने केएसबीएल के लेनदेन में कुछ गलत पाया। यह जानकारी बाजार के विश्लेषकों ने दी। सेबी के आदेश ने हैदराबाद की ब्रोकरेज फर्म को नया क्लाइंट शामिल करने से रोक दिया।
 
कार्वी स्टॉक ब्रोकिंग देश की 10 अग्रणी ब्रोकरेज कंपनियोंं में शामिल है और उसके पास करीब देश भर में 2.44 लाख ग्राहकोंं का आधार है। ब्रोकिंग ही समूह के पास एकमात्र बड़ा कारोबार बचा जब उसने रजिस्ट्रार ऐंड ट्रांसफरि कंपनी कार्वी फिनटेक प्राइवेट लिमिटेड  अमेरिकी पीई फर्म जनरल अटलांटिक को पिछले साल करीब 1,000 करोड़ रुपये में बेच दिया। अगर सेबी की जांच में क्लाइंट की रकम या शेयर के दुरुपयोग का आरोप साबित होता है तो कंपनी को क्लाइंटों को भरोसा हासिल करने में मुश्किल होगी, जो उसका मुख्य कारोबार है।
 
एक विश्लेषक ने कहा, हैदराबाद ने सत्यम कंप्यूटर्स के प्रवर्तकों की तरफ से की गई धोखाधड़ी जैसे बड़े घोटाले देखे हैं। लोग पहले ही दूरी बनाने लगे हैं क्योंकि सेबी ने अपने आदेश में अप्रैल 2016 से अक्टूबर 2019 के बीच समूह की फर्म कार्वी रियल्टी को 1,096 करोड़ रुपये हस्तांतरित किए जाने की बात कही है। यह हालांकि पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि क्या पूरी रकम क्लाइंटों की है। कार्वी रियल्टी को इस रकम का प्रापक बताए जाने से लोग सोच रहे हैं कि इस रकम का निवेश कुछ रियल्टी सौदों में हुआ होगा, जिसकी किस्मत के बारे में पता नहीं है। सत्यम घोटाले की जड़ें भी जमीन सौदे से जुड़ी थी।
 
सूत्रों के मुताबिक, कार्वी रियल्टी ज्यादातर मध्यस्थता में है और कम से कम हैदराबाद शहर में वह खुद के दम पर बड़े सौदे या परियोजनाओं के लिए नहीं जानी जाती। 35 साल पुराने समूह की तरफ से शुरू की गई 21 कंपनियोंं में से एक यह है। सार्वजनिक सूचना के मुताबिक, समूह के 30,000 से ज्यादा कर्मचारी हैं, जो देश भर के 900 कार्यालयों में काम कर रहे हैं। ब्रोकिंग के अलावा समूह की मौजूदगी वित्तीय योजनाओं के वितरण, डिपॉजिटरी भागीदार, कमोडिटी ब्रोकिंग, वेल्थ मैनेजमेंट आदि में है।
 
चार्टर्ड अकाउंटेंट सी पार्थसारथि ने साल 1983 में अपने सहायकों एम युगांधर और एम एस रामकृष्णा के साथ मिलकर कार्वी का गठन किया था और यह शुरू में रजिस्ट्रार ऐंड ट्रांसफरि सेवा देती थी, जो उसका पहला व सबसे कामयाब कारोबार है। कार्वी ने 1990 के मध्य में ब्रोकिंग कारोबार शुरू किया। कई मौकों पर कंपनी की जांच नियामक ने की है। साल 2016 मेंं बाजार नियामक ने कंपनी की गुजरात शाखा में आईपीओ में कथित धोखाधड़ी के खिलाफ कार्रवाई की थी। आरोप है कि उस शाखा के प्रबंधक ने फर्जी आवेदकों के नाम से शेयर के लिए आïवेदन किया और आवंटन के बाद उन्हें प्रीमियम पर बेच दिया।
 
अविभाजित आंध्र प्रदेश के शासक परिवार से नजदीकी के बावजूद पार्थसारथि अपने वित्तीय सेवा कारोबार तक सीमित रहे। जब वाई एस राजशेखर रेड्डी मुख्यमंत्री थे जब कार्वी को अपने नए कॉरपोरेट बिल्डिंग के लिए फाइनैंशियल ड्रिस्ट्रिक्ट में 2 एकड़ जमीन मिली। कंपनी ने यहां अपना ब्रोकिंग कारोबार शिफ्ट कर दिया। कार्वी केप्रवर्तकोंं ने शहर का मौजूदा ऑफिस बिल्डिंग बेच दिया। बाकी कंपनियों की तरह कार्वी ने मार्जिन फंडिंग कारोबार शुरू किया, जहां वह ज्यादा रकम कमा सकती थी और लाभ अर्जित कर सकती थी। 
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